पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में इस बार नतीजों ने नया राजनीतिक समीकरण गढ़ दिया। एबीवीपी ने जहां पंजाबी चेहरा उतारकर और अपनी पुरानी टीम को फिर से सक्रिय कर पहली बार यूनिवर्सिटी में भगवा परचम लहरा दिया, वहीं 13 साल बाद सोपू ने भी वापसी दर्ज कराई। काउंसिल का स्वरूप भी इस बार अलग है। एक ओर भगवा झंडे तले एबीवीपी, तो दूसरी ओर सत्थ, जिनकी विचारधाराएं एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।
एबीवीपी की जीत का श्रेय एबीवीपी की पुरानी टीम को दिया जा रहा है, जिसने चुनाव के पूरे समीकरण को बदल दिया। क्षेत्रीय संगठन मंत्री गौरव अत्री के नेतृत्व में पूर्व अध्यक्ष कुलदीप पंघाल, कृष्ण श्योराण, अमित पूनिया और राहुल किर्दौलिया ने अपनी पुरानी टीम के साथ मिलकर रणनीति बनाई और संगठन को मजबूती दी। चुनाव से दस दिन पहले तक एबीवीपी को मुख्य मुकाबले में नहीं माना जा रहा था, लेकिन कृष्ण-कुलदीप की जोड़ी ने बेहतर प्रबंधन और रणनीति से चुनाव का रुख बदल दिया और एबीवीपी ने प्रधान पद पर कब्जा कर लिया। प्रधान पद पर विजयी गौरव सोहल की सोशल मीडिया अपील सबसे प्रभावशाली और दमदार साबित हुई। वहीं, एबीवीपी की दीक्षा भनोट ने पूरा सोशल मीडिया प्रचार संभाला और इस क्षेत्र में पार्टी को अन्य उम्मीदवारों से कहीं आगे रखा। खास बात रही कि रोजाना की नई रणनीति बनती थी और हर तरह के वर्ग के छात्र को साधने के लिए अलग-अलग कैंपेन चलाए गए, जिसका लाभ भी मिला।
गौरव और आदित्य ने पर्दे के पीछे से टीम को रखा एकजुट
साइंस और यूआईईटी में कमजोर मानी जा रही एबीवीपी को पुरानी टीम ने सक्रियता से मजबूत किया और अन्य पार्टियों के समीकरण बिगाड़ दिए। वहीं, यूआईएलएस और केमिकल विभाग में अर्पिता मालिक और सक्षम शर्मा की मेहनत रंग लाई। गौरव अत्री और आदित्य ने परदे के पीछे से पार्टी को एकजुट और मजबूत बनाए रखा। एबीवीपी के सामने अन्य छात्र संगठनों ने शर्त रखी थी कि यदि पुरानी टीम सक्रिय नहीं हुई तो गठबंधन पर विचार होगा लेकिन टीम के सक्रिय होने से एबीवीपी ने सभी बाधाएं पार कर लीं।
पीयू में 13 साल बाद स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पंजाब यूनिवर्सिटी (सोपू) की वापसी हुई है। सोपू लंबे समय से किसी पद पर जीत दर्ज करने के लिए संघर्ष कर रही थी। इस बार अभिषेक डागर ने सचिव के पद पर जीत दर्ज की है। अभिषेक के लिए इस बार सोपू ने पूरी जान लगा दी थी। हरियाणवी गायक मासूम शर्मा ने भी उनके लिए वोट मांगे थे। ये सोपू के लिए काफी खास है, क्योंकि इससे पहले 2012 में सोपू का प्रेजिडेंट बना था। 2012 में सोपू गठबंधन ने सभी चार पदों पर जीत दर्ज की थी। सतिंदर सिंह सत्ती प्रधान बने थे। उन्होंने पूसू-एनएसयूआई के उम्मीदवार अभिनव को 533 वोटों से हराया था।
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पंजाब यूनिवर्सिटी के वीसी ऑफिस के बाहर पटाखे जलाते एबीवीपी समर्थक । – फोटो : अमर उजाला
एबीवीपी और सत्थ में अब पूरे साल रहेगा टकराव
इस बार की काउंसिल काफी अलग है। एक तरफ एबीवीपी है तो दूसरी तरफ सत्थ है। दोनों की विचारधारा बेहद अलग-अलग है। उधर पूसू की एंट्री ने काउंसिल को और अलग रंग दे दिया है। चौथा उम्मीदवार भी फिलहाल इंडीपेंडेंट है लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह एनएसयूआई ज्वाइन कर सकता है। ऐसे में माना जा रहा है पूरे साल काउंसिल के सदस्यों में साफ तौर पर टकराव देखने को मिलेगा।