पंजाब के जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) ने सत्ता में रहने का फायदा उठाते हुए सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को भी अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिलीं, जबकि भाजपा ने मामूली बढ़त दर्ज की। कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
इन चुनावों का सबसे चकित करने वाला फेक्टर यह रहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस, आप और शिअद के पाले से दलित वोट बैंक खिसक गया। यह वोट बैंक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और आजाद प्रत्याशियों की ओर शिफ्ट हो गया। बसपा ने पंचायत समिति में 28 और जिला परिषद में 3 सीटें जीतीं, जबकि 2018 में उन्हें खाता तक नहीं खोला था। आजाद प्रत्याशियों ने भी 144 पंचायत समिति और 10 जिला परिषद सीटें जीतीं, जो 2018 की तुलना में काफी अधिक है।
जातीय गणित और रणनीतिक मायने
पंजाब में दलित आबादी लगभग 38 प्रतिशत है और अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में ही रहती है। बसपा का मुख्य फोकस दलित मतदाताओं पर ही रहता है। इस बार 2018 में खाता न खोने वाली बसपा कुल 31 सीटों पर विजयी हुई। होशियारपुर, जालंधर, कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर में दलित वोट बैंक में सबसे ज्यादा सेंधमारी हुई। बसपा और आजाद प्रत्याशियों की बढ़त ने आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। कांग्रेस, आप और शिअद को इस बदलाव का गहन विश्लेषण करना होगा। आजाद प्रत्याशियों की बढ़ी हुई संख्या और दलित वोट बैंक में बदलाव को ध्यान में रखकर ही आगामी चुनाव रणनीति बनाई जा सकती है।


























