चंडीगढ़। ऑफिस ऑफ डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑडिट (सेंट्रल) चंडीगढ़ की हालिया ऑडिट रिपोर्ट में कैपिटल प्रोजेक्ट डिवीजन-6 की गंभीर लापरवाही उजागर हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व धरोहर स्थल कैपिटल कॉम्प्लेक्स के संरक्षण, पुनर्स्थापन और प्रबंधन के लिए बनाए गए प्रोजेक्ट पर 1.18 करोड़ रुपये का खर्च व्यर्थ चला गया, क्योंकि आठ साल बीत जाने के बाद भी काम पूरा नहीं हो सका।
ऑडिट में खुलासा हुआ कि वर्ष 2023-24 के दौरान इस डिवीजन ने पंजाब-हरियाणा विधानसभा भवनों की मरम्मत और रखरखाव के लिए परियोजनाएं तैयार की थीं। इसके तहत दो अलग-अलग रफ कॉस्ट एस्टीमेट तैयार किए गए। पंजाब और हरियाणा सिविल सेक्शन के लिए 38 करोड़ रुपये और विधानसभा भवनों के लिए 11.57 करोड़ रुपये। यह कार्य चार चरणों में किया जाना था। इसमें सिविल वर्क, मेन रैंप वर्क, प्लंबिंग, फायर फाइटिंग, एचएवीसी और इलेक्ट्रिकल वर्क शामिल था। ऑडिट दस्तावेजों के अनुसार इन कार्यों के लिए फरवरी 2017 में टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से एक कंसल्टेंट की नियुक्ति की गई थी। कंसल्टेंट को परियोजना का कार्य तीन साल की अवधि में सफलतापूर्वक पूरा करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
पूरा खर्च अनफ्रूटफुल खर्च की श्रेणी में आता हैः ऑडिट
कुल 1.48 करोड़ रुपये के अनुबंध में से विभाग ने मार्च 2019 तक 1.18 करोड़ रुपये का भुगतान जारी कर दिया। इसके बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2025 तक परियोजना का काम पूरा नहीं हुआ और न ही कोई नया टेंडर प्रोसेस शुरू किया गया। इससे यह साफ है कि विभाग की तरफ से खर्च की गई राशि का कोई आउटपुट नहीं मिला। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि यह पूरा खर्च अनफ्रूटफुल खर्च की श्रेणी में आता है, यानी ऐसा खर्च जिससे कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। रिपोर्ट में यह भी है कि जब यह मामला ऑडिट के दौरान विभाग के ध्यान में लाया गया तो विभाग की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया।
प्रोजेक्ट्स की धीमी रफ्तार पर भी आपत्ति
इंजीनियरिंग विभाग के कई प्रोजेक्ट्स का भी ऑडिट हुआ है। पाया गया है कि तीन निर्माण कार्यों की प्रगति निर्धारित समय सीमा में धीमी है। इनमें कैपिटल कांप्लेक्स में चल रहे कई काम, सेक्टर-17 का जीर्णोद्धार, जिनमें कई कार्य थे और कैपिटल कांप्लेक्स से जुड़ा एक अन्य काम था। ऑडिट में आया कि इनके काम काफी समय पहले पूरा हो जाना चाहिए था लेकिन एक काम 30 फीसदी को एक 79 फीसदी ही पूरा हुआ है। इंजीनियरिंग विभाग के रिकॉर्ड जांच में यह भी पाया गया कि ठेकेदार एजेंसी की तरफ से कार्य की गति बेहद धीमी रही जिससे निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं हो सके।



























