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EXCLUSIVE: अमेरिका का UN की संस्थाओं से अलगाव ‘आत्मघाती’ या दुनिया को ‘बड़ा झटका’? अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने समझाई एक-एक बात

by India News Online Team
January 9, 2026
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EXCLUSIVE: अमेरिका का UN की संस्थाओं से अलगाव ‘आत्मघाती’ या दुनिया को ‘बड़ा झटका’? अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने समझाई एक-एक बात
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Trump UN withdrawal- India TV Hindi
Image Source : AP
ट्रंप का फैसला पूरे ग्लोबल सिस्टम के लिए बड़ा सवाल है।

जिस अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की Entities और तमाम वैश्विक संस्थाओं को बनाने में अहम रोल निभाया था, आज वही उनसे अलग होने जा रहा है। अब सवाल है कि क्या अमेरिका के बिना भी वैश्विक सहयोग टिका रहेगा या फिर दुनिया के बाकी देश अपने नए नेता को तलाश लेंगे? और क्या अनजाने में ट्रंप ने BRICS, यूरोप  या चीन के लिए ग्लोबल लीडर बनने का दरवाजा खोल दिया है? इन्हीं मुश्किल सवालों के जवाब जानने के लिए INDIA TV ने EXCLUSIVE बातचीत की अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट डॉ. मोनीश तौरंगबाम से, जिन्होंने विस्तार से समझाया कि ट्रंप का यह कदम, अमेरिका समेत पूरी दुनिया को किस तरफ ले जा रहा है। पढ़ें अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।

सवाल- 31 संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं और 35 अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने का ट्रंप का फैसला पूरे वैश्विक सिस्टम के लिए एक बड़ा झटका कैसे है? इससे वैश्विक सहयोग किस तरह गंभीर संकट में पड़ सकता है?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बदलाव है, और हम लगातार एक के बाद एक बदलाव देख रहे हैं। खास तौर पर तब से, जब ट्रंप प्रशासन या ज्यादा स्पष्ट कहें तो ट्रंप का दूसरा कार्यकाल वॉशिंगटन डी.सी. में सत्ता में आया है।

उन्होंने कहा, ‘अगर हम सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों और खासकर अमेरिकी विदेश नीति को देखें, तो एक बात साफ है कि भू-राजनीतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है। हम सभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर वास्तव में हो क्या रहा है। इसका अमेरिका पर और पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘ट्रंप ने जो फैसला लिया है, वह मुझे तो इतना चौंकाने वाला नहीं लगता, क्योंकि पिछले करीब डेढ़ साल में उन्होंने अमेरिका और दुनिया के प्रति जिस तरह का बदलाव पेश किया है, उसे देखते हुए यह फैसला अपेक्षित ही था। तुरंत प्रभाव के संदर्भ में देखें तो इस फैसले का व्यापक असर दुनिया के लिए एक झटके के रूप में सामने आएगा और इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिकी नेतृत्व के प्रति अविश्वास बढ़ेगा।’

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि मेरे हिसाब से यही इसका व्यापक या मैक्रो स्तर का प्रभाव है। अब देखने वाली बात यह है कि इसका मध्यम अवधि में क्या असर होगा। यह समझना बहुत मुश्किल है कि इसका मिड-टर्म प्रभाव क्या होगा। बाकी देश, अमेरिका के इस बदलाव पर औपचारिक रूप से कैसे प्रतिक्रिया देंगे, यह हमें देखना होगा।

उन्होंने कहा, ‘इसका एक दीर्घकालिक प्रभाव भी है, जिसका जिक्र आपने अपने सवाल में किया है। लंबी अवधि में यह सवाल उठेगा कि क्या अमेरिका की जगह कोई दूसरा देश वैश्विक नेतृत्व की भूमिका संभालेगा या नहीं। मेरे अनुसार, तत्काल प्रभाव में यह फैसला दुनिया के लिए एक बड़ा झटका होगा और इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिकी नेतृत्व को लेकर बढ़ता अविश्वास और गहरा होगा। क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो वैश्विक व्यवस्था और विश्व व्यवस्था की संरचना बनी थी, उसमें अब बड़े स्तर पर बदलाव आ चुका है।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था में अमेरिका ही वह वैश्विक शक्ति था, जिसने मौजूदा विश्व व्यवस्था और उसकी संस्थाओं को बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। इस लिहाज से यह एक विशेष मामला है। यह एक तरह का निर्णायक मोड़ है, जहां वही देश, जिसने वैश्विक व्यवस्था और उसके संस्थानों को गढ़ा, अब खुद उस व्यवस्था से पीछे हट रहा है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि इसका मध्यम अवधि में क्या असर पड़ने वाला है।’

सवाल- अमेरिका पारंपरिक रूप से संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों को सबसे बड़ा फंड देने वाला देश रहा है। क्या अमेरिकी भागीदारी और फंडिंग के बिना ये संस्थाएं टिक पाएंगी?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह चर्चा होती रही है कि संयुक्त राष्ट्र आज भी प्रासंगिक है या नहीं। संयुक्त राष्ट्र किस हद तक वैश्विक घटनाओं और खासकर वैश्विक संकटों को नियंत्रित या प्रभावित कर सकता है?

उन्होंने कहा, ‘हम देख रहे हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच काफी समय से युद्ध चल रहा है। गाजा में भी संकट जारी है। कई देशों में अलग-अलग तरह के संकट चल रहे हैं। इन सबको देखते हुए यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है कि आखिर संयुक्त राष्ट्र को शुरू में किस उद्देश्य से बनाया गया था, और क्या आज वह सच में प्रासंगिक है या नहीं।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘हमें यह भी देखना होगा कि संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियां हैं, जो मानव-केंद्रित विकास के क्षेत्रों में काम करती हैं। जैसे सतत विकास के क्षेत्र में, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में। तो यह एक माइक्रो-लेवल प्रभाव है, जैसा कि मैंने पहले सवाल में मैक्रो-लेवल प्रभाव की बात की थी।’

उन्होंने कहा कि माइक्रो-लेवल प्रभाव यह है कि मानव-केंद्रित विकास से जुड़े क्षेत्रों में कहीं रिसर्च हो रही है, कहीं आदिवासी समुदायों पर काम हो रहा है, कहीं आपदाओं से निपटने का काम चल रहा है। ये सभी जमीन पर होने वाले काम हैं, खासकर विकासशील देशों में, जहां संयुक्त राष्ट्र काम कर रहा है और जहां USAID जैसी अमेरिकी एजेंसियां, जिन्हें ट्रंप ने खत्म कर दिया है जो माइक्रो-लेवल पर काम कर रही थीं।

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि यह वह क्षेत्र है जहां अमेरिकी नेतृत्व के हटने का असर गहराई से महसूस किया जाएगा, लेकिन यह असर बहुत कम दिखाई देगा। जो हमें साफ तौर पर दिखाई देगा, वह मैक्रो-लेवल पर होगा। यानी बड़ी शक्तियां इसके बारे में क्या सोच रही हैं, इस पर खूब चर्चा होगी। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी उतना ही जरूरी है कि आने वाले समय में हम उन कम दिखाई देने वाले मुद्दों पर भी चर्चा करें- जैसे जलवायु परिवर्तन या विकास से जुड़ा आकलन। जमीन पर इसका असर बहुत बड़ा होगा, लेकिन मेरी समझ में यह असर ज्यादा दिखाई नहीं देगा।

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘इसी वजह से हमें इस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से हटना जमीन पर गहराई से महसूस किया जाएगा, लेकिन वह कम दिखाई देगा और यही कारण है कि यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।’

सवाल- क्या अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं से हटना वैश्विक मंच पर नेतृत्व से पीछे हटने के बराबर है? अगर अमेरिका नहीं, तो फिर दुनिया का नेतृत्व कौन करेगा? नया वैश्विक नेता बनकर कौन उभर सकता है?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, लेकिन इसका जवाब सीधा नहीं हो सकता।ट्रंप ने एक ऐसे दौर की शुरुआत की है, जिसे मैं ‘Naked Realism’ कहूंगा। जब वैश्विक ढांचे टूटते हैं और विश्व व्यवस्था Transition के दौर से गुजरती है, तो चारों तरफ बहुत ज्यादा अराजकता और भ्रम होता है।

उन्होंने कहा, ‘2026 की शुरुआत 2025 से भी ज्यादा भ्रम और अव्यवस्था के साथ हुई है, और हम अभी नए साल के सिर्फ 5-6 दिन ही आगे बढ़े हैं। सरकार की तरफ से जारी फैक्ट शीट को देखें तो साफ दिखता है कि अमेरिकी संप्रभुता और अमेरिकी हितों पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है कि ‘हम उन संगठनों से बाहर निकल रहे हैं जो अमेरिकी हितों और अमेरिकी नागरिकों की सेवा नहीं कर रहे।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘इससे वैश्विक सहमति, वैश्विक चिंता और वैश्विक जिम्मेदारियों को लेकर अमेरिकी सोच में बड़ा बदलाव दिखता है। आर्थिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर एक नई सोच और नई रणनीति सामने आई है। मेरे अनुसार, सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जो विश्व व्यवस्था पहले कुछ हद तक अनुमानित थी, वह अब काफी हद तक अप्रत्याशित हो गई है। इसलिए आपका सवाल कि अगला वैश्विक नेता कौन होगा, इसका जवाब आसान नहीं है।’

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि वैश्विक नेता बनना सिर्फ भौतिक क्षमताओं पर निर्भर नहीं करता। हां, भौतिक क्षमता जरूरी है, आपके पास कितने संसाधन हैं, आपकी आर्थिक शक्ति कितनी है, आपकी राजनीतिक और सैन्य ताकत कितनी है।

उन्होंने कहा, ‘एक और अहम चीज है- इरादा। क्या आपके अंदर वैश्विक नेतृत्व करने की इच्छा और मंशा है? और अंत में, मैं जिस शब्द पर सबसे ज्यादा जोर देना चाहता हूं, वह है Legitimacy. आप बाकी देशों के सामने अपनी वैश्विक नेतृत्व की Legitimacy कैसे स्थापित करते हैं? बिना वैश्विक समर्थन के कोई भी देश वैश्विक नेता नहीं बन सकता।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘जो कुछ अभी हो रहा है, उसका एक अहम पहलू यह है कि मॉडर्न हिस्ट्री में पिछले 100 साल में इस तरह का बदलाव शायद ही कभी देखने को मिला हो। इसलिए, हम अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ से गुजर रहे हैं, जहां वैश्विक नेता, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का व्यवहार काफी अनियमित, अप्रत्याशित और लेन-देन पर बेस्ड है। इसीलिए हम आजकल इतनी सारी अप्रत्याशित बातों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसके बारे में कैसे सोचते हैं?’

सवाल- चीन की अर्थव्यवस्था तो काफी बड़ी है, उसके पास संसाधन भी ज्यादा हैं और उसकी सैन्य ताकत भी मजबूत है। क्या चीन के पास दुनिया का नेतृत्व करने का अवसर है? या फिर BRICS या यूरोपीय संघ जैसा कोई और संगठन यह भूमिका निभा सकती है?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि यूरोपीय संघ और अमेरिका के रिश्ते भी बदल रहे हैं। और अंत में, यूरोपीय संघ भी देशों का एक समूह है। उसे आप एक देश की तरह नहीं देख सकते। यूरोपीय संघ के भीतर भी आपसी सहमति बनानी पड़ती है। यूरोपीय संघ के कई देश NATO के भी सदस्य हैं, और NATO व अमेरिका के रिश्ते भी यूक्रेन-रूस युद्ध की वजह से अपने बदलाव और Transition के दौर से गुजर रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘BRICS की अध्यक्षता 2026 में भारत को मिलने वाली है। ऐसे में बहुत से लोग यह देखने वाले हैं कि BRICS के मंच पर किन मुद्दों पर चर्चा होगी। BRICS भी अब केवल एक आर्थिक या विकास से जुड़ा संगठन नहीं रह गया है, बल्कि वह धीरे-धीरे वैश्विक मुद्दों और वैश्विक शासन यानी Global Governance से जुड़े विषयों पर भी भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘EU और BRICS जैसे संगठन भी वैश्विक ढांचे का हिस्सा हैं। वे वैश्विक आर्थिक संरचना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन क्या वे उस वैश्विक व्यवस्था की जगह ले पाएंगे, जिसका नेतृत्व अब तक अमेरिका करता रहा है, ये देखने वाली बात होगी।’

उन्होंने कहा कि जैसा कि मैंने पहले भी कहा, चीन के पास अन्य देशों की तुलना में अधिक संसाधन हैं। लेकिन हम ऐसे दौर से भी गुजर रहे हैं, जहां Multipolarity उभरती हुई दिखाई दे रही है। हालांकि, यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि यह Multipolarity किस तरह उभरेगी।

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि क्या कुछ देश मिलकर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अधिक स्थिरता ला पाएंगे? या आने वाले साल में हम और ज्यादा अस्थिरता और अनिश्चितता देखेंगे? यह एक तूफान जैसा दौर है और यह कब शांत होगा, यह कहना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा।

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका जिस तरह से बहुपक्षीय संस्थानों से पीछे हट रहा है, वह निश्चित रूप से Multilateralism का संकट पैदा कर रहा है। और यह Multilateralism का संकट उस उभरती हुई Multipolar व्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है, जिसकी हम कल्पना कर रहे थे।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘अब हमें यह देखना होगा कि BRICS या यूरोपीय संघ किस तरह की भूमिका निभाते हैं, और वे अमेरिकी हितों के साथ किस तरह से तालमेल बिठाते हैं। क्योंकि आने वाले वर्षों में यह लगातार देखा जाएगा कि अमेरिका क्या कर रहा है और बाकी देश उस पर कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं।’

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि आप अमेरिका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि हम सभी उसकी नीतियों के अनुसार प्रतिक्रिया दे रहे हैं और खुद को ढाल रहे हैं। इसलिए सवाल यह नहीं है कि कौन किसकी जगह लेगा। असल सवाल यह है कि संस्थाएं और बड़े व छोटे देश, अमेरिका के साथ मिलकर उभरती हुई नई सहभागिता की शर्तों पर कैसे बातचीत करेंगे। यह व्यवस्था अमेरिका के बिना नहीं होने वाली है। यह ‘माइनस अमेरिका’ की स्थिति नहीं है।

सवाल- अगर संयुक्त राष्ट्र और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अमेरिका को परेशान कर रही थीं, और ट्रंप एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जहां अमेरिकी हित सबसे ऊपर हों, तो क्या आपको लगता है कि ट्रंप संयुक्त राष्ट्र के समानांतर कोई नई वैश्विक व्यवस्था खड़ी करना चाहते हैं, जिसमें सिर्फ अमेरिकी हित साधे जाएं?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि फिलहाल मुझे ऐसा कुछ भी होता हुआ नहीं दिखता। अमेरिकी विदेश नीति में जो कुछ भी हम देख रहे हैं, और ट्रंप जो फैसले ले रहे हैं, वह काफी हद तक अमेरिका के भीतर हो रहे घरेलू राजनीतिक बदलावों का नतीजा भी है।

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका में नवंबर 2026 में मिड-टर्म चुनाव होने वाले हैं, और उससे पहले घरेलू राजनीति को लेकर काफी हलचल है। ऐसे माहौल में ट्रंप अपनी घरेलू राजनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। वे विदेश नीति पर ऐसे फैसले ले रहे हैं, जिनसे रिपब्लिकन पार्टी और खुद उनकी स्थिति घरेलू राजनीति में मजबूत हो सके।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘अमेरिका की घरेलू राजनीति और अमेरिकी विदेश नीति के बीच एक बेहद जटिल रिश्ता है। मेरे हिसाब से मौजूदा हालात में ट्रंप प्रशासन संयुक्त राष्ट्र जैसी किसी समानांतर व्यवस्था को खड़ा करने में रुचि नहीं रखता। जो फैसले लिए जा रहे हैं, उन्हें ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर पेश किया जा रहा है।’

डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि अब सवाल यह है कि क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर ट्रंप उन ढांचों और संस्थाओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिनकी वजह से अमेरिका को वैश्विक नेतृत्व मिला था? यही सबसे बड़ा सवाल है। यह वही सवाल है जो आपने भी पूछा है कि यह नीति अमेरिका के लिए विनाशकारी साबित होगी या फायदेमंद। यह अभी एक खुला सवाल है।

उन्होंने कहा, ‘ट्रंप और उनका प्रशासन मानता है कि वे जो कर रहे हैं, वह अमेरिका, अमेरिकी नागरिकों और अमेरिकी नेतृत्व के लिए अच्छा है। लेकिन खुद अमेरिका के भीतर भी इस पर कोई एकमत नहीं है। डेमोक्रेटिक पार्टी ही नहीं, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बड़ी संख्या में लोग ट्रंप प्रशासन के फैसलों से सहमत नहीं हैं। अमेरिका के भीतर भी यह मंथन चल रहा है कि देश के लिए सही क्या है।’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘अमेरिका की विदेश नीति की दिशा और उसका वैश्विक असर, काफी हद तक इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अमेरिका की घरेलू राजनीति में क्या चल रहा है। इसके ऊपर से अंतरराष्ट्रीय संबंधों का पूरा खेल और उसका ढांचा भी काफी बदल चुका है।’

उन्होंने कहा कि मान लीजिए आप क्रिकेट खेल रहे हैं- कभी वन-डे, कभी टेस्ट। जब तक आपको यह साफ न हो कि फॉर्मेट क्या है, आप सही रणनीति कैसे बनाएंगे? अभी समस्या यह है कि फॉर्मेट बहुत तेजी से बदल रहा है। और जब दुनिया का सबसे ताकतवर देश उस फॉर्मेट को बदलने लगा है, या व्यवस्था को अस्थिर कर रहा है, तो बाकी देशों की रणनीति भी अस्थिर हो जाती है। यही Transition और यही भ्रम आज पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है।

सवाल- ट्रंप ने 2027 के लिए 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट का प्रस्ताव रखा है, जो पहले 1 ट्रिलियन डॉलर था। अमेरिका की सैन्य ताकत पहले से ही दुनिया में सबसे मजबूत है। ऐसे में इसे और मजबूत करके ट्रंप आगे क्या हासिल करना चाहते हैं? उनका क्या प्लान हो सकता है?

जवाब- डॉ. मोनीश तौरंगबाम ने कहा कि यह सिर्फ ट्रंप के दौर की बात नहीं है। हर अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि अमेरिका सबसे ऊपर बना रहे। चाहे ओबामा प्रशासन हो या बाइडेन प्रशासन, हर किसी का लक्ष्य यही रहा है कि अमेरिकी सेना दुनिया की नंबर-वन सैन्य शक्ति बनी रहे। दुनिया के बाकी देशों की तुलना में अमेरिकी रक्षा बजट हमेशा से बहुत ज्यादा रहा है।

उन्होंने कहा, ‘अमेरिका लंबे समय से दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति रहा है, और ट्रंप हों या उनके बाद कोई और। कोई भी अमेरिकी सरकार यह नहीं चाहेगी कि यह स्थिति बदले। लेकिन असली सवाल यह है कि उस सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा?’

अमेरिकी मामलों के एक्सपर्ट ने कहा, ‘आने वाले वर्षों में यह सवाल ज्यादा अहम होगा कि खर्च बढ़ा या नहीं, बल्कि यह कि उस सैन्य ताकत को किस तरह तैनात किया जाएगा। अमेरिकी शक्ति का इस्तेमाल किस तरह होगा, और उसका असर वैश्विक व्यवस्था की स्थिरता, पूर्वानुमान और संतुलन पर क्या पड़ेगा? यही सबसे बड़ा सवाल है, जिस पर हमें आगे ध्यान देना होगा।’ 





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