
दुष्यंत चौटाला।
– फोटो : X @Dchautala
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पारिवारिक कलह और कुर्सी की लड़ाई से जन्मी जननायक जनता पार्टी (जजपा) अब साढ़े पांच साल के सफर के बाद वजूद बचाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है। 2019 के विधानसभा चुनाव में दस सीटें जीतकर उपमुख्यमंत्री बनने वाले दुष्यंत चौटाला की जजपा 2024 में आकर बिखर सी गई है। पार्टी के सात विधायक विधानसभा चुनाव से पहले साथ छोड़ गए। जुलाना से जजपा के टिकट पर जीते अमरजीत ढांडा ही चौटाला परिवार से बाहर के अकेले ऐसे विधायक हैं, जिन्होंने जजपा नहीं छोड़ी।
2019 में अपने दम पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी इस बार आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के साथ गठबंधन में है। जजपा ने 69 व एएसपी ने 16 सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं। तीन सीटों पर जजपा ने निर्दलीय प्रत्याशियों रानियां में रणजीत चौटाला, महम में राधा अहलावत व पूंडरी में सज्जन ढुल को समर्थन दिया है। जजपा के सामने अस्तित्व बचाने के साथ-साथ खुद को देवीलाल का वास्तविक उत्तराधिकारी साबित करने की भी चुनौती है।
दुष्यंत ने इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) से अलग होकर 9 दिसंबर, 2018 को जजपा का गठन किया। पार्टी ने भाजपा, कांग्रेस व इनेलो के बागी नेताओं को टिकट देकर चुनाव में उतारा और दस सीटों पर जीत हासिल की। पहले विधानसभा चुनाव में जजपा ने 14.8 प्रतिशत वोट हासिल किए व सर्वाधिक नुकसान इनेलो को पहुंचाया। 2014 में 19 सीटें जीत मुख्य विपक्षी दल बने इनेलो को 2019 में सिर्फ ऐलनाबाद सीट पर अभय चौटाला जीत दिला पाए।
लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा व जजपा का गठबंधन टूट गया। जजपा को लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। 90 विधानसभा क्षेत्रों में एक पर भी जजपा प्रत्याशी को बढ़त नहीं मिली। जजपा के बागी विधायकों में से कांग्रेस ने सिर्फ रामकरण काला को शाहाबाद से प्रत्याशी बनाया है। इसके अलावा तीन बागी विधायक रामकुमार गौतम सफीदों, देवेंद्र बबली टोहाना व अनूप धानक उकलाना सीट से भाजपा उम्मीदवार हैं। बरवाला विधायक जोगीराम सिहाग, नरवाना विधायक रामनिवास सुरजाखेड़ा व गुहला विधायक ईश्वर सिंह जजपा छोड़ चुके हैं। इसके अलावा झज्जर जिलाध्यक्ष रहे संजय कबलाना भी बेरी से भाजपा प्रत्याशी हैं।
दुष्यंत चौटाला फिर उचाना कलां सीट से मैदान में उतरे हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी और हिसार से भाजपा सांसद रहे बृजेंद्र सिंह से है। बृजेंद्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह के पुत्र हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बृजेंद्र ने हिसार सीट पर दुष्यंत को हराया था। उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में दुष्यंत ने उचाना से भाजपा प्रत्याशी व बृजेंद्र की मां प्रेमलता को हराया था। दुष्यंत के छोटे भाई दिग्विजय इस बार डबवाली सीट पर अपनों से ही मुकाबला कर रहे हैं। उनके सामने इनेलो से आदित्य चौटाला व कांग्रेस से अमित सिहाग हैं। ये दोनों दिग्विजय के चाचा लगते हैं। बाढड़ा से विधायक व दुष्यंत की मां नैना चौटाला इस बार चुनाव नहीं लड़ रही हैं।
किसान आंदोलन में साथ न देने के लिए मांगी माफी
चौधरी देवीलाल का सबसे बड़ा वोट बैंक रहे किसानों में इस बात का गुस्सा है कि भाजपा से गठबंधन में रहते हुए दुष्यंत एक बार भी उनकी आवाज सुनने नहीं आए और न समर्थन दिया। किसान आंदोलन के समय दुष्यंत के भाजपा के साथ खड़े रहने से किसानों में जजपा के प्रति अब भी नाराजगी है। इनेलो के वोटबैंक के जरिये बढ़ी जजपा को किसान अपने साथ देखना चाहते थे। सरकार से अलग होने के बाद दुष्यंत ने भी माना है कि किसान आंदोलन के समय भाजपा का साथ देकर उन्होंने बड़ी गलती की थी। उन्होंने किसानों से इसके लिए माफी मांगी है। हालांकि उनका कहना है कि जजपा के सरकार से अलग होने के बाद भी भाजपा जोड़-तोड़ कर सरकार बना लेती।
जाट-दलित गठजोड़ के साथ युवाओं पर दांव : जजपा जातीय समीकरणों को साधकर हरियाणा में अपना सियासी वजूद बचाना चाहती है। इनेलो-बसपा गठबंधन के बाद जजपा ने भी जाट और दलित वोटों के गठजोड़ पर फोकस किया। दलित मतदाताओं को साधने के लिए दुष्यंत ने एएसपी के साथ गठबंधन किया है। इसके अलावा पार्टी ने इस बार तीन मुस्लिम प्रत्याशियों को भी टिकट दिया है। जजपा ने इस बार अधिकतर युवा प्रत्याशियों को टिकट दिया है। पार्टी ने 45 साल से कम उम्र के 34 उम्मीदवार उतारे हैं।
पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को रोक नहीं पाए : पिछले चुनाव में लोगों ने भाजपा के खिलाफ जजपा को वोट दिया था, पर दुष्यंत ने भाजपा के साथ ही सरकार बना ली। इससे उपजे गुस्से को दुष्यंत भी पहचान रहे हैं और डिप्टी सीएम रहते केवल अपने विकास कार्यों को गिना रहे हैं। दुष्यंत यह भी कह रहे हैं कि वे अब भाजपा के साथ कभी नहीं जाएंगे। दुष्यंत पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं को रोक नहीं पाए आैर न किसी बड़े चेहरे को पार्टी से जोड़ पाए।



























