38 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर
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जम्मू- कश्मीर में तीन में से एक चरण की वोटिंग हो चुकी है। हरियाणा में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। इस बीच बड़े राज्य यानी महाराष्ट्र में चुनावी माथापच्ची शुरू हो चुकी है। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने एक तरह से यहाँ प्रचार भी शुरू कर दिया है। अगले महीने निश्चित रूप से यहाँ चुनाव की तारीख़ें घोषित कर दी जाएँगी। भाजपा गठबंधन यानी एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही अब सीट शेयरिंग पर बातचीत कर रहे हैं। दोनों ही तरफ़ सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान हो रही है। कोई भी कम पर मानने को तैयार नहीं है। जिन अजीत पवार को पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे कम सीटें मिलीं वे भी विधानसभा चुनाव के लिए 70-80 सीटें माँग रहे हैं।
उधर दूसरे गुट में कांग्रेस सर्वाधिक सीटों पर दावा ठोक रही है क्योंकि लोकसभा चुनाव में उसका परफ़ॉर्मेंस सबसे अच्छा रहा था। इस बीच उद्धव ठाकरे भी अपने लिए सीटों का मोटा हिस्सा माँग रहे हैं। दोनों तरफ़ मामला फँसा हुआ है। एक तरफ एकनाथ शिंदे चुनाव बाद भी मुख्यमंत्री बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो देवेंद्र फडनवीस के मन में भी सवाल उठता ही होगा कि वे आख़िर कब तक उप मुख्यमंत्री पद पर समझौता करते रहेंगे?

दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे फिर से मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए हुए हैं। आख़िर जिस पद पर बैठने के लिए उन्होंने भाजपा से वर्षों का गठबंधन तोड़ दिया था, उस पद को वे किसी के लिए कैसे छोड़ सकते हैं? यही वजह है कि उद्धव ठाकरे सीट शेयरिंग में अपना पलड़ा भारी रखना चाहते हैं। वे हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अगर इंडिया गठबंधन चुनाव जीत जाता है और उद्धव गुट की सीटें बाक़ी दलों सेकम भी हो तो भी मुख्यमंत्री तो वे ही बनेंगे।
इस बात पर भी चुनाव बाद घमासान होना तय है। शरद पवार गुट तो एक बार उद्धव गुट की बात मान भी लेगा लेकिन कांग्रेस की सीटें ज़्यादा आई तो उसे उद्धव को नेता मानने में बड़ी परेशानी होने वाली है। इसी तरह का संघर्ष एनडीए में भी होनेवाला है। अगर शिंदेगुट की सीटें कम रह जाती हैं और भाजपा को ज़्यादा सीटें मिल जाती हैं तो मुख्यमंत्री पद पर यहाँ भी घमासान हो सकता है। शिंदे के मन में भी सवाल उठता ही होगा कि जिस पद के लिए उन्होंने शिवसेना से बग़ावत की थी, उस पद को कैसे छोड़ दिया जाए?
ख़ैर फ़िलहाल सीटों की शेयरिंग पर माथापच्ची चल रही है। निश्चित ही दोनों तरफ़ के नेता कुछ ही दिन में किसी समझौते पर पहुँच ही जाएँगे, फिर शुरू होगा चुनाव प्रचार का घमासान। दोनों तरफ़ का मुक़ाबला निश्चित रूप से रोचक होने वाला है।









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