
नायब सिंह सैनी और भूपेंद्र हुड्डा।
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1966 में जन्मे हरियाणा में जब भी कोई सरकार बनी है, उसके लिए सत्ता की राह हमेशा बांगर की धरती से होकर गुजरी है। अपनी अलग बोली और मुखर अंदाज के चलते इस धरती के मतदाताओं ने जिस भी नेता को पकड़ा, उसको कभी छोड़ा नहीं।
कांग्रेस का बड़े चेहरों पर दारोमदार
राजनीतिक समझ यहां के आम व खास व्यक्ति की नस-नस में बसी है। इस बार इस बेल्ट में कांग्रेस का अपने बड़े चेहरों पर दारोमदार है तो भाजपा को अपने संगठन और बागियों से आस है। इस क्षेत्र में जजपा से टूटकर तीन विधायक भाजपा में आ चुके हैं और एक आने की तैयारी में है।
बांगर बेल्ट में भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जिसका पूरी बेल्ट में प्रभाव हो। पिछली बार मजबूत स्थिति में रही जजपा की इस बार सियासती जमीन खिसकी हुई है। वहीं, इनेलो को बसपा के सहारे पुराने गढ़ में दोबारा वापसी की कोशिश में है।
बांगर में 13 विधानसभा सीटें
क्षेत्र के हिसाब से बांगर में विधानसभा की 13 सीटें हैं। इनमें जींद जिले की 5, कैथल की 4 और फतेहाबाद जिले की टोहाना और हिसार की उकलाना सीटें आती हैं। इनमें सबसे अधिक सीटें 8 सीटें जजपा और 3 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस और निर्दलीय 1-1 विधायक है। कांग्रेस के पास यहां पर पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह, रणदीप सुरजेवाला और जेपी के रूप में बड़े चेहरे हैं। भाजपा जींद के विधायक कृष्ण मिढ्डा, कैथल विधायक लीला राम और पूर्व मंत्री कमलेश ढांडा के ही भरोसे है। कांग्रेस के पास संगठन नहीं है, जबकि भाजपा का जमीनी स्तर पर मजबूत कैडर है। भाजपा चेहरों की बजाय संगठन के दम पर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की जुगत में है।






























