चंडीगढ़। भाषा केवल शब्दों का संसार नहीं होती। वह हमारी स्मृतियों, संस्कारों, संवेदनाओं और पहचान को अपने भीतर सहेजकर रखती है। हिंदी भी ऐसी ही भाषा है, जिसने समय के साथ अपना स्वरूप बदला, लेकिन अपनी आत्मा को बचाए रखा। कभी यह मां की लोरी में सुनाई दी, कभी कवि की कविता में, कभी कक्षा और शोध की भाषा बनी और फिर रेडियो, दूरदर्शन से होती हुई मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच गई। हिंदी दिवस के अवसर पर शहर के साहित्यकारों, शिक्षाविदों और रचनाकारों ने हिंदी की इसी बदलती यात्रा को अपने-अपने अनुभवों से समझाया। उन्होंने कहा कि हिंदी के शब्द केवल लिखे नहीं जाएं, उनमें भाषा की आत्मा भी सांस ले। संवाद
किताबों से निकलकर कैमरे और मोबाइल स्क्रीन तक पहुंची हिंदी
हिंदी मेरे लिए केवल साहित्य की भाषा नहीं बल्कि समाज, पत्रकारिता, रेडियो, टेलीविजन और डिजिटल माध्यमों से संवाद करने वाली जीवंत भाषा है। लेखक, शोधकर्ता, प्रसारण विशेषज्ञ और मीडिया विश्लेषक के रूप में मैंने लगभग आधी सदी तक हिंदी की बदलती यात्रा को करीब से देखा है। राजस्थान विश्वविद्यालय से प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध प्रयोग विषय पर पीएचडी करते हुए मैंने समझा कि हिंदी को समय के साथ बदलना होगा। टेलीविजन के दौर में ही मुझे इसका एहसास हो गया था। मेरी पुस्तक ‘पॉडकास्ट पत्रकारिता : यूट्यूब पर जादुई कंटेंट का एक नया संसार’ इसका उदाहरण है। मेरे लिए हिंदी कक्षा और किताब तक सीमित नहीं, बल्कि सड़क, समाचार, कैमरे और मोबाइल स्क्रीन की भाषा भी है। -प्रो. डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू
हिंदी का उत्सव एक दिन नहीं, हर शब्द में होना चाहिए
मेरे लिए हिंदी केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं, बल्कि मेरी संवेदनाओं को स्वर देने वाली भाषा है। एक कवयित्री के रूप में मेरी कोशिश रहती है कि मेरी लेखनी में हिंदी की सहजता के साथ उसकी मौलिकता और समृद्ध शब्द-संपदा भी बनी रहे। मुझे सरल भाषा प्रिय है लेकिन हिंदी के सुंदर और विशिष्ट शब्दों को बचाए रखना भी जरूरी मानती हूं, जिनमें भाषा की आत्मा बसती है। इसलिए अपनी कविताओं में कई बार कम प्रचलित और अपेक्षाकृत कठिन शब्दों का भी सचेत प्रयोग करती हूं। कविता इसके लिए सहज माध्यम है। पर्यायवाची और विविध शब्दों के प्रयोग से पाठकों को नए शब्दों से परिचित कराया जा सकता है। मेरा मानना है कि हिंदी का उत्सव केवल एक दिन मनाने से नहीं, बल्कि उसके शब्दों को निरंतर जीवन और लेखन में स्थान देने से होता है। -अन्नू रानी शर्मा, लेखिका, कवयित्री और समालोचिका
नई पीढ़ी के सपनों में हिंदी का सुनहरा कल
हिंदी आज केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बल्कि बदलते भारत की चेतना, संवेदना और सृजनशीलता की सशक्त वाहक बन रही है। युवा रचनाकारों के नए प्रयोग और नए विमर्श साबित करते हैं कि हिंदी समय के साथ चलने वाली जीवंत और समर्थ भाषा है। युवाओं का हिंदी के प्रति बढ़ता रचनात्मक अनुराग इसके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। मेरा विश्वास है कि जिस भाषा में नई पीढ़ी अपने सपने लिखने लगे, उसका भविष्य कभी धूमिल नहीं हो सकता। -डॉ. अनीश गर्ग, उपाध्यक्ष, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी
मीराबाई से महादेवी तक, हिंदी को समृद्ध करता स्त्री-स्वर
मेरे विचार से भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि समाज की संवेदनाओं, अनुभवों और अस्मिता की वाहक है। हिंदी को समृद्ध और संवेदनशील बनाने में महिलाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। मीराबाई से महादेवी वर्मा तक स्त्री-स्वर ने हिंदी को नए अनुभव, भाव और वैचारिक दृष्टि प्रदान की है। आज महिलाएं कविता तक सीमित नहीं हैं बल्कि आलोचना, इतिहास-लेखन, शोध और सामाजिक विमर्शों के माध्यम से हिंदी का दायरा बढ़ा रही हैं। शिक्षण, शोध, साहित्य-सृजन और मीडिया के माध्यम से हिंदी के प्रसार में योगदान दे रही हूं। पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी के दौरान मेरा शोध साहित्य, मिथक, संस्कृति और मानव-मूल्यों के आधुनिक संदर्भों पर केंद्रित रहा है। -डॉ. ममता कालड़ा, असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)
अंग्रेजी से संबंध हों, लेकिन अपनी भाषाई पहचान न छूटे
हिंदी के प्रति मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है। मेरी मां और पिताजी साहित्य पढ़ते भी थे और हिंदी में रचनाएं लिखते भी थे। इसी वातावरण ने मुझे हिंदी के करीब लाया। मैंने हिंदी का भरपूर अध्ययन किया और बाद में अध्यापन से भी जुड़ी रही। कविताएं, समीक्षाएं और यात्रा-संस्मरण लिखने का शौक आज भी मुझे हिंदी से जोड़े हुए है। हिंदी ने मुझे जीवन में बहुत कुछ दिया है। आज हमारे आसपास की हिंदी अपने परिवेश और जरूरतों के अनुसार निरंतर बदल रही है। यह बदलाव केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संवेदनाओं और सोच के बदलते स्वरूप का भी है। सूचना क्रांति ने हमारे अध्ययन और मनन के तौर-तरीकों को प्रभावित किया है। मेरा मानना है कि भाषा हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए अंग्रेजी से संबंध विकसित करने के लिए खुलेपन के साथ विवेक भी जरूरी है। -डॉ. प्रसून प्रसाद, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
मदर और मां के भाव में जो अंतर है, उसे शब्दों में नहीं समझाया जा सकता
मेरे लिए हिंदी केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं, संस्कारों और संस्कृति की पहचान है। मां की लोरी से लेकर बच्चे की पहली किलकारी तक हिंदी हमारे जीवन में रची-बसी है। अंग्रेजी में ‘मदर’ कहने और ‘मां’ कहने के भाव में जो अंतर है, उसे शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। मुझे दुख होता है कि आज अंग्रेजी बोलने वाले को अधिक शिक्षित और हिंदी बोलने वाले को पिछड़ा समझने की मानसिकता बनी हुई है। हिंदी हमें रिश्तों की बारीकी और बड़ों के सम्मान का संस्कार देती है। तुलसी, कबीर, प्रेमचंद और निराला का साहित्य हमारी संस्कृति और समाज का दर्पण है। मेरा मानना है कि हिंदी बोलना गर्व की बात है, शर्म की नहीं। आधुनिक बनने के लिए अपनी भाषा छोड़ना जरूरी नहीं। हिंदी दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हिंदी को बोलेंगे, लिखेंगे, पढ़ेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे। -डॉ. रेखा मित्तल, लेखिका और कवयित्री










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