नई दिल्ली51 मिनट पहले
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पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने एक देश-एक चुनाव पर बनी संसदीय समिति को अपनी लिखित राय सौंपी है।
पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है। देश में एक साथ चुनाव कराने को लेकर विपक्ष की ओर से यह दलील दी जा रही है।
हालांकि, इसके लिए प्रस्ताविक बिल में चुनाव आयोग (ECI) को दी जाने वाली शक्तियों के बारे में पूर्व CJI ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इससे ECI को विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाने या घटाने की शक्ति मिल सकती है। उन परिस्थितियों को परिभाषित किया जाना चाहिए जिनके तहत ECI इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक देश-एक चुनाव पर बनी संसदीय समिति को अपनी लिखित राय सौंपी है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 17 दिसंबर, 2024 को लोकसभा में एक देश-एक चुनाव संविधान संशोधन बिल पेश किया था।

पूर्व CJI क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों पर पड़ेगा असर
जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह चिंता भी जताई कि एक साथ चुनाव कराने से बेहतर आर्थिक स्थिति वाली नेशनल पार्टियों के प्रभाव से क्षेत्रीय और छोटी पार्टियाँ हाशिए पर जा सकती हैं। राजनीतिक दलों के बीच समान अवसर देने के लिए चुनाव अभियान में फाइनेंस से जुड़े नियमों को मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने मध्यावधि चुनावों होने पर लोकसभा या विधानसभा केवल बचे हुए कार्यकाल के लिए चुनने से सार्थक परियोजनाएं लागू करने की क्षमता बाधित होगी।
संसदीय समिति पैनल के कई अन्य सदस्य भी ऐसी सरकारों की नीति और प्रशासन की क्षमता पर चिंता जाहिर कर चुके हैं।
दो अन्य पूर्व CJI 11 जुलाई को समिति से मिलेंगे
पूर्व CJI रंजन गोगोई और पूर्व CJI जेएस खेहर 11 जुलाई को समिति से बिल पर चर्चा करेंगे। जस्टिस गोगोई इससे पहले मार्च में भी समिति के साथ बैठक की थी। उस समय उन्होंने भी ECI बहुत ज्यादा अधिकार दिए जाने पर चिंता जाहिर की थी।
वहीं, पूर्व CJI यूयू ललित फरवरी में पेश हुए थे और उन्होंने सलाह दी थी कि चरणबद्ध तरीके से एक साथ चुनाव कराए जाने चाहिए। हालांकि, उन्होंने कहा था कि जिन विधानसभाओं का कार्यकाल ज्यादा बचा है उनके समय को कम करने से कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

शुरुआती आर्थिक चुनौतियां भारी होंगी
1. सिर्फ EVM खरीद पर ₹1.5 लाख करोड़ लगेंगे
निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2034 में अगर ‘एक देश एक चुनाव’ की नीति लागू होती है तो सिर्फ ईवीएम की खरीदी के लिए ही 1.5 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह राशि कितनी ज्यादा है, इसका अंदाजा केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में अनुमानतः एक लाख करोड़ रुपए खर्च हुए थे।
2. 2034 के चुनाव में दोगुनी करनी होगी सिक्योरिटी फोर्स
रामनाथ कोविंद कमेटी ने बताया कि एकसाथ चुनाव कराने के लिए सेंट्रल सिक्योरिटी फोर्सेज में 50% बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। यानी करीब 7 लाख कर्मियों की जरूरत होगी। 2024 में सिक्योरिटी फोर्स के करीब 3.40 लाख कर्मचारियों और अधिकारियों की चुनावों में ड्यूटी लगी थी।
साथ-साथ और अलग-अलग चुनाव होने पर वोटिंग पैटर्न
थिंक टैंक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट की एक स्टडी में कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं:
- अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं तो 77% वोटर्स दोनों जगह एक ही पार्टी को वोट करते हैं।
- दोनों चुनावों में 6 माह का अंतर होने पर 61% रह जाती है एक ही पार्टी को चोट देने की संभावना।
- दोनों चुनावों में 6 महीने से ज्यादा का अंतर होने पर एक ही पार्टी को चोट करने की संभावना 61% से भी कम हो जाती है।

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 17 दिसंबर, 2024 को लोकसभा में एक देश-एक चुनाव संविधान संशोधन बिल पेश किया था।
एकसाथ चुनाव करवाने के 4 बड़े फायदे
रामनाथ कोविंद समिति ने अपनी रिपोर्ट में एकसाथ चुनाव करवाए जाने के पक्ष में ये तर्क दिए हैं…
1. शासन में निरंतरता आएगी देश के विभिन्न भागों में चुनावों के चल रहे चक्रों के कारण राजनीतिक दल, उनके नेता और सरकारों का ध्यान चुनावों पर ही रहता है। एक साथ चुनाव करवाने से सरकारों का फोकस विकासात्मक गतिविधियों और जनकल्याणकारी नीतियों के क्रियान्वयन पर केंद्रित होगा।
3. अधिकारी काम पर ध्यान दे पाएंगे चुनाव की वजहों से पुलिस सहित अनेक विभागों के पर्याप्त संख्या में कर्मियों की तैनाती करनी पड़ती है। एकसाथ चुनाव कराए जाने से बार बार तैनाती की जरूरत कम हो जाएगी, जिससे सरकारी अधिकारी अपने मूल दायित्यों पर फोकस कर पाएंगे।
2. पॉलिसी पैरालिसिस रुकेगा चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के क्रियान्वयन से नियमित प्रशासनिक गतिविधियां और विकास कार्य बाधित हो जाते हैं। एक साथ चुनाव कराने से आदर्श आचार संहिता के लंबे समय तक लागू रहने की अवधि कम होगी, जिससे पॉलिसी पैरालिसिस कम होगा। 4. वित्तीय बोझ में कमी आएगी एकसाथ चुनाव कराने से वित्तीय खचों में काफी कमी आ सकती है। जब भी चुनाव होते हैं, मैनपॉवर, उपकरणों और सुरक्षा उपायों के प्रबंधन पर भारी खर्च होता है। इसके अलावा राजनीतिक दलों को भी काफी खर्च करना पड़ता है।
ये आंकड़े करते हैं एकसाथ चुनावों का समर्थन • 2019-2024 के दौरान इन पांच सालों में भारत में 676 दिन आदर्श आचार संहिता लागू रही। यानी प्रति साल लगभग 113 दिन। • अकेले 2024 के लोकसभा चुनावों में ही एक अनुमान के मुताबिक करीब 1,00,000 करोड़ रुपए खर्च हुए।




























