मां हसरत खुद कभी कुछ न बन सकीं। चार साल तक हर दिन डेढ़ किमी पैदल चलकर बेटियों को स्कूल छोड़ती रहीं, ताकि गांव अंगुली न उठाए। आज उनकी बेटी फरमाइश 12वीं में 500 में से 402 अंक लाकर पूरे ब्लॉक में अव्वल है। एक पीढ़ी की अधूरी हसरत अगली पीढ़ी की फरमाइश बनकर पूरी हुई है।
जिस गांव से आज तक कोई लड़की कॉलेज की दहलीज तक नहीं पहुंची थी, वहां से एक साथ दो बहनें पहुंचीं और उनके पीछे चार और लड़कियां चल पड़ीं। अरावली से सटे नूंह के आखिरी गांव घाघस की यह कहानी है फरमाइश की, जो पूरे ब्लॉक में 12वीं टॉपर है। छोटी बहन इंग्लिशा 392 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं।
मां के कदम, बेटियों की उड़ान
इस कामयाबी के पीछे सबसे बड़ा हाथ है मां हसरत का। परिवार गांव से बाहर खेतों में रहता है। रोज बेटियों के डेढ़ किमी पैदल चलकर स्कूल ले जाती और छुट्टी होने पर वापस लाती। आज भी वह तीसरी बेटी को स्कूल से लाने जाती हैं। हसरत कहती हैं, मैं तो कुछ न बन सकी, कम से कम मेरी बेटियां तो कुछ बन जाएं। हम गरीब किसान हैं, पैसे भी नहीं हैं, पर मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने बेटियों को कभी घर का काम नहीं करने दिया। बस एक ही बात कहती रहीं, हम नहीं पढ़ पाए, तुम पढ़ो। जो हम नहीं कर सके, वो तुम करो।
जब पापा ने कहा, बस अब स्कूल बंद
फरमाइश खुद बताती हैं कि हमारे स्कूल में आठवीं तक ही पढ़ाई होती थी। आगे पढ़ने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता, लेकिन न बस थी, न बाहर जाने की इजाजत। परीक्षा से ठीक पहले पापा ने कह दिया, बस अब स्कूल जाना बंद। रोते हुए पूछा, मैं क्यों नहीं पढ़ सकती। पापा बोले, बेटा इतना ही बहुत है, खानदान और गांव में कोई अपनी बेटी को इतना नहीं पढ़ाता।’ फरमाइश ने हार नहीं मानी। पिता से कहा, कोई और नहीं पढ़ा तो क्या, मुझे तो पढ़ने दो। मुझे कुछ बनना है, गांव के लिए कुछ करना है। इसी बीच सरकार ने गांव के स्कूल को 12वीं तक का दर्जा दे दिया। पिता कई दिनों तक नाराज रहे। मां के समझाने पर पहले भाई परवेज माने और फिर उन्होंने पिता मोहम्मद रफीक को भी मना लिया।
उठाना तो गोबर ही है…
राह आसान नहीं थी। खानदान ने खुलकर विरोध किया। कहा गया कि लड़की नाक कटवाएगी। पढ़ाई रोकने की कोशिशें हुईं। फरमाइश बताती हैं कि लोग उनके पापा से कहते थे, कितना भी पढ़ा लेगा, उठाना तो गोबर ही है। बहनें सुबह पांच बजे उठतीं, स्कूल जातीं, लौटकर दो घंटे आराम करतीं और फिर रात सात से 11 बजे तक पढ़ाई करतीं।
- फरमाइश कहती हैं कि हम अपनी पढ़ाई से उन लोगों को जवाब देना चाहते हैं। पापा और भाई हामी न भरते तो हम कभी नहीं पढ़ पातीं। उन्होंने हमारी खातिर समाज और गांव की बातें सुनीं। आज हमें देखकर चार और लड़कियां कॉलेज तक पहुंच गई हैं।’
- अब सपने भी बड़े हैं। फरमाइश पुलिस अधिकारी बनना चाहती हैं, इंग्लिशा सिविल सेवा में जाना चाहती हैं और तीसरी बहन का सपना डॉक्टर बनने का है।























