
नायब सैनी ने पद की शपथ ली
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हरियाणा में अभूतपूर्व विजय के बाद लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का इतिहास रच भाजपा आत्मविश्वास से लबरेज है। इस आत्मविश्वास की चमक शरद पूर्णिमा के दिन पंचकूला में भव्य समारोह में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नायब सिंह सैनी ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेताओं के चेहरों पर देखी जा सकती थी। भाजपा ने कड़े परिश्रम से यह मुकाम पाया है, लेकिन अभी सैनी सरकार के सामने इम्तिहान और भी हैं। चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री बदलने से लेकर टिकट वितरण तक में कठोर निर्णय लेने वाली भाजपा मंत्रिमंडल गठन में भी किसी दबाव में नहीं दिखी। पूर्ण बहुमत से बनी मजबूत सरकार को अब जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
सबसे बड़ी परीक्षा उन वादों को पूरा करने की होगी, जो भाजपा ने चुनाव के दौरान राज्य की जनता से किए हैं। 24 हजार सरकारी नौकरियों की भर्ती के परिणाम शपथ के दिन ही जारी करवाकर सैनी ने संदेश दिया कि वह उन वादों को पूरा करने के लिए संजीदा हैं, जिनकी वजह से चुनाव में उनके व भाजपा के प्रति हरियाणा की जनता ने विश्वास जताया था। यह आगाज अच्छा है। अब 72 पन्नों में परोसे गए संकल्पों को भी एक-एक कर पूरा करना होगा, जोकि इतना आसान नहीं…पर नामुमकिन भी नहीं।
आसान इसलिए नहीं, क्योंकि राज्य की वित्तीय स्थिति इस लायक नहीं है…नामुमकिन इसलिए नहीं, क्योंकि फिर डबल इंजन की सरकार है। अर्थ विशेषज्ञों की मानें तो संकल्प पत्र के वादों को पूरा करने के लिए सालाना करीब 35 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त की आवश्यकता होगी। राज्य पर पौने चार लाख करोड़ का कर्ज पहले ही है। इसलिए केंद्र की मदद की दरकार होगी। डबल इंजन की सरकार को फिर चुनने की सैनी की अपील पर जनता ने जो मुहर लगाई है, अब उसकी सुखद परिणति की प्रतीक्षा भी होगी। महिलाओं को प्रतीक्षा होगी कि कब उन्हें लाडो लक्ष्मी योजना के तहत प्रतिमाह 2,100 रुपये मिलने लगेंगे। रोजगार के मुद्दे, खासकर बिना पर्ची-खर्ची के नौकरियां देने के भाजपा का नारा काम कर गया…इसलिए युवाओं को प्रतीक्षा होगी कि कब पांच लाख पक्की नौकरियां मिलेंगी। पांच सौ रुपये में रसोई गैस का सिलिंडर मिले, इसके लिए सब्सिडी कैसे दी जाएगी, यह तय करना होगा।
भाजपा ने कांग्रेस की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी तो नहीं दी, लेकिन 24 फसलों पर एमएसपी देने की बात कही है और उसे यह तत्काल सुनिश्चित करना होगा। सरकार का दावा रहा है कि वह 14 फसलों पर तो पहले ही एमएसपी दे रही है। शंभू व खनौरी बॉर्डर पर अब भी जमे बैठे किसानों का धरना सरकार कैसे खत्म करवाती है, यह देखना होगा। यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि आंदोलन के कई निहितार्थ भी अब कुछ किसान नेताओं के बयानों से सामने आ रहे हैं। शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को पांच लाख मकान देने जैसी घोषणाओं पर अमल इसलिए आसान हो सकता है कि इस जैसी कुछ योजनाएं पहले से ही चल रही हैं, उन्हें आगे बढ़ाना है।
सरकार इस बार बैसाखियों के सहारे नहीं
सरकार इस बार बैसाखियों के सहारे नहीं है। पिछली बार जननायक जनता पार्टी से गठबंधन मजबूरी थी और कार्यकाल के अंतिम साल में गठबंधन तोड़ना मजबूरी बन गया। इस बार ऐसी कोई मजबूरी नहीं है, इसलिए उपमुख्यमंत्री बनाने जैसी नौबत नहीं आई।
- चुनाव में प्रभावशाली सोशल इंजीनियरिंग के बाद अब सरकार में सभी जातियों, आयु वर्ग, युवाओं-महिलाओं के साथ-साथ क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने से न केवल सीएम मजबूत होंगे, बल्कि भाजपा ने उन राज्यों को भी संदेश दिया है, जहां अब चुनाव होने जा रहे हैं। शाह ने एक दिन पहले पंचकूला से ही यह हुंकार भी भरी कि भाजपा का यह विजय रथ अब रुकेगा नहीं।
मंत्रिमंडल गठन में कूटनीतिक संदेश
मंत्रिमंडल गठन में कूटनीति है। जहां तक जातीय व क्षेत्रीय आधार की बात है, तो जिसने जितना दिया, उसने उतने पाया है। भाजपा को सर्वाधिक सीटें जीटी रोड बेल्ट व अहीरवाल-ब्रज क्षेत्र में मिली हैं। जीटी रोड बेल्ट से पांच मंत्री बनाए गए हैं, जबकि अहीरवाल व मेवात-ब्रज से दो-दो। जाट बहुल देसवाली व बागड़ बेल्ट से एक-एक मंत्री है। मुख्यमंत्री समेत पांच मंत्री ओबीसी से हैं, जबकि जाट, ब्राह्मण व अनुसूचित जाति से दो-दो। पंजाबी, राजपूत व वैश्य समुदाय से एक-एक मंत्री बनाया गया है।
भाजपा व सरकार ही नहीं, सैनी भी हुए मजबूत
भाजपा व सरकार के साथ खुद सीएम सैनी भी मजबूत होकर उभरे हैं, क्योंकि चुनाव उन्हें सीएम के रूप में आगे रखकर लड़ा गया। हालांकि पर्दे के पीछे पूर्व सीएम मनोहर लाल की भूमिका भी कम नहीं रही। जनादेश ने साबित किया कि सैनी को सीएम के रूप में स्वीकार किया गया है। कुछ नेताओं में सीएम पद की महत्वाकांक्षाएं थीं, लेकिन अमित शाह ने खुद मोर्चा संभाला और सैनी की पीठ थपथपा कर सभी को संदेश दे दिया कि शीर्ष नेतृत्व की पसंद ही सभी को माननी पड़ेगी। हालांकि अनिल विज जैसे पुराने व मुखर रहने वाले मंत्रियों को साथ लेकर चलने में सैनी की कूटनीतिक परीक्षा होगी।
मृदुभाषी व विनम्र सैनी के लिए सुखद यही है कि बतौर विधायक, सांसद, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और अब मुख्यमंत्री परफार्मेंस के स्तर या सियासी तौर पर उनके खिलाफ कुछ नहीं है। करीब छह माह की पहली पारी में उनका तर्क यह रहा कि उन्हें काम के लिए केवल 56 दिन ही मिले। इसलिए सही मायने में आज से उनके मुख्यमंत्रित्वकाल की नई व सही मायनों में शुरुआत है। अब 56 इंच का सीना करके चुनौतियों का सामना करते हुए हर मोर्चे पर खरा उतरना होगा।













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