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क्यों सबकुछ जला डालती है आग, कैसे मिला श्राप? वेद-पुराणों से जानिए अग्निदेव की कथा

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क्यों सबकुछ जला डालती है आग, कैसे मिला श्राप? वेद-पुराणों से जानिए अग्निदेव की कथा

by India News Online Team
March 10, 2024
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क्यों सबकुछ जला डालती है आग, कैसे मिला श्राप? वेद-पुराणों से जानिए अग्निदेव की कथा
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क्यों सबकुछ जला डालती है आग, कैसे मिला श्राप? वेद-पुराणों से जानिए अग्निदेव की कथा

साल था 2018, तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उस वक्त अजरबैजान की राजधानी बाकू पहुंची थीं. उस दौरान उनकी एक तस्वीर काफी चर्चा में रही. तस्वीर एक मंदिर की थी. एक मुस्लिम देश में मंदिर की मौजूदगी वैसे भी आश्चर्य में डालने वाली बात थी, तिस पर मंदिर के एक शिलालेख पर श्रीगणेशाय नमः के साथ-साथ श्री ज्वाला जी भी लिखा था. अजरबैजान में स्थित यह मंदिर आतेशगाह या आतिशादाह कहलाता है. हिंदी में कहें तो ज्वाला जी मंदिर. इस मंदिर में अग्रि के महत्व बताने वाले मंत्र लिखे हैं. सत्रहवीं सदी तक का इतिहास समेटे इस मंदिर में कभी लोग सामूहिक रूप से जुटते रहे होंगे और अग्नि की पूजा के तौर पर कोई उत्सव मनाते रहे होंगे.

विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज की अजरबैजान के इस मंदिर की यात्रा ये बताने के लिए काफी है कि अग्नि का स्थान विश्व की हर सभ्यता में पहले दर्जे पर रहा है. आदिम युग के आदमी का पहिया भी सभ्यता की ओर तभी घूम पाया, जब उसने आग की खोज कर ली. ये खोज उस जमाने की सबसे क्रांतिकारी खोज थी, क्योंकि इसने मांस को पकाना सिखा दिया, गुफाओं को गर्म रखने का शऊर दिया, जानवरों से बचना सिखा दिया और सबसे बड़ी बात रात के अंधेरे को उजाले में तब्दील कर दिया.

अग्नि से ही फैला है वेदों के ज्ञान का प्रकाश

सनातन परंपरा में हम जिन वेदों की बात करते हैं, उनके ज्ञान का प्रकाश भी अग्नि के माध्यम से ही फैला है. ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं को हविष्य देने के मंत्र लिखे है. इन हविष्य को किसमें सौंपा जाता, इसलिए सबसे पहले अग्नि का ही आह्वान किया गया. ऋग्वेद का प्रथम शब्द ही अग्नि ही है. ऋचाओं में अग्नि ही प्रथम देव है और इसीलिए जब यज्ञ की परंपरा विकसित हुई तब यह माना गया कि अग्नि को समर्पित प्रसाद ही अन्य देवताओं को भोग के रूप में मिलता है. ऋग्वेद की ऋचा कहती है इदं अग्नाय, इदं न मम्. यह जो समर्पित है वह अग्नि है, यह मेरा नहीं है.


ऋग्वेद का प्रधान देवता है अग्नि

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का प्रधान देवता अग्नि ही है. ऋग्वेद में भले ही सूर्य को आदि देव और इंद्र को प्रमुख देवता कहा गया है, लेकिन उसमें प्रधानता अग्निदेव की है.

वैदिक ऋषियों ने जब यज्ञ शुरू किया तो सबसे पहले अग्नि को प्रकट कर उसकी प्रशंसा की और कहा कि, हे अग्नि, तुम हमारे लिए कवि और दूत हो, तुम प्रज्वलित होकर प्रकाश फैलाओ और हमारे हव्य को देवताओं तक ले जाओ. तुम हजारों प्रकार के अन्न को धारण कर यज्ञमान (यजमान) का कल्याण करो और देवताओं का प्रसाद लाने में हमारे निमित्त बनो.  

समिद्धो अद्य राजसि देवो देवैः सहस्रजित् दूतो हव्या कविर्वह

हे अग्नि! तुम ऋत्विजों द्वारा भली प्रकार उदीप्त होकर सुशोभित हो. हे सहस्रजित्! तुम कवि और दूत हो तुम हमारे हव्य को ले आओ.

आजुह्वानो न ईड्यो देवां आवक्षि यज्ञियान्, अग्ने सहस्रसा असि

हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहां लाओ. तुम हजारों प्रकार का अन्न उन्हें दो  

प्राचीनं बर्हिरोजसा सहस्रवीरमस्तृणन्. यत्रादित्या विराजथ

हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं. ऋत्विज् उसे मंत्रों द्वारा बुलाते हैं.

विराट् सम्राड्विभ्वीः प्रभ्वीर्बह्वीश्च भूयसीश्च याः. दुरो घृतान्यक्षरन्

यज्ञशाला में विराट्, सम्राट्, विप्र, प्रभु, बहु और भूयान् अग्नि घृतरूप जल गिराते हैं.

ऋग्वेद की यह ऋचाएं बताती हैं कि अग्नि ही वह दूसरा स्वरूप है, जिसे आदित्यों में प्रथम सूर्यदेव की चेतना के तौर पर पहचाना गया है. सूर्यदेव के जलने और उनकी तपिश में अग्नि की ही मौजूदगी है, और वह जिस ऊर्जा और ऊष्मा के देवता हैं, उसका भी प्रमुख सोर्स अग्नि ही है, इसलिए ऋग्वैदिक ऋषियों ने अग्नि को ऊर्जा के एक प्रमुख घटक के तौर पर पहचाना है और फिर उन्हें देवता का दर्जा दिया है.

अग्नि को ही समर्पित है दूसरा वेद

वेदों के क्रम में दूसरा वेद यजुर्वेद तो पूरी तरह अग्नि को ही समर्पित है. इस वेद में कई तरह के यज्ञों का वर्णन है, साथ ही यज्ञ के दौरान देवताओं को बुलाए जाने वाले मंत्रों, यज्ञ के कर्मकांड, अग्नि में हवि और समिधा डालते हुए मंत्रों का उच्चारण और उनकी उपयोगिता का विस्तार से वर्णन है. ऋग्वेद में शामिल अग्निहोत्र के कई मंत्र हूबहू यजुर्वेद में शामिल किए गए हैं, क्योंकि यज्ञकर्म में देव आहुति के लिए उन मंत्रों की जरूरत पड़ती है. यजुर्वेद संहिता में वैदिक काल के धर्म के कर्मकाण्ड आयोजन के लिए यज्ञ करने के लिये मंत्रों का संग्रह है. इनमें कर्मकाण्ड के कई यज्ञों का वर्णन हैं, जिसमें मुख्य रूप से 6 यज्ञ बताए गए हैं.

अग्निहोत्र
अश्वमेध
वाजपेय
सोमयज्ञ
राजसूय
अग्निचयन

पुराणों में भी देवता है अग्नि

वैदिक काल में अग्नि का स्वरूप ऊर्जा और प्रकाश के तौर पर सामने आया है, लेकिन पुराण कथाओं में अग्नि, इंद्र, सूर्य, वरुण जैसे अन्य देवताओं की ही तरह मानव आकृति वाला एक देवता ही है. यह भी स्वर्ग में इंद्र की सभा में शामिल होता है. कई देव-दानव युद्धों और देवासुर संग्राम में यह प्रमुख भूमिकाएं निभाता है. मनुष्य द्वारा पुकारे जाने पर यह उनके सामने शरीर लेकर प्रकट होता है, और वरदान-श्राप भी देता है. कई पौराणिक कथाओं में अग्नि देव यज्ञ की आग के बीच से प्रकट होता है और यज्ञ करने वाले यजमान को यज्ञ का फल प्रदान करता है.  


रामायण में अग्निदेव

रामायण में श्रीराम के जन्म के दौरान अग्नि के यज्ञ से प्रकट होने का उदाहरण मिलता है. संतान की चाह में अयोध्या के राजा दशरथ ऋषि शृंगी की सहायता पुत्रेष्ठि यज्ञ कराते हैं. यज्ञ के पूर्ण होने पर यज्ञ देवता (अग्नि देव) खुद प्रकट होते हैं, और राजा दशरथ को खीर के चार कटोरे देते हैं. राजा दशरथ ये कटोरे अपनी रानियों को देते हैं और इनसे ही उन रानियों को पुत्र की प्राप्ति होती है. ये पुत्र भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर राम, शेषनाग के अवतार के तौर पर लक्ष्मण और शंख-चक्र के अवतार के रूप में भरत-शत्रुघ्न जन्म लेते हैं.

इस प्रसंग को संत तुलसीदास मानस में लिखते हुए कहते हैं…
सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥3॥

वशिष्ठजी ने शृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया. मुनि के भक्ति सहित आहुतियां देने पर अग्निदेव हाथ में चरु (हविष्यान्न खीर) लिए प्रकट हुए.

जब सीता की परीक्षा में सामने आए अग्निदेव

इसके बाद रामचरित मानस में अग्नि के स्वरूप का मानवीय रूप में सामने आने का वर्णन सीता की अग्नि परीक्षा वाले प्रसंग में मिलता है. रावण के वध के बाद सीता को राम के पास लाया जाता है, तब वह अपनी असली सीता को वापस पाने के लिए अग्नि परीक्षा की बात कहते हैं. यहां कहानी में लिखा गया है कि राम ने सीता हरण से पहले ही असली सीता को अग्निदेव को सौंप दिया था और छाया सीता को साथ रखा था, ताकि असली सीता का किसी भी तरह से लंका में प्रवेश न हो सके. इसके पीछे की कथा कही जाती है कि असली सीता खुद लक्ष्मी और सौभाग्य का स्वरूप थीं. अगर सीता किसी भी तरह लंका में प्रवेश कर जातीं तो वहां सौभाग्य आ जाता और फिर लंका का नाश कभी नहीं हो पाता. ऐसे में राम ने असली सीता को अग्निदेव के पास छिपा दिया था.

मानस में संत तुलसीदास लिखते हैं कि
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥
सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥
प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गए. आकाश से देवताओं ने बहुत से फूल बरसाए. सीताजी (के असली स्वरूप) को पहिले अग्नि में रखा था. अब भीतर के साक्षी भगवान्‌ उनको प्रकट करना चाहते हैं.

इसी के लिए श्रीराम ने अग्नि परीक्षा की बात कही और फिर सीताजी ने भी उनके खेल में साथ देते हुए कहा कि, लक्ष्मण हमेशा से धर्म के प्रतीक रहे हैं इसलिए मैं लक्ष्मण को आदेश देती हूं कि वह तुरंत अग्नि जलाएं, अगर मैं मन, वचन से पवित्र हूं तो अग्नि मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. अग्नि भी मेरे मन की असलियत जानती है और मेरे लिए वह श्रीखंड यानी चंदन के समान शीतल हो जाएगी.

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥
लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥
पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥

इसके बाद सीता जी प्रचंड आग में प्रवेश कर जाती हैं और फिर आग की लपटें आकाश तक उठने लगती हैं. इस अग्नि में जितने भी लौकिक कलंक थे वे सब जल गए और इसी बीच कोई जान नहीं पाया कि छाया सीता भी जल गईं और उनकी जगह असली सीता प्रगट हो गईं. उनके सामने आते ही आग भी ठंडी होकर घटने लगी. इसके बाद खुद अग्निदेवता मानव रूप में प्रकट हुए. वह सीता का हाथ पकड़कर श्रीराम के पास ले गए और उनका हाथ उसी तरह राम के हाथ में थमा दिया, जैसे कि पिता कन्यादान करता है. जैसे जनक ने सीता का विवाह किया था और जैसे एक समय में क्षीरसागर ने विष्णु के साथ लक्ष्मी का विवाह किया था.

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥2॥

तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत्‌ में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्री रामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णु भगवान्‌ को लक्ष्मी समर्पित की थीं. वे सीताजी श्री रामचंद्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं. उनकी उत्तम शोभा अत्यंत ही सुंदर है. मानो नए खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो.


महाभारत में हैं अग्निदेव की कई कथाएं

रामायण काल के बाद अग्नि की कई कहानियां महाभारत में भी शामिल हुई हैं. कौरव और पांडवों के बीच में जब राज्य का बंटवारा हुआ तो पांडवों को खांडवप्रस्थ का हिस्सा मिला. खांडव प्रस्थ तब कीकर के जंगलों का क्षेत्र हुआ करता था और वहां सिर्फ विषैली-कंटीली बड़ी-बड़ी झाड़ियां थीं. ये झाड़ियां विषैले जीवों और मायावी असुरों-दानवों का घर हुआ करती थीं. तक्षक, अश्वसेन जैसे कई नागों का परिवार इन जंगलों में बसा था तो वहीं, मय दानव का भी बसेरा था.

महाभारत के सभापर्व में कथा आती है कि जब पांडव और श्रीकृष्ण खांडव प्रस्थ पहुंचे तो वहां उन्हें एक बहुत ही दीन-हीन ब्राह्मण मिला.वह बहुत कमजोर था. श्रीकृष्ण ने उससे उसका परिचय पूछा तो उसने कहा कि मैं ब्राह्मण नहीं अग्नि हूं और राजा श्वेतकि के यज्ञ से थककर और बीमार होकर यहां पड़ा हूं. पांडव आश्चर्य में थे कि यज्ञ ही जब अग्नि का कर्म है तो वह इससे क्यों बीमार हो गए, तब अग्नि ने कहा कि श्वेतकि राजा ने 12 वर्षों तक लगातार घी की अनवरत धारा से यज्ञ किया है, इतने घी के कारण मेरे अंदर ऊष्मा तो समा गई, लेकिन हविष्य और समिधा न होने के कारण दहन नहीं हो सका है. इसलिए मुझे यज्ञ से अरुचि हो गई.

क्यों जलाया गया था खांडव वन

मैंने ब्रह्माजी से इस अरुचि का उपाय पूछा तो उन्होंने मुझे किसी वन का भक्षण करने की आज्ञा दी. अब मैं किसी हरे-भरे वन को नहीं जला सकता, इसलिए यहां आया था, लेकिन खांडववन को इंद्र नहीं जलाने दे रहे हैं, क्योंकि इसमें उनका मित्र तक्षक नाग रहता है.तब श्रीकृष्ण ने उन्हें सहायता का वचन दिया और अर्जुन से खांडव दाह में अग्नि की सहायता करने के लिए कहा. अर्जुन खुद इंद्र पुत्र था, इसलिए इंद्रदेव उसका सामना नहीं कर सके और खांडव वन को जलाने से पांडवों को राजधानी बनाने के लिए जगह मिल गई. इसका नाम उन्होंने इंद्रप्रस्थ रखा. उधर अर्जुन से प्रसन्न होकर अग्नि ने उसे कपिध्वज रथ दिया. वरुण देव से लाकर अक्षय तुणीर और गांडीव धनुष भी वरदान में दिया. मय दानव ने भी पांडवों की शरण ली और उसने युधिष्ठिर की राजधानी का निर्माण किया और अद्भुत माया महल बनाया. इसी महल में दुर्योधन पानी भरे कुंड में गिर गया था, जो कि महाभारत का कारण बना.


जब अग्नि ने सहदेव को सेना सहित जलाने की कोशिश की

महाभारत के ही सभापर्व में अग्नि से जुड़ी एक और कहानी सामने आती है. यह कथा ऋषि वैशम्पायन, पांडवों के आखिर वंशज जन्मेजय को सुना रहे थे.इंद्रप्रस्थ की स्थापना के बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का विचार किया. इसके लिए चारों दिशाओं में विजय जरूरी थी. इसलिए भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव एक-एक दिशा की ओर दिग्विजय के लिए बढ़े. सहदेव दक्षिण दिशा में चले और एक-एक राज्य को जीतते हुए माहिष्मतीपुरी पहुंचे. यहां पहुंचते ही सहदेव और उनकी सारी सेना को अग्नि ने घेर लिया. अग्नि को ऐसा करते देख सहदेव चकित रह गए.

वैशम्पायन ऋषि से यह कथा सुन रहे जन्मेजय ने प्रश्न किया कि अग्नि तो पांडवों के मित्र हो चुके थे, फिर उन्होंने सहदेव को क्यों घेर लिया? वैशम्पायन ऋषि ने बताया कि अग्नि देव इस राज्य की राजकुमारी राजा नील की पुत्री सुदर्शना से प्रेम करते थे. एक दिन राजा ने अपनी इच्छा से सुदर्शना का विवाह कहीं और करना चाहा तो अग्निदेव भड़क उठे और राज्य को जलाने लगे, तब सुदर्शना ने पिता को अग्निदेव से प्रेम की बात बताई. राजा नील इस संबंध से प्रसन्न हुआ और उसने पूरी आवभगत के साथ अग्निदेव का विवाह अपनी बेटी से कर दिया. इसके साथ ही उसने अग्निदेव से राज्य की रक्षा का वचन भी ले लिया. इसलिए जैसे ही कोई राजा युद्ध के उद्देश्य से राज्य पर चढ़ाई करता है वह अग्निदेव का ग्रास बन जाता है.

सहदेव ने जब खुद को अग्निदेव से घिरा हुआ पाया तो उन्हें पांडवों की मित्रता और वचन याद दिलाए. तब अग्निदेव ने राजा नील और सहदेव के बीच मध्यस्थता करा दी और साथ ही भविष्य में सहायता का वचन भी दिलवाया. इस तरह पांडवों की मित्रता में एक राज्य और जुड़ गया.

अग्नि को क्यों मिला सबकुछ भस्म करने का श्राप

महाभारत में अर्जुन को गीता सुनाते हुए श्रीकृष्ण अग्नि के गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अग्नि वह पवित्र तत्व है, जो सभी को अपने में मिलाकर पवित्र कर देती है. अग्नि को ये जला डालने वाला गुण भी उसे एक श्राप की वजह से मिला है. अग्नि पुराण के इस प्रसंग को ऋषि शौनक महाभारत के ही आदिपर्व में सुनाते हैं. इस कथा के अनुसार महर्षि भृगु का विवाह पुलोमा से हुआ था. एक दिन ऋषि कुटिया में नहीं थे, उसी दौरान पुलोमा नामका दैत्य एक ऋषि का रूप बनाकर आश्रम में घुसा और पुलोमा के रूप पर मोहित हो गया.

पहले कभी पुलोमा के पिता ने बचपन में ऐसा कहा था कि वह पुलोमा की शादी पुलोमा दैत्य से ही कर देंगे, लेकिन जब पुलोमा बड़ी हुई तो उन्होंने भृगु ऋषि से विवाह कर दिया. पुलोमा की कुटिया के आगे अग्निहोत्र की आग जल रही थी. दैत्य पुलोमा ने उसी अग्नि से कहा, हे अग्नि  ये बताओ , क्या पुलोमा की शादी की बात पहले मुझसे नहीं हुई थी? कहो, नहीं तो मैं श्राप दे दूंगा.

दैत्य पुलोमा के ऐसा कहने पर, अग्नि ने कहा कि हां ये सच है कि पहले पुलोमा की शादी की बात तुमसे हुई थी, लेकिन ऋषि भृगु के साथ वैदिक रीति से इसका विवाह हुआ है. इसलिए अब यह उनकी पत्नी है. अग्नि के इतना कहने के बावजूद पुलोमा दैत्य ने ऋषि पत्नी पुलोमा का अपहरण कर लिया. जब भृगु ऋषि आश्रम पहुंचे तो उन्होंने योगबल से सबकुछ जान लिया और इस पूरे प्रकरण में अग्नि की भूमिका भी मानी. उन्होंने अग्नि को श्राप देते हुए कहा कि, तू बहुत तटस्थ है न तो मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि यह तटस्थता तुम्हारा गुण हो. अब अग्नि को कुछ भी जलाने-भस्म करने में संकोच नहीं होगा. अब से तुम सही-गलत के चुनाव किए बिना हर वस्तु का भक्षण करोगे”.

पुलोमा के विवाह को लेकर, अग्नि पुराण में ही इसका स्प्ष्टीकरण दिया जाता है कि, जब पुलोमा छोटी कन्या थी तो वह एक दिन बहुत रो रही थी. उसके पिता ने उन्हें चुप कराने के लिए कह दिया कि चुप हो जाओ, नहीं तो पुलोमा दैत्य से ही तुम्हारा  विवाह कर दूंगा, फिर वह तुम्हें ले जाएगा. पुलोमा ने इस बात को अपने लिए विवाह का वचन मान लिया. इसीलिए कहा जाता है कि बच्चों से या कभी भी कुछ बोलने से पहले बहुत सोच-विचार कर बोलना चाहिए.


कैसे उत्पन्न हुई अग्नि

इस श्राप के बाद अग्नि बहुत विचलित हुआ और एक गुफा में जाकर छिप गया. अग्नि के लोप हो जाने के कारण एक तरह ऊर्जा का ही लोप हो गया. चारों तरफ अग्नि की खोज शुरू हुई. ब्रह्मा के एक पुत्र ऋषि अंगिरा को यह कार्य सौंपा गया. वह उन्हें हर तरफ खोजते हुए उसी गुफा में पहुंचे, जहां अग्नि था. उन्हें ऊष्मा का अनुभव हुआ तो वह अग्निदेव से सामने आने की प्रार्थना करने लगे, लेकिन अग्नि ने उनकी पुकार नहीं सुनी. तब अंगिरा ऋषि ने शमी वृक्ष की दो लकड़ियों को लेकर आपस में रगड़ना शुरू किया, उसके घर्षण से अग्नि उत्पन्न हो गई और अग्निदेव को सामने आना ही पड़ा. तब अग्निदेव ने अंगिरा ऋषि को वरदान देकर कहा कि, वैसे तो मैं हर तत्व में ऊर्जा के रूप में मौजूद हूं, लेकिन तुमने मुझे घर्षण से उत्पन्न किया है इसलिए अब मैं तुम्हारा पुत्र भी कहलाऊंगा.

अग्नि सिर्फ दीपक की ज्योति, यज्ञ और जंगल में लगी आग तक सीमित नहीं है. बल्कि यह मनुष्यों की भीतर भी है. आमतौर पर हम जिसे ‘पेट की आग’ कहते हैं वह जठराग्नि हमारे शरीर में रहकर हमारे पाचन तंत्र का हिस्सा है. विज्ञान भी शरीर प्रक्रिया में श्वसन और पाचन के साथ दहन शब्द का प्रयोग करता है. जब श्वसन में दहन होता है तो प्राणवायु बनती है और जब पाचन में दहन होता है तो शरीर को ऊर्जा मिलती है.

गीता में अग्नि का वर्णन

गीता में श्रीकृष्ण ने इसी अग्नि को ब्रह्म कहकर पुकारा है. जो भोजन को हवि मानकर हमें उसमें समाई ऊर्जा देता है. वह कहते हैं कि, जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञ को करनेवाले) जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म-समाधि हो गई है, उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है.

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना.

हर परंपरा में है आग की बात

आग की बात करें तो हर परंपरा ने अग्नि की जरूरत को पहचाना है. सनातन परंपरा कहती है, प्रकृतिः पंच भूतानि. यानी पांच भूतों (तत्वों) से बनी है यह प्रकृति, जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु शामिल हैं. हमारे या किसी भी जीव के अंदर जो ऊर्जा तत्व है वह अग्नि ही है. इसी के कारण हम चलते हैं या जैविक क्रियाएं करते हैं. भारत में होली-दीपावली, दशहरा, लोहड़ी जैसे सभी पर्व अग्नि के महत्व से जुड़े पर्व हैं. अग्नि के प्रकाश को देखते हुए आगे बढ़ें तो संसार के हर त्योहार में इसकी उपस्थिति मिलेगी. बल्कि कई त्योहारों का रूप बिल्कुल भारतीय त्योहारों से मिलती है. ईरान में भी अग्नि को वैसा ही पवित्र माना जाता है,जैसा कि भारत में मान्यता है. वहां चहार-शंबे सूरी नाम का एक त्योहार मनाया जाता है, जिसे साल खत्म होने के आखिरी दिनों में परिवार और समाज के लोगों के साथ सामूहिक रूप से मनाया जाता है.


ईरान का आग से जुड़ा त्योहार

इस त्योहार में लोग अग्नि को पवित्र मानते हुए उसके ऊपर से कूदते हैं. ये माना जाता है कि अग्नि को पार कर लेना, मतलब बीते समय को पार कर लेना. फिर इसमें लोग कुछ अनाज और मेवे डालते हैं, ‘ऐ आतिश-ए-मुकद्दस! ज़रदी-ए-मन अज तू सुर्खी-ए-तू अज मन.’ अग्नि के सामने खड़े लोग इरानी भाषा में इस प्रार्थना को पढ़ते हैं और कामना करते हैं कि बीता साल जैसा भी हो, आने वाले दिन शुभ हों. इसका पंक्ति का अर्थ है – हे पवित्र अग्नि! हमारा निस्तेज पीलापन तू हर ले, अपनी जीवंत लालिमा से हमें भर दे. यह ईरानी भाषा में की गई कामना एक बार फिर भारतीयों को ऋग्वेद की ओर ले जाती है. जिसकी एक ऋचा का अर्थ ठीक ऐसा है. यो अग्निं देववीतये हविष्मां आविवासति, तस्मै पावक मृलय्.

जिसे हम अग्नि कहते हैं वह पारसी में आतर है. ईरानी में आतिशे है. अनाहिता, मित्रा और अन्य शब्द ईरानी भाषा के उतने ही अपने हैं, जितने की संस्कृत में और ऋग्वेद की ऋचाओं में वे पवित्र. इसी के साथ आदिम युग को याद करें तो इतिहास कहता है कि आदिमानव ने झुंड में रहना सीखा और उसने आग जलानी सीख ली थी. इसके बाद वह समूह में आयोजन करता था. वह आग जलाता था. उसके इर्द-गिर्द नाचता-गाता था. उसी अग्नि में मांस भूनता था और मिलकर खाता था. आदिम युग का यह मानव ऐसा इसलिए करता था, ताकि वह रात में जंगली जानवरों से बचा रहे और कोई प्राकृतिक आपदा आए तो उसका सामना कर सके.

आदिम युग से हमारी साथी है अग्नि

आग आदिम युग से हमारी साथी बनी हुई है. पेट की आग संघर्ष के लिए प्रेरणा बनती है. संघर्ष की आग में तपकर मनुष्य खरा सोना बनता है. प्रेम की अगन संसार को सुंदर बनाती है और दुश्मनी की आग में सबकुछ भस्म हो जाता है. हमें जरूरत है कि हम अपने भीतर की आग के सही रूप को पहचानें और सन्मार्ग की ओर बढ़ें. कबीर बाबा भी कह गए हैं. जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही मौजूद है. अगर खोज सको तो खोज लो.
ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग,
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग.



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