
हरियाणा विधानसभा चुनाव
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हरियाणा में निर्दलीय प्रत्याशी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के समीकरण बनाते और बिगाड़े रहे हैं। आज तक हरियाणा में एक भी ऐसा विधानसभा चुनाव नहीं हुआ है, जिसमें निर्दलीय न जीते हों। मतलब हर विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों ने विधानसभा में दस्तक दी है। हरियाणा बनने के बाद से अब कुल 117 निर्दलीय विधायक विधानसभा में पहुंच चुके हैं। इस बार भी 90 सीटों पर 462 से अधिक निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी रण में उतरे हैं।
खास बात यह है कि इनमें 40 उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस के बागी हैं। इनमें से 17 कांग्रेस के और 23 नेता भाजपा छोड़कर निर्दलीय रण में उतरे हैं। हालांकि, सोमवार तक नाम वापस लिए जा सकते हैं। इसके बाद निर्दलीयों की स्थिति साफ हो जाएगी। प्रदेश में चार सीटें ऐसी हैं, जहां पर निर्दलीयों का वर्चस्व रहा है।
हरियाणा बनने के बाद से 1967 से लेकर आज तक 13 विधानसभा चुनावों में हर बार निर्दलीयों ने उपस्थिति दर्ज कराई है। 1967 और 87 में तो 16-16 निर्दलीय विधायक चुने गए थे। आज तक चुने गए 117 निर्दलीय विधायकों में से केवल एक महिला शारदा रानी बल्ल्भगढ़ से विधानसभा में पहुंची हैं। सबसे कम निर्दलीय 2014 और 1991 में 5-5 जीते हैं। खास बात ये है कि निर्दलीय के तौर पर विधानसभा पहुंचने वालों में बागी नेता ही शामिल रहे हैं, जिनकी टिकट गई और वो निर्दलीय चुनाव लड़े।
2019 में भाजपा सरकार की बैसाखी बने थे निर्दलीय
2019 के चुनावों की बात करें तो बागियों ने भाजपा और कांग्रेस का बना बनाया खेल बिगाड़ दिया था। भाजपा को 40 सीटें ही मिल पाईं, इसलिए मजबूरी में भाजपा ने निर्दलीयों को सरकार में शामिल किया। इतना ही नहीं भाजपा को जजपा के साथ भी गठबंधन करना पड़ा। पिछली बार बरवाला से जोगीराम सिहाग, पृथला से नयनपाल रावत, पूंडरी से रणधीर गोलन भाजपा से टिकट के दावेदार थे, लेकिन टिकट नहीं मिला तो नयनपाल रावत और गोलन निर्दलीय चुनाव में उतर गए। जोगीराम सिहाग को जजपा ने टिकट दिया था। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर रणजीत सिंह निर्दलीय उतरे और
देवेंद्र बबली, रामकुमार गौतम, रामनिवास सुरजाखेड़ा और रामकरण काला ने जजपा से चुनाव लड़ा और जीते।
टिकट नहीं मिला तो विज ने अपनी ही पार्टी को हराया
टिकट नहीं मिलने पर अनिल विज ने दो बार निर्दलीय चुनाव लड़ा और अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को हराया। 1996 और 2000 के विधानसभा चुनाव में विज ने जीत दर्ज की। इसी प्रकार इंद्री से भीमसेन मेहता ने चार बार निर्दलीय चुनाव लड़ा। वह 1996 और 2000 में मंत्री भी रहे। इसके बाद से वह कांग्रेस पार्टी में हैं। वहीं, निर्दलीयों ने दलों के समीकरण बनाए भी हैं। 2009 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में निर्दलीयों को मंत्री परिषद में कई अहम पद मिले थे। गोपाल कांडा को गृह राज्यमंत्री तक का दर्जा मिला। इसी प्रकार, ओमप्रकाश जैन, सुखबीर कटारिया और पंडित शिवचरण भी मंत्री बने।




























