3 घंटे पहले
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दिल्ली में सुपरमून देखा गया। यह साल का सबसे बड़ा और चमकीला चांद है।
दुनियाभर में गुरुवार को सुपरमून दिखाई दिया। इस दौरान चंद्रमा का आकार सामान्य से 14% बड़ा दिखाई दिया। चांद 30% ज्यादा चमकीला भी नजर आया। सुपरमून तब होता है, जब पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी सबसे कम हो जाती है।
इस वजह से चांद ज्यादा बड़ा और चमकीला दिखाई देता है। इस सुपरमून को देखने पर ऐसा लगा जैसे यह पृथ्वी के करीब आ रहा है। दिल्ली, गुवाहाटी, कश्मीर समेत देश के कई हिस्सों में सुपरमून दिखाई दिया।
इस साल यह तीसरा सुपरमून, 15 नवंबर को फिर दिखेगा गुरुवार को चांद पृथ्वी से लगभग 351,519 किमी दूर रहा। जबकि आमतौर पर यह सबसे दूर 4,05,000 किमी और सबसे करीब 3,63,104 किमी होती है। पिछले महीने 18 सितंबर को भी सुपरमून दिखाई दिया था, तब चांद पृथ्वी से 357,485 किमी दूर था।
वहीं, साल का पहला सुपरमून 19 अगस्त को दिखाई दिया था। तब चांद धरती से 361,969 किमी दूर रहा था। साल का चौथा सुपरमून 15 नवंबर को देखने को मिलेगा, तब चांद धरती से 361,866 किमी दूर रहेगा। देश-दुनिया में सुपरमून की तस्वीरें…

दिल्ली में बेहद चमकीला दिखा सुपरमून।

यह दिल्ली के इंडिया गेट की तस्वीर है। यहां सुपरमून देखने के लिए भारी भीड़ जुटी थी।

दिल्ली में रायसीना हिल के ऊपर सुपरमून। इसे देखने के लिए लोग कर्तव्य पथ पर इकट्ठा हुए।

श्रीनगर के हजरतबल दरगाह के पीछे सुपरमून कुछ इस तरह दिखाई दिया।

असम के गुवाहाटी में चांद हल्का लाल रंग का नजर आया। बाद में बादलों में छिप गया।

अमेरिका के शिकागो में एक सड़क से सुपरमून की तस्वीर।

अमेरिका के कोलंबिया में चांद कुछ इस तरह नजर आया।
पिछले साल अगस्त में ब्लूमून दिखा था पिछले साल 1 अगस्त और 30 अगस्त को भी सुपरमून था। 30 अगस्त के सुपरमून को सुपर ब्लू मून कहा गया। दरअसल, चांद की एक साइकिल 29.5 दिन की होती है। जब किसी एक कैलेंडर मंथ में दो बार पूर्णिमा पड़ जाए तो इसे ही ‘ब्लू मून’ कहा जाता है।
1 अगस्त, 2023 को पूर्णिमा थी, फिर 30 अगस्त को दूसरी पूर्णिमा पड़ गई इसलिए इसे ब्लू मून कहा गया। आम तौर पर ऐसा हर 2 से 3 साल में एक बार होता है। 30 अगस्त को फुल मून, सुपरमून और ब्लू मून तीनों पड़ रहे हैं, इसलिए इसे ‘सुपर ब्लू मून’ कहा जा रहा है।
साल 1940 से ये चलन शुरू हुआ कि अगर एक ही महीने में दो फुल मून यानी पूर्णिमा पड़ती है तो दूसरे फुल मून को ब्लू मून कहा जाएगा। चूंकि इसी दिन सुपरमून भी है तो इस दिन चांद बड़ा और चमकदार दिखाई देगा, लेकिन नीला नहीं।
यह होता है सुपरमून चांद धरती के चारों ओर एक अंडाकार कक्षा में चक्कर लगाता है। इसलिए पृथ्वी और चांद के बीच की दूरी हर दिन बदलती रहती है। जब चांद पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूर होता है तो उसे एपोजी (Apogee) कहते हैं। जब चांद पृथ्वी के सबसे करीब होता है तो, उसे पेरिजी (Perigee) कहते हैं।
जब चांद पेरिजी यानी धरती के सबसे करीब हो और पूर्णिमा पड़ जाए, उसे ही सुपरमून कहा जाता है। 1979 में एस्ट्रोलॉजर रिचर्ड नोल ने पहली बार ‘सुपरमून’ शब्द का इस्तेमाल किया था। सुपरमून के वक्त धरती से चांद 14% ज्यादा बड़ा और 30% ज्यादा चमकदार दिखाई देता है।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि चांद की ना ही साइज बदलती है और ना ही चमक। पर उस दिन वह धरती के पास होता है तो उसके बड़े और चमकदार होने का एहसास होता है।

अपोजी में धरती और चांद के बीच की दूरी करीब 4.05 लाख किलोमीटर होती है। पेरिजी में धरती से चांद की दूरी करीब 3.63 लाख किलोमीटर होती है। (Source: NASA)
पूर्णिमा और सुपरमून में क्या रिश्ता है? हर 27 दिन में चांद पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है। 29.5 दिन में एक बार पूर्णिमा भी आती है। हर पूर्णिमा को सुपरमून नहीं होता, पर हर सुपरमून पूर्णिमा को ही होता है। चांद पृथ्वी के आसपास अंडाकार रेखा में चक्कर लगाता है, इसलिए पृथ्वी और चांद के बीच की दूरी हर दिन बदलती रहती है।

जुलाई में होता है सुपर बक मून जुलाई में नजर आने वाले सुपरमून को बक मून भी कहा जाता है। हिंदी में बक का मतलब वयस्क नर हिरण होता है। ऐसा साल के उस समय के संदर्भ में कहा जाता है, जब हिरणों के नए सींग उगते हैं। वहीं, कुछ जगहों में जुलाई के सुपरमून को थंडर मून भी कहा जाता है, क्योंकि इस महीने में बादल गरजना और बिजली कड़कना आम बात है।

जुलाई में दिखने वाले सुपरमून को बक (हिरण) मून भी कहते हैं।





























