चंडीगढ़। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल, दिनभर सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग और रात को सोने से पहले स्क्रीन… जेन जी की जिंदगी में डिजिटल दुनिया जरूरत से कहीं आगे बढ़ चुकी है। मोबाइल और सोशल मीडिया से कुछ समय दूरी बनाने से मानसिक स्थिति और नींद पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। पीजीआई के क्लिनिकल साइकोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार और विजेंद्र नाथ पाठक से जुड़े नए शोध में डिजिटल डिटॉक्स के बाद प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति, नींद की गुणवत्ता और माइंडफुलनेस में सुधार के संकेत मिले हैं।
यह शोध अगस्त 2026 में अनाल्स ऑफ न्यूरो साइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में 18 से 21 वर्ष आयु वर्ग के 200 विद्यार्थियों के डिजिटल व्यवहार का अध्ययन किया गया। शोध के अनुसार जरूरत से ज्यादा डिजिटल मीडिया के इस्तेमाल का संबंध चिंता, अवसाद, तनाव और खराब नींद की गुणवत्ता से देखा गया। वहीं, प्रतिभागियों पर संरचित डिजिटल डिटॉक्स आधारित हस्तक्षेप किए जाने के बाद मनोवैज्ञानिक स्थिति में सुधार के संकेत सामने आए।
स्क्रीन टाइम से आगे बढ़ा डिजिटल ओवरलोड
आज युवाओं के सामने चुनौती केवल स्क्रीन टाइम नहीं बल्कि डिजिटल ओवरलोड भी है। क्लास या काम के बीच नोटिफिकेशन, खाली समय में सोशल मीडिया, मनोरंजन के लिए वीडियो और रात में बिस्तर पर स्क्रीन दिमाग लगातार नई सूचनाएं हासिल करता रहता है। इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन चैट, गेमिंग और सोशल मीडिया युवाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। शोध में ज्यादा डिजिटल उपयोग के साथ भावनात्मक तनाव और खराब नींद की स्थिति देखी गई। अधिक डिजिटल मीडिया इस्तेमाल का संबंध ज्यादा चिंता, अवसाद और तनाव से भी पाया गया। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स संभावित हस्तक्षेप के तौर पर सामने आया है।
डिजिटल डिटॉक्स का मतलब फोन छोड़ना नहीं
डिजिटल डिटॉक्स का अर्थ मोबाइल, इंटरनेट या सोशल मीडिया को हमेशा के लिए छोड़ देना नहीं है। इसका उद्देश्य डिजिटल उपकरणों के साथ संतुलित रिश्ता बनाना है। बेवजह स्क्रॉलिंग कम करना, गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना और दिन में कुछ समय डिजिटल उपकरणों से पूरी तरह अलग रहना इसका हिस्सा है। सरल शब्दों में डिजिटल डिटॉक्स का मतलब फोन से भागना नहीं बल्कि फोन को अपनी जिंदगी चलाने से रोकना है।
डिटॉक्स के बाद क्या बदला
शोध में प्रतिभागियों को प्रयोगात्मक और नियंत्रण समूह में बांटा गया था। संरचित डिजिटल डिटॉक्स इंटरवेंशन के बाद प्रयोगात्मक समूह में नियंत्रण समूह की तुलना में बेहतर मनोवैज्ञानिक स्थिति के संकेत मिले।
डिजिटल इस्तेमाल नियंत्रित करने से
मानसिक तनाव में कमी के संकेत मिले।
नींद की गुणवत्ता बेहतर होने के संकेत मिले।
माइंडफुलनेस का स्तर बढ़ा।
समग्र मानसिक वेल-बीइंग में सुधार की संभावना सामने आई।
जेन जी के लिए नो स्क्रीन नहीं, स्मार्ट स्क्रीन जरूरी
तकनीक को पूरी तरह जिंदगी से अलग करना संभव नहीं है। पढ़ाई, कॅरिअर, बैंकिंग, जानकारी और सामाजिक संपर्क के लिए डिजिटल माध्यम जरूरी हैं। इसलिए समाधान पूरी तरह ऑफलाइन होना नहीं, बल्कि डिजिटल व्यवहार को समझदारी से नियंत्रित करना है।
डिजिटल डिटॉक्स का आसान फॉर्मूला
उठते ही फोन नहीं: सुबह की शुरुआत नोटिफिकेशन के बजाय अपनी दिनचर्या से करें।
नो फोन जोन: खाना खाते, पढ़ाई करते या परिवार के साथ समय बिताते मोबाइल अलग रखें।
सोने से पहले स्क्रीन ब्रेक: बिस्तर पर स्क्रॉलिंग करने के बजाय स्क्रीन से दूरी बनाएं।
नोटिफिकेशन पर कंट्रोल: गैरजरूरी ऐप की घंटियां बंद करें।
स्क्रॉलिंग का समय तय करें: सोशल मीडिया के लिए निश्चित समय निर्धारित करें।
स्क्रीन की जगह रियल कनेक्शन: दोस्तों-परिवार से आमने-सामने बातचीत, खेल, टहलना और अन्य गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करें।






















