न्यूयॉर्क3 घंटे पहले
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डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेंगे। ट्रम्प इससे पहले 2016 से 2020 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके हैं।
चाइनीज शॉर्ट वीडियो ऐप टिकटॉक (TikTok) पर फिलहाल अमेरिका में बैन नहीं लग रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प ने शपथ ग्रहण से एक दिन पहले रविवार को अधिकारियों को टिकटॉक को और समय देने का आदेश दिया।
दरअसल यूएस की फेडरल कोर्ट ने टिकटॉक को 19 जनवरी तक अपनी पेरेंट कंपनी बाइटडांस की हिस्सेदारी बेचने के लिए कहा था। जिसके बाद रविवार को अमेरिका में अधिकतर यूजर्स के फोन में एप ने काम करना बंद कर दिया था।
रविवार को ही कुछ घंटो बाद टिकटॉक ने सोशल मीडिया पर एक बयान जारी किया। कंपनी ने लिखा- सर्विस को रिस्टोर किया जा रहा है। हम अमेरिका में टिकटॉक को बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ मिलकर काम करेंगे।
टिकटॉक के सरवाइल को लेकर ट्रम्प ने सोशल मीडिया ट्रुथ पर लिखा-

मैं चाहूंगा कि कंपनी के जॉइंट वेंचर में संयुक्त राज्य अमेरिका के पास टिकटॉक का 50% मालिकाना हक हो। ऐसा करके, हम TikTok को बचाएंगे, इसे अच्छे हाथों में रखेंगे और इसे बने रहने देंगे।


नोट – डेटा सितंबर में जारी प्यू रिसर्च सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार।
17 जनवरी को बैन लगाने का आदेश आया था 17 जनवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए TikTok पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून को मंजूरी दी थी। एपल Hub ने बताया कि अमेरिकी एप स्टोर से Tiktok एप को रिमूव किया जा चुका था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में TikTok यूजर्स को एप खोलने पर ये मैसेज दिखाई दे रहा था – ‘अमेरिका में TikTok पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू किया गया है। दुर्भाग्य से, इसका मतलब है कि आप अभी TikTok का इस्तेमाल नहीं कर सकते। हम भाग्यशाली हैं कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने संकेत दिया है कि वह कार्यभार संभालने के बाद TikTok को फिर से शुरू करने के सॉल्यूशन पर हमारे साथ काम करेंगे।’
क्या था पूरा मामला…
- अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने टिकटॉक ऐप पर बैन लगाने के लिए एक कानून बनाया था।
- बिल पेश करते समय ऐप को राष्ट्रीय सुरक्षा और यूजर प्राइवेसी के लिए खतरा बताया गया था।
- अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट ने ऐप के खिलाफ बिल को 79-18 वोटों से पास किया था।
- इसी साल 24 अप्रैल को बाइडेन ने ऐप पर बैन लगाने वाले इस नए बिल पर हस्ताक्षर किए थे।
- बाइडेन ने आदेश जारी कर बाइटडांस को 9 महीने में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए कहा था।
- तब टिकटॉक के CEO शॉ जी च्यू ने कहा था कि, ‘हम नए कानून के खिलाफ अदालत जाएंगे।’
- टिकटॉक CEO ने बिल को ‘फ्री स्पीच’ के खिलाफ बताते हुए अमेरिकी कोर्ट में याचिका लगाई थी।
- टिकटॉक को उम्मीद थी फेडरल कोर्ट में दलील सुनी जाएगी, लेकिन उसकी उम्मीद खत्म हो गई।
भारत में टिकटॉक सहित 500 से ज्यादा ऐप पर बैन

भारत में जून 2020 में टिकटॉक ऐप को बैन कर दिया गया था। भारत सरकार ने चीनी ऐप्स को देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। भारत-चीन सीमा पर सैन्य झड़प के बाद भारत ने टिकटॉक सहित 59 चीनी ऐप्स पर बैन लगाया था। बैन से कुछ महीने पहले, भारत ने चाइनीज कंपनियों के निवेश पर भी प्रतिबंध लगाया था। भारत में अब तक 500 से ज्यादा चाइनीज ऐप्स पर प्रतिबंध लग चुका है।
चाइनीज कंपनी के वीडियो ऐप टिकटॉप पर पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देने के आरोप थे। इसके अलावा उस पर भारतीयों का डेटा चोरी करने के आरोप का भी सामना करना पड़ा था। सबसे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने इस पर बैन लगाया था। हाईकोर्ट से बैन होने के बाद बाइटडांस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। उसने भी मद्रास हाईकोर्ट का ऑर्डर बहाल रखा था।
भारत में बैन की वजह से इसकी पेरेंट कंपनी बाइटडांस को रोज 5 लाख डॉलर (3.50 करोड़ रुपए) का नुकसान हो रहा है। मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि टिकटॉक की डाउनलोडिंग पर रोक लगाई जाए, इससे पोर्नोग्राफी को बढ़ावा मिल रहा है। इसके बाद सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एपल को गूगल को अपने ऑनलाइन स्टोर से टिकटॉक हटाने के लिए कहा था। दोनों कंपनियों ने ऐप हटा दिया। उस वक्त देश में टिकटॉक के 24 करोड़ यूजर थे।
टिकटॉक ने क्या कहा था बैन के वक्त टिकटॉक इंडिया के CEO निखिल गांधी ने कहा था- हम भारतीय कानून का पालन कर रहे हैं। हम भारतीय कानून के तहत डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा के सभी नियमों का पालन कर रहे हैं। हमने चीन समेत किसी भी विदेशी सरकार के साथ भारतीय यूजर्स की जानकारी शेयर नहीं की है। अगर भविष्य में भी हमसे अनुरोध किया जाता है तो हम ऐसा नहीं करेंगे। हम यूजर की निजता की अहमियत समझते हैं।
भारत में चीन के ऐप्स पर बैन कैसे लगा था साल 2000 में बने IT कानून में एक धारा है- 69A। यह धारा कहती है कि देश की सम्प्रभुता, सुरक्षा और एकता के हित में अगर सरकार को लगता है, तो वह किसी भी कम्प्यूटर रिसोर्स को आम लोगों के लिए ब्लॉक कर देने का ऑर्डर दे सकती है। यह धारा कहती है कि अगर सरकार का ऑर्डर नहीं माना गया, तो सात साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
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