एक स्वाइप… फिर दूसरा और देखते ही देखते घंटों मोबाइल स्क्रीन पर गुजर जाते हैं। रील्स और तेजी से बदलते डिजिटल कंटेंट की यह आदत बच्चों के लिए मनोरंजन से आगे बढ़कर चिंता का कारण बन रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार लगातार फास्ट स्क्रॉलिंग और स्क्रीन पर निर्भरता से बच्चों की एकाग्रता, याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक ऐसी आदत बने रहने पर पढ़ाई, किताब पढ़ने, बातचीत और किसी एक काम पर टिके रहने में भी परेशानी आ सकती है। वहीं, आज अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से जुड़े ऐसे लक्षणों को समझाने के लिए डिजिटल डिमेंशिया शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है।
डिजिटल डिमेंशिया बीमारी नहीं, लक्षणों को समझाने वाला शब्द
डॉ. प्रमोद ने कहा कि डिजिटल डिमेंशिया पारंपरिक डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी कोई आधिकारिक चिकित्सकीय बीमारी नहीं है। यह शब्द अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से जुड़े याददाश्त और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षणों को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
मोबाइल से ज्यादा जरूरी है संतुलन
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन इस्तेमाल पर नजर रखने की सलाह दी। खाने, पढ़ाई और सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कम करने के साथ स्क्रीन-फ्री पारिवारिक समय तय करने पर जोर दिया गया। बच्चों को खेलकूद, किताबें पढ़ने, परिवार-दोस्तों के साथ बातचीत की सलाह दी।










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