लंदन14 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

ब्रिटिश आर्मी के साथ काम करने वाले अफगान सैनिक ब्रिटेन से निकाले जाने के बाद पाकिस्तान में छिपकर रह रहे हैं।
पाकिस्तान में छिपे 2021 से पहले ब्रिटेन में तैनात 200 अफगान सैनिक अब ब्रिटेन लौटना चाहते हैं। दरअसल, ब्रिटेन में 2021 में अफगानिस्तान पर हुए तालिबानी कब्जे के बाद इन सैनिकों के देश से निकाल दिया था। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रिटेन तालिबानी सरकार को मान्यता नहीं देता और बिना मान्यता वाले देश के सैनिकों को अपने देश की सीमा में रहने नहीं दे सकता।
इन सभी सैनिकों की ट्रेनिंग ब्रिटेन में ही हुई थी। UK से निकाल दिए जाने के बाद ये सैनिक पाकिस्तान में छिपकर रहने लगे। अब पाकिस्तान सरकार अफगान नागरिकों को हिरासत में लेकर अफगानिस्तान भेज रही है। इसलिए UK से पाकिस्तान पहुंचे सैनिक ब्रिटेन वापस आना चाहते हैं और ब्रिटिश सरकार उनकी मदद नहीं कर रही है।

ब्रिटेन के विदेश विभाग से मिले एक लेटर से BBC को पता चला कि ब्रिटिश सरकार जानती थी कि अफगान सैनिक खतरे में हैं।
ब्रिटेन ने सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी
BBC के मुताबिक इस मामले पर ब्रिटिश आर्मी के पूर्व जनरल का कहना है कि ब्रिटेन ने अफगान स्पेशल फोर्स के इन सैनिकों को धोखा दिया है। 2021 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने संसद में कहा था- ये सैनिक देश के लिए बेहद अहम हैं और इनकी सुरक्षा ब्रिटेन की जिम्मेदारी है। हम इनके लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करेंगे।
ब्रिटिश आर्मी के पूर्व जनरल सर रिचर्ड बैरन्स ने कहा- ब्रिटेन अब इन सैनिकों की मदद करने में फेल हो गया है। ये शर्म की बात है। ये दर्शाता है कि या तो हम एक राष्ट्र के रूप में दोहरे चरित्र वाले हैं या अक्षम हैं। हमें दोनों ही स्वीकार्य नहीं है। ये विश्वासघात है। इस विश्वासघात की कीमत वे लोग चुकाएंगे जो हमारे साथ काम करते थे। उन्हें जेल में डाला जा सकता है या उन्हें मौत की सजा भी हो सकती है।

ब्रिटेन के विदेश विभाग से मिले लेटर के मुताबिक, ब्रिटिश सेना और सरकार ने अफगान सैनिकों के काम की तारीफ की थी।
32 अधिकारी भी परेशान, ब्रिटेन लौटना चाहते हैं
इन 200 सैनिकों के अलावा 32 ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने ब्रिटेश सरकार या आर्मी की मदद की। इन्होंने ब्रिटिश सरकार के अफगान रीलेक्शन एंड असिस्टेंस प्रोग्राम (ARAP) के तहत ब्रिटेन लौटने के लिए अपलाई किया है। कई सैनिकों और अधिकारियों की अपील खारिज हो गई है।

ब्रिटिश आर्मी के पूर्व जनरल सर रिचर्ड बैरन्स का कहना है कि ब्रिटेन सैनिकों की मदद करने में फेल हो गया है।
पाकिस्तान में रह रहे अफगान सैनिकों और अधिकारियों की कहानी…
ब्रिटिश सैनिक परिवार की तरह पर मदद नहीं
2003 में ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में अफीम से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए कमांडो फोर्स 333 तैयार की थी। इसमें अफगानिस्तान के नागरिकों को सेना की ट्रेनिंग दी गई थी। अली इस टीम का हिस्सा था।
उसने कहा- हम ब्रिटिश सैनिकों के साथ ही ट्रेनिंग करते थे। वो हमारे दोस्त थे। साथ खाना खाते, कंधे-से-कंधे मिलाकर काम करते थे। हम सब एक परिवार थे। 2021 में जब अफगानिस्तान में तख्तापलट हुआ तो हमें काबुल भेजा गया। मैं वहां एक होटल में ब्रिटिश नागरिकों की सुरक्षित निकलने में मदद कर रहा था। सभी नागरिकों को बचा लिया गया लेकिन मैं इवेक्यूएशन फ्लाइट में नहीं चढ़ पाया। जैसे-तैसे पाकिस्तान पहुंचा। सोचा ब्रिटेन से मदद आएगी। मैंने ब्रिटिश आर्मी के साथ करीब 20 साल काम किया लेकिन मदद नहीं आई। अब मैं पाकिस्तान में एक कमरे के घर में पत्नी और पांच बच्चों के साथ रहता हूं। पाक सरकार अफगान नागरिकों को हिरासत में लेकर अफगानिस्तान भेज रही है। 3 महीने से घर से नहीं निकला हूं। डर लग रहा है।

तस्वीर कमांडो फोर्स 333 के सैनिकों की है। इसमें अफगानिस्तान और ब्रिटेन के सौनिक शामिल थे। पहचान छुपाने के लिए इनके चेहरे ब्लर किए गए हैं।
हमें अकेला छोड़ा, धोखा दिया
मोहम्मद फहीम अफगानिस्तान के गार्मसिर जिले के गवर्नर थे। यह वही जिला है जहां प्रिंस हैरी ने ब्रिटिश आर्मी का हिस्सा होते हुए सेवा की थी।
फहीम ने कहा- गवर्नर रहते हुए मैंने ब्रिटिश आर्मी की बहुत मदद की। कई तालिबानी लीडर्स को गिरफ्तार कराया। ये लोग जानते थे कि मैं ब्रिटेश सैनिकों की मदद कर रहा हूं। तालिबान ने मेरे दो भाई की हत्या कर दी। 2018 उन्होंने मेरे साथ मार-पीट की। इतना मारा की मेरी जान जा सकती थी। मैं समझ गया था कि तालिबान एक न एक दिन सत्ता पर काबिज हो जाएगा। मैं डरने लगा। मैंने ब्रिटेन से मदद मांगी उन्होंने नहीं की। अब मैंने पाकिस्तान में रह रहा हूं। पासपोर्ट भी एक्सपायर हो गया है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं।

तालिबानी हमले के बाद मोहम्मद फहीम 25 दिन अस्पताल में रहे थे।
ब्रिटिश सरकार का रवैया निराश करने वाला
ब्रिटिश आर्मी के पूर्व जनरल सर रिचर्ड बैरन्स ने कहा- हमने कभी नहीं सोचा था कि सरकार ‘हीरोज’ को उनके हाल पर छोड़ देगी। सैनिकों ने जोखिम उठाए। सरकार इंटरनेशनल कम्युनिटी की मदद करने की बात करती है। इंसान की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कहती है और अचनाक मदद के लिए मना कर देती है। ये रवैया निराश करने वाला है।
























