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संघ के 100 साल: तो शंकराचार्य होते गोलवलकर…जानें- दूसरे सरसंघचालक ने क्यों नहीं स्वीकारा प्रस्ताव – rss 100 years guru golwalkar shankracharya offer sangh ntcppl

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संघ के 100 साल: तो शंकराचार्य होते गोलवलकर…जानें- दूसरे सरसंघचालक ने क्यों नहीं स्वीकारा प्रस्ताव – rss 100 years guru golwalkar shankracharya offer sangh ntcppl

by India News Online Team
December 9, 2025
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संघ के 100 साल: तो शंकराचार्य होते गोलवलकर…जानें- दूसरे सरसंघचालक ने क्यों नहीं स्वीकारा प्रस्ताव – rss 100 years guru golwalkar shankracharya offer sangh ntcppl
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने जैसे चारों शंकराचार्यों को सनातन और भारत की सेवा से जोड़ा था, उतना शायद कोई दूसरा नहीं कर पाया. लेकिन कम लोगों को पता है कि गुरु गोलवलकर के जीवन में ऐसा भी अवसर आया, जब वो खुद भी शंकराचार्य बन सकते थे, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. ये घटना पुरी की गोवर्धन पीठ से जुड़ी है. गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य गोलोक जाने से पहले अपने संभावित उत्तराधिकारी के लिए कुछ नाम लिख गए थे, जिनमें गुरु गोलवलकर का नाम था. लेकिन गुरु गोलवलकर ने इस प्रस्ताव को ये कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इस पवित्र पद के योग्य मैं नहीं. शाखा के जरिए मैं समाज की अच्छी सेवा कर सकता हूं.

रंगा हरि की गुरु गोलवलकर की जीवनी में इस तरह की दूसरी घटना की जानकारी मिलती है, वह गुरु गोलवलकर को गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य के उत्तराधिकारियों के नामों में होने की भी जानकारी देते हैं. वह लिखते हैं कि, “जगन्नाथ पुरी की गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य श्रीमद भारती कृष्णातीर्थ अपना उत्तराधिकारी तय करने से पहले ही गोलोक चले गए. हालांकि उन्होंने अपने सम्भावित उत्तराधिकारियों की एक सूची तैयार की हुई थी. इनमें से एक नाम माधव सदाशिव गोलवलकर यानी गुरु गोलवलकर का भी था. उन्होंने पहले ही द्वारिकाधीश पीठ के शंकराचार्य को उनके बाद की समुचित व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दे रखी थी. जब गुरु गोलवलकर को इसकी सूचना मिली तब वह मई में लगने वाले संघ शिक्षा वर्ग की तैयारियों में जुटे थे. उन्होंने द्वारिकाधीश पीठ के शंकराचार्य को संस्कृत में एक पत्र लिखा, जो उन दिनों बम्बई (मुंबई) प्रवास पर थे”.

इस पत्र में लिखा था कि, “परम पूज्य श्री भारतीकृष्ण तीर्थ की अंतिम इच्छा के रूप में प्रकाशित संभावित उत्तराधिकारी की सूची में मैंने अपना नाम भी देखा. आज तक मैंने कभी ऐसी इच्छा नहीं की. जगद्गुरु के उच्च पद पर आसीन होने के लिए आवश्यक विद्वत्ता, तप, तपस्या आदि जैसे अति महत्वपूर्ण गुणों का मुझमें सर्वथा अभाव है. ऐसे सर्वोच्च गुणों से युक्त कोई विरला महापुरुष ही पूज्य जगद्गुरु पीठ के पद पर आसीन हो सकता है”.

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आपकी आज्ञा का पालन ना करने का पाप मुझे लगा
 
हालांकि रंगा हरि लिखते हैं कि उसके बाद भी गुरु गोलवलकर ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा, उन्हें ये भी अहसास था कि जगदगुरू शंकराचार्य के प्रस्ताव से इनकार करने का अर्थ गलत भी लगाया जा सकता है. सो समय मिलते ही द्वारिकाधीश शंकराचार्य से मुलाकात की और कहा कि, “इससे पहले कि आपकी आज्ञा का पालन ना करने का पाप मुझे लगे, मैं अपना पक्ष भी रखना चाहता हूं”. शंकराचार्य की अनुमति से उन्होंने मना करने का कारण भी बताया कि कैसे डॉ हेडगेवार ने उन्हें जिस लक्ष्य की जिम्मेदारी सौंपी है, वह उसे जीवन भर पूरा करने का संकल्प ले चुके हैं. वह संघ कार्य में पूरा जीवन लगाने की प्रतिज्ञा पहले ही ले चुके हैं. सो ये सम्भव ही नहीं कि इस जीवन में संघ कार्य के अलावा कोई संकल्प या जिम्मेदारी स्वीकार कर पाएं. शंकराचार्य उनसे सहमत थे, फिर भी उनको एक जिम्मेदारी दी कि वो इस कार्य के लिए जयपुर संस्कृत कॉलेज के प्रधानाचार्य चंद्रशेखर शास्त्री से बात करें.

गुरु गोलवलकर ने इसे आज्ञा की तरह लेते हुए गुजरात के प्रांत प्रचारक ब्रह्मदेव से कहकर शास्त्रीजी के साथ एक बैठक रखने के लिए कहा. उसके बाद गोलवलकर खुद जयपुर गए और शास्त्रीजी के घर एक घंटे तक उनसे विस्तार से बातचीत की. चूंकि उन्हें पता था कि शास्त्रीजी के पास शंकराचार्य ने उन्हें केवल संदेशा भेजने के लिए नहीं चुना है बल्कि उस व्यक्ति को परखने के लिए भी भेजा है, सो मुलाकात के बाद उन्हें कहा कि आपको आदरणीय शंकराचार्य ने इस पीठ के पीठाधीश्वर के लिए चुना है तो आपकी विद्वता, ज्ञान, आपके बेदाग चरित्र के चलते चुना है, जिनकी तुलना किसी दूसरे से नहीं की जा सकती. लेकिन मेरी एक छोटी सी प्रार्थना है कि आप इस बड़ी जिम्मेदारी को निभाने से पहले कुछ समय के लिए ध्यान समाधि के लिए जरूर जाएं, दो ढाई महीने के लिए हिमालय जैसी किसी एकांत जगह में जाएं तो बेहतर रहेगा. शास्त्रीजी को शायद वो इस एकांत में इस बड़ी जिम्मेदारी को संभालने से पहले मानसिक रूप से तैयार करना चाहते होंगे और ऐसा ही हुआ भी, समस्या सुलझ भी गई. 
 
पीएम मोदी की किताब में भी उल्लेख

गुरु गोलवलकर के जीवन की ये दिलचस्प घटना खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी किताब ‘ज्योतिपुंज’ में लिखी है. वह लिखते हैं कि, “द्वारका पीठ के शंकराचार्य श्री अभिनव सच्चिदानंदजी ने परम पूज्य गुरुजी को संदेश भेजा: ‘गुरुजी, शंकराचार्य का पद रिक्त है और इसके लिए आपसे अधिक उपयुक्त कोई नहीं है.’ किसी अन्य व्यक्ति के लिए, यह बात अत्यन्त महत्वपूर्ण होती.

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

गुरुजी ने विनम्रतापूर्वक संदेश भेजा: ‘जगद्गुरु! आपकी इच्छा ही मेरे लिए आज्ञा है. किन्तु मैंने पहले ही एक महान कार्य स्वीकार कर लिया है. शाखा ही मेरा धर्म है. मैं शंकराचार्य के रूप में समाज की सेवा करने की अपेक्षा शाखा के माध्यम से अधिक बेहतर सेवा कर सकता हूँ”. ये लिखकर गुरु गोलवलकर ने अपनी असमर्थता जताई लेकिन उन्हें धन्यवाद भी दिया कि इतने पवित्र दायित्व के लिए उनके बारे में सोचा गया. हालांकि पीएम मोदी ने तब इस घटना का उल्लेख ये बताने के लिए किया है कि गुरु गोलवलकर के लिए शाखा कितनी महत्वपूर्ण थी. हालांकि नरेन्द्र मोदी ने शारदा पीठ की खाली गद्दी के लिए ये लिखा है, सो ये दो अलग अलग मामले हो सकते हैं.
 
जब कांची के शंकराचार्य ने उन्हें बताया ‘शिव का अवतार’

पीएम मोदी ने गुरु गोलवलकर और कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य चंद्रशेखर सरस्वती से जुड़ी एक घटना का भी उल्लेख किया है, वह लिखते हैं “एक दिन स्नानादि के बाद शंकर मठ के प्रार्थना कक्ष में शंकराचार्य भागवद गीता की अर्चना करने वाले थे और नियम था कि उनके पहुंचने के बाद से जब तक पूजा खत्म ना हो जाए, प्रार्थना कक्ष में कोई भी प्रवेश नहीं करना चाहिए. बड़ी कड़ाई से ये नियम सालों से लागू था. लेकिन जब उन्हें बताया गया कि गुरु गोलवलकर आए हैं, तो शंकराचार्य ने उन्हें अंदर बुला लिया और फिर दोनों ने मिलकर पूजा की. बाद में शंकराचार्य के शिष्यों ने उनसे पूछा: ‘स्वामीजी, जब आप अंदर प्रार्थना कर रहे होते हैं तो आप किसी को भी अंदर नहीं आने देते, तो आपने गुरुजी को कैसे आने दिया?’ शंकराचार्यजी ने कहा: ‘यह नियम सामान्य लोगों के लिए है, श्री गुरुजी तो शिव के अवतार हैं”. हालांकि पीएम मोदी ने इस घटना की विस्तार से जानकारी देने के बजाय इसे प्रसंगवश ही लिखा है. नरेन्द्र मोदी अपनी किताब में आगे लिखते हैं कि, “जब पू. गुरुजी मैसूर के रामकृष्ण मिशन गए, तो उन्होंने उसका विद्यामंदिर देखना चाहा, स्वामी अमिताभ महाराज उनका स्वागत करने के लिए उपस्थित थे और उन्होंने कहा: ‘श्री गुरुजी ने सारगाछी में अपने समय में अत्यधिक प्रयास और धैर्य दिखाया. केवल उन्हीं दिनों के साक्ष्य के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता के रूप में एक ‘नरेंद्र’ (पुरुषों के भगवान) हैं.’
 
धर्म संसद में शंकराचार्यों के सामने मंच से बोलने से झिझके गोलवलकर

विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के बाद 1966 में 22-23-24 जनवरी को पहली धर्मसंसद बुलाई गई थी. उसकी एक घटना का जिक्र सीपी भिषिकर गुरु गोलवलकर की जीवनी में लिखते हैं कि, “समापन वक्तव्य गुरु गोलवलकर ने देते हुए कहा कि मेरे लिए यहां होने या बोलने का कोई अवसर नहीं था लेकिन श्री द्वारका पीठ शंकराचार्य महाराज ने मुझे निर्देश दिया कि इस सम्मेलन में उपस्थित रहो और बोलो भी. मैंने क्षमा याचना की और कहा कि मेरा काम पंडाल साफ़ करना था, और एक स्वयंसेवक होने के नाते मुझे ऐसा करने में खुशी होती. लेकिन मैं शंकराचार्य की अवज्ञा कैसे कर सकता था? मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, इसलिए मैं आप जैसे महान लोगों की सेवा में यहां उपस्थित हूं”.

गुरु गोलवलकर संघ के द्वितीय सरसंघचालक थे. (Photo: ITG)

सच तो ये था कि गोलवलकर एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह वहां हर छोटे बड़े काम के इंतजाम में लगे हुए थे. वह यह देखकर विशेष रूप से प्रसन्न थे कि विश्व हिंदू परिषद का सर्वव्यापी मंच विभिन्न विविध समूहों के बीच अंतर को कम करने और सनातन समाज में आपसी भाईचारे पर आधारित सद्भाव को बढ़ावा देने में अद्वितीय रूप से उपयोगी साबित हो रहा है.

एक बार संघ के दक्षिण के पहले मुख्य प्रचारक और संयुक्त महासचिव यादवराव जोशी से पूछा गया, “आपके अवलोकन के अनुसार, गुरुजी के लिए 33 वर्षों के सरसंघचालक के रूप में सबसे खुशी का अवसर कौन सा था?” उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, “कर्नाटक प्रदेश विश्व हिंदू परिषद के उडुपी में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान, हिंदू समाज के सभी विभिन्न संप्रदायों और वर्गों के धर्माचार्यों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया और चारों जगद्गुरु शंकराचार्यों द्वारा समर्थित, यह घोषणा करते हुए कि हमारे शास्त्रों में छुआछूत या किसी भी प्रकार के ऊंच-नीच का कोई औचित्य नहीं है और सभी हिंदुओं के साथ समान सम्मान और प्रेम का व्यवहार किया जाना चाहिए. प्रस्ताव पारित होने के तुरंत बाद, गुरुजी इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कहा, “यह वास्तव में एक धन्य क्षण है, एक ऐतिहासिक क्षण है” और सम्मेलन की कार्यवाही के संचालक सूर्यनारायण राव से कहा कि इसका स्वागत धर्माचार्यों की ‘जय’ के गूंजते उद्घोष और तालियों से किया जाना चाहिए. भाषण कुछ देर के लिए बाधित हुए और ज़ोरदार तालियां बजीं और ‘जय’ के नारे लगे – जिसमें गुरुजी भी शामिल हुए. उस समय उनका चेहरा सचमुच एक लंबे समय से प्रतीक्षित स्वप्न के साकार होने की खुशी से चमक उठा था. मैं कहूंगा कि उनके लिए यह उनके संघ जीवन का सबसे अच्छा क्षण था.”
 
आखिर क्यों शंकराचार्यों से मिलता था गुरु गोलवलकर को इतना सम्मान

गोलवलकर एक उच्च शिक्षित विद्वान थे, जिन्होंने हिस्लॉप कॉलेज (नागपुर) से विज्ञान और नागपुर विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की थी. बाद में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में वेदांत का उच्च अध्ययन किया, जहां उन्होंने अध्यापन किया और छात्रों से स्नेहपूर्वक ‘गुरुजी’ की उपाधि प्राप्त की. हालांकि बचपन से ही उनको सारे शास्त्र यहां तक कि बाइबिल जैसे दूसरे धर्म ग्रंथों का गहरा ज्ञान था. 1936 में, उन्होंने कुछ समय के लिए सरगाछी (पश्चिम बंगाल) स्थित रामकृष्ण मिशन में संन्यास ग्रहण किया और स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद से दीक्षा ली. उनके अंतिम समय में उनके साथ भी रहे और इसके लिए वो बिना बताए संघ को भी छोड़कर चले गए थे. इससे अद्वैत वेदांत में उनकी विशेषज्ञता और गहरी हुई, जिससे वे हिंदू धार्मिक नेताओं के बीच एक सम्मानित व्यक्ति बन गए थे. उसके बाद संघ का कार्य सभी सनातनियों और भारतीय संस्कृति से जुड़े लोगों को जितना पंसद आ रहा था, उतनी ही समाज के कमजोर तबकों के लिए भी संघ स्वयंसेवक देवदूत साबित हो रहे थे.

पिछली कहानी: तिरंगा, फायरिंग और मौतें… गोवा की मुक्ति में बलिदान होने वाले स्वयंसेवकों की कहानी 

—- समाप्त —-



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