पाकिस्तान में लोग हमें काफिर कहते थे। कभी किसी त्योहार पर तिलक लगाकर बाहर नहीं निकल पाए। अगर निकलते तो लोग घूरते थे।
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बाबरी मस्जिद विवाद के बाद हमारे घर पर पत्थर बरसाए गए थे। मोहल्ले के ही एक मुस्लिम परिवार ने जान बचाई। इसके बाद सीधे भारत आ गए और चैन की सांस ली।
अब वहां सपने में भी जाने की नहीं सोचते। इसी साल फरवरी में भारत की नागरिकता भी मिल गई।
इतना कहते-कहते 40 साल के राजेश मेघवाल के चेहरे का भाव पूरी तरह बदल जाता है। उनके चेहरे पर वही पुराना खौफ एक बार फिर तैर जाता है।
पहलगाम (कश्मीर) हमले के बाद एक बार फिर से भारत-पाकिस्तान के बीच तनातनी की स्थिति है। ऐसे में दैनिक भास्कर पाकिस्तान से आए उन परिवारों के बीच पहुंचा, जो करीब 15 साल पहले पाली आकर बस गया था। 2012 में पाकिस्तान से आकर पाली के अलग-अलग इलाकों में कई परिवार बस गए थे। इनमें से कई ने भारत-पाकिस्तान के मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया।
सरदार पटेल नगर में रहने वाले राजेश मेघवाल और इनका परिवार जरूर इस मुद्दे पर खुलकर बात की। इस परिवार ने पाकिस्तान में बिताए अपने दिन याद किए और अनुभव साझा किया।
पढ़िए यह रिपोर्ट..

तस्वीर, राजेश मेघवाल की है जो पेशे से टेलरिंग का काम करते हैं।
कराची की पॉश कॉलोनी में रहते थे पाली के सरदार पटेल नगर में रहने वाले 40 साल के राजेश मेघवाल पुत्र लीलाराम परिवार के मुखिया हैं। वे बताते हैं- हम रहने वाले रिया (नागौर) के हैं। दादा-परदादाओं का कालीन बेचने का काम था। ऐसे में बंटवारे के समय पाकिस्तान के कराची चले गए।
यहां बिहार कॉलोनी में अपना ठिकाना जमाया। कराची की बिहार कॉलोनी यहां के पॉश इलाकों में से एक है। यही मकान खरीदा और 500 परिवार की एक कॉलोनी के बीच हम भी रहने लगे थे। मोहल्ले में काफी मुस्लिम परिवार भी थे।
बोले- पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता
राजेश बताते हैं- मेरा बचपन कराची की गलियों में बीता है। वहीं एक स्कूल में 10वीं तक पढ़ाई की। कालीन बनाने के साथ-साथ बैग बनाने का काम भी शुरू कर दिया था। वहां धर्म को लेकर लोगों ने ज्यादा कट्टरता थी। बाबरी मस्जिद विवाद के बाद ये कट्टरता और बढ़ गई।
इसके बाद 2012 में बाबरी मस्जिद वाला मामला हुआ तो शहर में हिंदुओं को लेकर नफरत फैल गई। इस दौरान हमारे घर पर भी पत्थर बरसाए गए। एक कमरे में डरकर बैठना पड़ा। हालांकि, मोहल्ले के मुस्लिम परिवार ने हमें बचा लिया।
‘तिलक लगाकर बाहर नहीं जा सकते थे’
राजेश बताते हैं- इसके बाद तो हर समय डर रहता था कि कभी कुछ हमारे साथ भी गलत न हो जाए। धर्म का नाम भी खुलेआम नहीं ले सकते थे। तिलक लगाकर बाहर नहीं निकलते थे। डर लगता था कि कौन कैसा है, किसी को पता चल गया कि हम हिंदू हैं तो कहीं कोई नुकसान न पहुंचा दे।

हम बाहर चाय भी नहीं पी सकते थे। कई होटल वाले तो कप में चाय तक नहीं देते थे। बोलते थे कि यह काफिर है। वहां का एक स्थानीय युवक हमारे एक रिश्तेदार की बेटी को भगाकर ले गया था।


राजेश की मां अब खुश हैं, कहतीं हैं। यहां अपने वतन में हैं तो सुरक्षित हैं। वहां डर लगा रहता था।
15 साल पहले भारत आ गए थे
राजेश बताते हैं- फिर घर की महिलाओं को लेकर मन में डर सताने लगा। हमारे साथ भी कभी कोई गलत न हो जाए इसलिए इंडिया आने का मन बना लिया था। पाकिस्तान में अपना मकान और सामान कौड़ियों के भाव बेचकर साल 2012 में हम 16 लोग भारत वापस लौट आए।
यहां आए तो पाली में हमारे कुछ रिश्तेदार रहे थे, इसलिए यहां आकर बस गए। अब फरवरी 2025 में भारतीय नागरिकता मिली तो ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली हो। इंडिया अपना देश है। यहां सुकून, अपनापन महसूस होता है। वहां टेंशन, डर सताता था।

तस्वीर राजेश की बहन कमला की है। वो कहतीं हैं कि डर के मारे पढ़ाई छोड़ दी थी। अकेले बाहर जाना मुनासिब नहीं था।
हाथ-पैरों के नाखून निकाल लिए थे
राजेश की बहन ईश्वरी (37) ने पाकिस्तान के कराची शहर में बचपन बिताया है, वो कहती हैं- साल 2010 की बात है। बिहार मोहल्ले में एक हिन्दू लड़के का वहां से स्थानीय से झगड़ा हो गया। लोगों ने इसे धर्म से जोड़ दिया। इसके बाद अचानक से मोहल्ले में भीड़ आई और कई सौ लोगों ने उसे बुरी तरह मारा। उसके हाथ-पैरों के नाखून निकाल लिए। वह बचाने की गुहार लगाता रहा लेकिन भीड़ के आगे किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उसे बचा सके। उसे तब तक मारते रहे जब तक की उसकी मौत नहीं हो गई।
ईश्वरी ने बताया-

यह मंजर जब अपनी आंखों से देखा तो हमारा पूरा परिवार काफी डर गया। हमें हमारे परिवार की चिंता सताने लगी। भविष्य में कभी हमारे साथ भी इस तरह की घटना हो सकती है। इस डर से पाकिस्तान में सबकुछ छोड़कर इंडिया आ गए।

भाई घर आ जाते तो सांस में सांस आती थी
राजेश की बहन कमला (36) बताती हैं- कराची पाकिस्तान का बड़ा शहर है। लेकिन, हिन्दू परिवारों को वहां मुसलमानों जितना सम्मान नहीं मिलता। मां घर से बाहर हमें अकेले जाने नहीं देती थी। ऐसे में 7वीं तक की पढ़ाई ही कर सके। आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन माहौल कुछ ऐसा था कि घरवालों ने आगे नहीं पढ़ाया। बड़े हुए तो घर से अकेले निकलने में डर लगता था। कुछ गलत न हो जाए हमारे साथ यह डर सताता था। भाई भी काम पर जाते थे तो वापस घर आने पर ही जान में जान आती थी।

परिवार अब यहां रहकर पूजा-पाठ और हिन्दू धार्मिक त्योहारों को मनाता है। वहां उन्हें खुल कर त्योहार मनाने की आजादी नहीं थी।
अब शादी करना हुआ मुश्किल
राजेश की बुजुर्ग मां कहती हैं- पाली में रहकर मजदूरी कर अपना परिवार चलाते हैं। 6 बेटे और 2 बेटियां हैं। लेकिन, अब जाकर एक बेटे राजेश की 2 साल पहले शादी हो पाई है। लोग कहते थे, पाकिस्तान के हैं वापस चले गए तो क्या होगा। कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था। 5 बेटों और 2 बेटियों की अभी भी शादी करनी है। दोनों बेटियों की उम्र ज्यादा हो गई। ऐसे में अब तो उनके मन से भी शादी करने का ख्याल निकल गया। पाकिस्तान से आकर यहां रहने के कारण न तो किसी ने हमें बेटी दी और नहीं हमारे घर से बेटी ली। ऐसे में अब भी 7 बच्चे कुंवारे हैं।
पाली में रह रहे 28 लोग
SP चुनाराम जाट ने बताया कि पाकिस्तान से आए 28 लोग टर्म वीजा पर पाली जिले में रह रहे हैं। जिनमें उनको किसी तरह का खतरा नहीं है। उन्हें पाकिस्तान नहीं भेजा जा रहा है। जिले में कोई पाकिस्तानी, बांग्लादेशी अवैध रूप से तो नहीं रह रहा इसको लेकर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इसके तहत फैक्ट्रियों सहित अन्य जगह काम करने वाले लोगों के दस्तावेज चेक किए जा रहे है। होटल-ढाबों की पिछले चेकिंग की जा रही है। जिले की सुरक्षा बढ़ा दी है।



























