दिल्ली में हुई बैठक में आकाश आनंद मायावती के साथ नजर आए।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बार फिर भतीजे आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी दी है। आकाश को चीफ नेशनल को-ऑर्डिनेटर बनाया है। यह नंबर-2 की पोजिशन है। यानी, मायावती के बाद अब पार्टी में आकाश होंगे।
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आकाश का अब तक का सबसे बड़ा पद दिया है। इससे पहले वह नेशनल को-ऑडिनेटर थे। मायावती के पार्टी में 3 नेशनल को-ऑर्डिनेटर हैं, जो अब आकाश आनंद को रिपोर्ट करेंगे। 16 महीने में मायावती ने आकाश को दो बार पार्टी से निकाला।
लंबे समय बाद रविवार को राजधानी दिल्ली में पार्टी की ऑल इंडिया मीटिंग हुई। इसमें मायावती के साथ आकाश आनंद पहली बार बैठक में शामिल हुए। वह मायावती के पीछे-पीछे मीटिंग हॉल तक पहुंचे। मायावती के कुर्सी पर बैठने तक आकाश साइड में खड़े रहे।
मायावती ने उन्हें 16 महीने में 2 बार उत्तराधिकारी घोषित किया, लेकिन दोनों ही बार हटा दिया था। आकाश को 3 मार्च को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। 40 दिन बाद, सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बाद मायावती ने उन्हें पार्टी में वापस ले लिया था। इसके बाद से ही उन्हें पार्टी में बड़ा पद मिलने की संभावना जताई जा रही थी।

आकाश मायावती के पीछे-पीछे मीटिंग हॉल तक पहुंचे। मायावती के कुर्सी पर बैठने तक आकाश साइड में खड़े रहे।
मायावती ने आकाश को कब-कब जिम्मेदारी दी और कब हटाया? जानिए
- सबसे पहले 10 दिसंबर, 2023 को यूपी-उत्तराखंड के नेताओं की बैठक बुलाई थी। इसमें मायावती ने अपने सबसे छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे आकाश आनंद को उत्तराधिकारी घोषित किया था। पार्टी की विरासत और राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने भतीजे पर विश्वास जताया था।
- 7 मई, 2024 को गलतबयानी की वजह से सभी जिम्मेदारियां छीन ली। आकाश को अपने उत्तराधिकारी पद के साथ ही नेशनल कोऑर्डिनेटर पद से भी हटा दिया था। मायावती ने कहा था कि आकाश अभी अपरिपक्व (इमेच्योर) हैं।
- 47 दिन बाद मायावती ने अपना फैसला पलट दिया था। 23 जून, 2024 को फिर से उत्तराधिकारी बनाया और नेशनल कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी भी सौंप दी, लेकिन 2 मार्च 2025 को उनसे फिर सारी जिम्मेदारियां छीन लीं। कहा था- वे उनके उत्तराधिकारी नहीं हैं। उन्होंने कहा था, ‘मेरे जीते-जी और आखिरी सांस तक पार्टी में मेरा कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा।
- 3 मार्च को उन्हें पार्टी से ही बाहर कर दिया गया। आकाश को पश्चाताप करके अपनी परिपक्वता दिखानी थी। लेकिन, आकाश ने जो प्रतिक्रिया दी, वह राजनीतिक मैच्योरिटी नहीं है। वो अपने ससुर के प्रभाव में स्वार्थी, अहंकारी हो गया है।
- मायावती ने 40 दिन बाद यानी 13 अप्रैल को आकाश को माफ कर दिया था। कहा था- आकाश को उत्तराधिकारी नहीं बनाऊंगी। उनके ससुर की गलतियां माफी लायक नहीं है।
- अब 35 दिनों बाद आकाश को फिर से बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें चीफ नेशनल को-ऑर्डिनेटर बनाया है।

10 दिसंबर 2023 को यूपी-उत्तराखंड के नेताओं की बैठक के दौरान मायावती ने आकाश को उत्तराधिकारी बनाया था।
आकाश के जरिए 3 लक्ष्य साधना चाहती हैं मायावती
- आकाश के जरिए मायावती दलित युवाओं को आकर्षित करना चाहती हैं। अभी चंद्रशेखर से चुनौती मिल रही है।
- सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन की वजह से सपा पश्चिम में दलितों को गोलबंद करने में जुटी हुई है। आकाश दलितों खासकर युवाओं में लोकप्रिय हैं। इससे बसपा को फायदा मिलेगा।
- कांग्रेस ने अहमदाबाद अधिवेशन में जिस तरह से दलित-आदिवासी व पिछड़ों को लेकर संकल्प पारित किया है। इससे भी मायावती असहज महसूस कर रही थीं। इसे लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर कांग्रेस को आड़े हाथों भी लिया था।

मीटिंग में देशभर के BSP प्रभारी, मंडल अध्यक्ष, राज्य अध्यक्ष, सभी स्टेट प्रेसिडेंट्स और कोऑर्डिनेटर्स मौजूद रहे।
रविवार को बैठक में देशभर के BSP प्रभारी, मंडल अध्यक्ष, राज्य अध्यक्ष, सभी स्टेट प्रेसिडेंट्स और कोऑर्डिनेटर्स मौजूद रहे। मीटिंग में बिहार विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 चुनाव को लेकर रणनीति तैयार की गई। 4 प्रमुख बातें पढ़िए
- बिहार विधानसभा चुनाव में अकेले दम पर पूरी तैयारी के साथ उतरने का फैसला। मायावती ने कहा- पार्टी नेअकेले चुनाव लड़ेगी। सभी 240 सीटों पर उम्मीदवार उतारूंगी।
- बीएसपी ने देशभर में पार्टी संगठन को मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने की समीक्षा की। मायावती ने पहलगाम आतंकी हमला (22 अप्रैल, 2025) के जवाब में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के लिए भारतीय सेना की सराहना की। पाकिस्तान की परमाणु धमकी को न सहने की चेतावनी का भी समर्थन किया।
- गौतम बुद्ध और बाबा साहेब अम्बेडकर की प्रतिमाओं के अनादर जैसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकारों से सख्त कार्रवाई की मांग। इसके साथ ही जातिवादी और साम्प्रदायिक तत्वों पर लगाम लगाने की बात कही।
- बहुजन वॉलंटियर फोर्स (बीवीएफ) को पहले की तरह संगठित करने का निर्देश दिया, ताकि पार्टी के कार्यक्रमों में व्यवस्था और अनुशासन बना रहे।

यह आकाश आनंद और डॉ. सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा की शादी की तस्वीर है। इसमें मायावती भी मौजूद रही थीं।
आकाश ने 2017 में राजनीति में की थी एंट्री आकाश आनंद पहली बार 2017 में सहारनपुर की एक जनसभा में मायावती के साथ दिखे थे। इसके बाद वह लगातार पार्टी का काम कर रहे थे। 2019 में उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया। यह फैसला तब लिया गया जब सपा और बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव के बाद टूटा। 2022 के हिमाचल विधानसभा चुनाव में पहली बार आकाश आनंद का नाम स्टार प्रचारकों की लिस्ट में आया था।
आकाश ने लंदन से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) की पढ़ाई की है। आकाश की शादी बसपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा से हुई है।
206 से 1 विधानसभा सीट पर सिमटी बसपा 2007 में 206 विधानसभा सीटें जीतने वाली बसपा की अब हालत ये है कि विधानसभा में सिर्फ एक विधायक है। 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के 15.2 करोड़ वोटर में से 12.9 फीसदी वोट बसपा को मिला। उसे कुल एक करोड़ 18 लाख 73 हजार 137 वोट मिले थे।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा की स्थिति नहीं सुधरी। 2019 के लोकसभा में 10 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार खाता भी नहीं खोल पाई। उसका वोट प्रतिशत 2019 में 19.43% से गिरकर 9.35% रह गया। ये विधानसभा चुनाव से भी लगभग 3 प्रतिशत कम था।

महाराष्ट्र-झारखंड के बाद दिल्ली में मायूसी हाथ लगी
महाराष्ट्र-झारखंड के बाद मायावती को दिल्ली विधानसभा चुनाव से भी मायूसी हाथ लगी। उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 69 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी के नेशनल कॉआर्डिनेटर और मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने इस चुनाव में काफी प्रचार किया था।
इसके बावजूद पार्टी के प्रदर्शन पर कोई असर नहीं डाल पाए। आलम ये रहा कि पार्टी के अधिकतर प्रत्याशी हजार वोट का आंकड़ा भी नहीं पार कर पाए। बसपा को कुल 55,066 (0.58 प्रतिशत) ही वोट मिल पाए।

मायावती फिर से अपना संगठन नए सिरे से खड़ा करना चाहती हैं।
यूपी में 2007 में बसपा का सबसे शानदार प्रदर्शन यूपी की राजनीति में आज भले ही बसपा सुप्रीमो का दबदबा घटता दिख रहा है, लेकिन अब भी पार्टी के पास 10 प्रतिशत के लगभग वोटबैंक है। गठबंधन में ये किसी का भी पलड़ा भारी कर सकता है। बसपा का सबसे शानदार प्रदर्शन 2007 में रहा। तब बसपा अपने बलबूते सूबे की सत्ता में लौटी थी।
विधानसभा में तब उसके 206 विधायक जीत कर पहुंचे थे। पार्टी को तब 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। इस सफलता की वजह सोशल इंजीनियरिंग को माना गया था। बसपा एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में अपने उन्हें सुनहरे दौर में लौटने का सपना बुन रही है।


























