मुंबई7 मिनट पहले
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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने हाल ही में एक POCSO मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। बेंच ने कहा कि नाबालिग के साथ यौन अपराध में थोड़ा सा भी पेनिट्रेशन बलात्कार माना जाएगा। साथ ही इस मामले में नाबालिग की सहमति का भी कोई महत्व नहीं होगा।
कोर्ट ने इस फैसले के तहत वर्धा जिले के हिंगनघाट के 38 साल के एक ड्राइवर की अपील खारिज कर दी। उसपर 5 और 6 साल की दो बच्चियों पर यौन हमले की कोशिश करने का आरोप था।
फैसला लिखने वाली जस्टिस निवेदिता मेहता ने ड्राइवर के खिलाफ 10 साल की सजा और 50,000 रुपए के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा-

अमरूद का लालच देकर बच्चियों का यौन शोषण किया
आरोपी ड्राइवर ने 5 और 6 साल की दो बच्चियों को अमरूद का लालच दिया और अश्लील वीडियो दिखाकर यौन हमले की कोशिश की। उसे पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और आईपीसी की धारा 376(2)(i) के साथ धारा 511 के तहत दोषी ठहराया गया।
जस्टिस मेहता ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने बच्चियों और उनकी मां के बयानों, मेडिकल और फोरेंसिक सबूतों के आधार पर मामले को साबित किया। उन्होंने यह भी कहा कि 15 दिन बाद हुए मेडिकल जांच में बच्चियों के निजी अंगों पर चोट न मिलने से आरोपी की हरकत को ‘कोशिश’ मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि बयान भरोसेमंद थे।
आरोपी का दावा- पारिवारिक दुश्मनी के कारण फंसाया
आरोपी ने पारिवारिक दुश्मनी के आधार पर झूठा फंसाने का दावा किया, लेकिन कोर्ट ने इसे सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया।
FIR दर्ज करने में देरी को भी कोर्ट ने सही माना, बच्चियां बहुत छोटी थीं और आरोपी ने उन्हें धमकाया था। दरअसल, आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने गलती सुधारी, 2014 के कानून के तहत सजा दी
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की एक गलती को भी सुधारा। ट्रायल कोर्ट ने जब इस मामले में सजा सुनाई थी, तो 2019 के संशोधित POCSO एक्ट के तहत सजा दी गई थी।
हाईकोर्ट ने इसे गलत बताते हुए कहा कि जब अपराध 2014 में हुआ था सजा भी उस वक्त के कानून के आधार पर मिलेगी। यह अपराध 19 फरवरी 2014 को हुआ था, इसलिए उस समय के कानून के आधार पर सजा दी जानी चाहिए थी।
जस्टिस मेहता ने कहा कि 10 साल की सजा उस समय के कानून के अनुसार सही थी और इसमें बदलाव की जरूरत नहीं है।
POCSO केस में पीड़ित को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने POCSO मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया था कि जमानत याचिकाओं में पीड़ित बच्चे या उसके अभिभावकों को पक्षकार के रूप में शामिल करना जरूरी नहीं है। लेकिन उन्हें सुनवाई का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए।
जस्टिस संदीप शाह ने क्रिमिनल बेल एप्लिकेशन में आरोपी द्वारा दाखिल याचिका पर यह फैसला सुनाया है। पूरी खबर पढ़ें…
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