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रामनवमी विशेषः आस्था और प्रभुता से क्यों बढ़कर हैं जन-जन के राम

by India News Online Team
April 17, 2024
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रामनवमी विशेषः आस्था और प्रभुता से क्यों बढ़कर हैं जन-जन के राम
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रामनवमी विशेषः आस्था और प्रभुता से क्यों बढ़कर हैं जन-जन के राम

भारतीय संविधान रचा जा रहा था. ढाई वर्ष का समय बीतते-बीतते संविधान सभा अपने अंतिम चरण में थी. इसी समय डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जब इसके ड्राफ्ट को पेश किया तो संविधान की मूल प्रति में विषयों के अनुसार उसमें चित्रों के चित्रण पर चर्चा हुई. सहमति बनी और तब के चोटी के चित्रकार नंदलाल बोस को ये काम सौंपा गया. बोस ने हजारों वर्षो के भारतीय सामाजिक ढांचे, रहन-सहन और लोगों की भावना-आस्था पर गहन अध्ययन किया और इस आधार पर पाया कि 800 वर्षों के परतंत्र इतिहास के बावजूद इस देश की माटी में वैदिक महत्ता, ऋषि परंपरा रची-बसी है. कोई है जिसका सिर्फ नाम ही करोड़ों भारतीयों को एक साथ न सिर्फ जोड़ता-बांधता है, बल्कि उत्तर के हिमालयी क्षेत्र से लेकर दक्षिण के सागर तट तक के लोगों को एक केंद्र में ले आता है.

यह नाम कोई और नहीं बल्कि प्रभु श्री राम का ही नाम है. आप उन्हें ईश्वर न मानें, आस्था न भी रखें तो भी एक राजा और उससे कहीं अधिक एक मर्यादा पुरुषोत्तम होने की कसौटी पर भी ये नाम खरा उतरता है. संविधान के जिस भाग 3 में मौलिक अधिकारों को जगह मिली है, उस भाग के प्रतिनिधि चित्रण में श्रीराम-सीता और लक्ष्मण को दर्शाया गया है और यह प्रसंग तब का है, जब वह लंका विजय के बाद अयोध्या वापसी करते हैं. सोचिए! बात जब मौलिक अधिकारों की हुई तो घर लौटना, उसका कितना बड़ा पर्याय बना. किसी के घर लौट आना सिर पर छत, परिवार के पोषण के लिए एक स्थान और सुरक्षा तीनों प्रमुख जरूरतों को पूरा करता है. रोटी-कपड़ा-मकान की यही मूलभूत जरूरत न सिर्फ आदमी की चाहत है, बल्कि संविधान की भी कसौटी है. राम का घर आना, यानी इस देश के नागरिकों को घर मिलने-सुरक्षित रहने का वचन है.

असल में भारतीय समाज में राम नाम इतना व्यापक और रचा-बसा है कि भारत की कल्पना इस नाम के बिना नहीं की जा सकती. राम-राम कहिए तो यह सम्मान है. हरे राम-हरे राम कहिए तो कीर्तन, अरे राम! कह दें तो आश्चर्य, हाय राम! कहें तो पीड़ा, सियाराम कहिए तो उत्साह, जय श्रीराम कहिए तो बल… और जीवन का सबसे बड़ा और अटल सत्य है ‘राम नाम सत्य’ होना. सदियां बीत गईं, पीढ़ियां गुजर गईं, कनेक्टिविटी के नए तार जुड़ चुके हैं, बल्कि तार भी नहीं रहे, इसके बावजूद रामनाम से जो कनेक्शन जुड़ा हुआ है, वह आज भी कायम है.


पुराण कथाएं बताती हैं कि राम विष्णु के सातवें अवतार हैं और इसलिए वह धरती पर जन्म लेने वाले भगवान हैं. देश में बने तमाम मंदिरों में बनी उनकी छवि भगवान वाली ही है. फिर भी लोक जनमानस में राम ईश्वर से कहीं ज्यादा हैं. विष्णु के एक और अवतारी श्रीकृष्ण की बालरूप और युगल रूप में बड़ी मान्यता है, लेकिन फिर ऱाम की जो छवियां सरल-सहज आदमी में हैं, वह सबसे अलहदा और अलग है. वह पिता के पुत्र हैं, मां के लाडले हैं, भाई हैं, मित्र हैं, पति हैं, सामाजिक संबंधी हैं और जब एक राजा भी हैं तो वह न्याय की मू्र्ति हैं. उनसे डर नहीं है, बल्कि उनके राज में नागरिक के पास उसकी नागरिकता का सम्मान है.

मिथिला की लोक परंपरा की एक दंतकथा से इसका विवरण भी मिलता है. रामायण में राम द्वारा सीता का त्याग ऐसा प्रसंग है, जो उनकी हर स्थिति में आदर्श वाली छवि पर हल्की धुंध जमा देता है. प्रसंग है कि सीता त्याग के बाद एक दिन राम दरबार में आ रहे थे. दोनों ओर से दास-दासियां उनपर फूल बरसा रहे थे. इसी दौरान जब राम एक दासी के सामने पहुंचते हैं तो वह मुंह घुमा लेती है. राम यह देख लेते हैं, लेकिन आगे बढ़ जाते हैं. कुछ देर बाद वही दासी किसी मंत्री के आने के बारे में सूचना देने पहुंचती है.

तब राम कहते हैं कि, तुम सीता की अंतरंग सखी भी हो, उसके जाने का तुम्हारा दुख मेरे दुख से कहीं अधिक है. इसलिए पहले जो मन में है वो कहो. यह सुनकर सीता की वह सखी रो पड़ती है और कहती है कि मैं मिथिला वालों से कहूंगी कि अब से कोई अपनी बेटी अयोध्या वालों को न ब्याहना. वे बड़े निष्ठुर होते हैं. राम चुपचाप उस सखी की बात सुनते रहते हैं और जब वह खूब रो कर शांत हो जाती है, तब राम उसे जाने देते हैं. 


मिथिला की लोक परंपरा में जहां राम की मान्यता अपने जमाता के तौर पर है, वहीं सीता को त्याग की मूर्ति बताया गया है. सीता के त्याग से जो दुख उपजा, उसका उलाहना पाने से राम भी अछूते नहीं रहे हैं. वहां की परंपरा में एक भजन है, जिसे सीता के सम्मान और उनकी दुख की अवस्था को भांपते हुए गाया जाता है.

सिया धिया हे त्याग सँ तोहर
दबल अयोध्या धाम छै
जैं सीता तखनहि मर्यादा
पुरुषोत्तम श्रीराम छै

इसी तरह हिंदी पट्टी में एक और भजन बहुत प्रसिद्ध है जो महिलाओं के कीर्तन का हिस्सा है और बिना नाम लिए राम की उपेक्षा करता है. इस भजन में काल्पनिक दृष्य रचा गया है, जब सीता वनवास को जा रही होती हैं, तो अपनी सास, देवर सभी को कह रही होती हैं कि मैं तो महल छोड़कर जा रही हूं, कपड़े, गहने, रथ-घोड़े, नौकर-चाकर भी छोड़ जा रही हूं, मेरे पास तो सिर्फ पतिव्रता की मर्यादा है, वही लिए जा रही हूं.

राम दिया बनवास महल को छोड़के जाती हूं….

यह लो री सासुल कपड़े अपने,
इनको रखना संभाल चुनरिया ओढ़े जाती हूं,
राम दिया बनवास महल को छोड़के जाती हूं….

यह लो री ससुर गहने अपने,
इनको रखना संभाल अंगूठी पहने जाती हूं,
राम दिया बनवास महल को छोड़के जाती हूं….

यह लो री सांचौर जूते चप्पल,
इन को रखना संभाल मैं नंगे पैरों जाती हूं,
राम दिया बनवास महल को छोड़के जाती हूं….

अपने ईष्ट, अपने आराध्य जिसकी पूजा-अर्चना में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, उलाहना देने की बात आती है तो भारतीय समाज इससे भी पीछे नहीं हटता, और इतना होने के बावजूद राम की प्रभुता में कोई कमी नहीं आती है. राम इस समाज का नाम हैं, पहचान हैं, खान-पान हैं, पहनावा भी हैं और ओढ़ना-बिछाना भी हैं. यहां कहा भी जाता है कि,

पुकारो- रामदास,
रहो कहां- रामपुर में
खाओ क्या- रामफल, रामभोग
पीया क्या- रामरस
पहना क्या- रामनामी
बैठे किधर- रामटेक
जाना किधर- रामनगर


रामनाम के ओढ़ने-बिछाने की बात हो रही है तो,  रामनाम को समर्पित रामनामी संप्रदाय का जिक्र जरूरी हो जाता है. छत्तीसगढ़ के जांजगीर के एक छोटे गांव चारपारा से स्थापित हुआ रामनामी संप्रदाय भले ही बहुत बड़ी संख्या के अनुयायियों वाला न हो, फिर भी जो है, जितना है वह अद्भुत है. इस संप्रदाय के लोग पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना गोदवा कर रहते हैं. शरीर पर सफेद वस्त्र पहनते हैं,  जिनपर काले अक्षरों में रामनाम लिखा होता है. वह हाथों में घुंघरू बांधते हैं और झूमते-नाचते राम-राम ही गाते रहते हैं. रामनामी संप्रदाय मानता है कि हमारा शरीर राम का मंदिर है. हमने रोम-रोम में रामनाम को सजा लिया है. 1980 के दौर में शुरू हुए इस संप्रदाय में आज की तारीख में डेढ़-दो लाख लोग शामिल हैं. शरीर पर ही रामनाम को स्थापित कर जीवन जीने वाले ये लोग अपने आप में श्रीराम की छाया हैं और सम्मान के हकदार भी. लोग उन्हें श्रीराम के नजरिए से ही देखते भी हैं.

राम का किरदार, उनका चरित्र और जीवन जीने की शैली, आम भारतीय परिवारों के लिए प्रेरणा रही है. हम किससे क्या बोलें, कैसे बोलें, कैसे रहें, उठे-बैठें ये सामान्य नैतिक शिक्षा को पाना ही राम को जानने की सफलता है. रामनाम और रामायण को लेकर मशहूर एक्टर अशोक कुमार भी कहते थे कि, रामायण एक धार्मिक ग्रंथ होने के साथ ही सांस्कृतिक दस्तावेज है. ये रंग, नस्ल, मुल्क और जाति की सीमाओं से परे हैं और इन्हें पार करके आम इंसान के दिल पर इतना गहरा प्रभाव डालती है कि हर आदमी रोजमर्रा की जिंदगी में इसकी शिक्षा और तालीम से फायदा उठा सकता है. राम सिर्फ पूजा घरों में स्थापित किए गए पौराणिक चरित्र से कहीं अधिक हैं. हम अपनी रोजाना की जिंदगी में जितने भी रिश्ते निभाते हैं, और जैसा भी जीवन जीते हैं, उनका तौर-तरीका क्या होना चाहिए, रामायण और श्रीराम इसके सटीक उदाहरण हैं.

यही वजह है कि, श्रीराम’ कहते ही वाल्मीकि के राम, तुलसी के राम का आध्यात्मिक स्वरूप सामने आता है, लेकिन जब लोक मानस में ‘राम’ को देखते हैं तो वे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं. वह सुख-दुख, आशीर्वाद, श्राप, उलाहना, तंज हर किसी भाव में समाहित हो जाते हैं. दरअसल, लोक के राम बोली के जरिए लोगों की दिनचर्या का हिस्सा हैं. ये हिस्सा ऐसा भाग है जो लोकमानस के भीतर पानी की धार की तरह बह रहा है. यही वजह है कि आज भी ग्रामीण परिवेश के लिए राम ही शुरुआत हैं और राम ही अंत. किसी भी आढ़त पर चले जाइए, जब तौल शुरू होगी तो किलो के पहले तौल को राम कहेंगें. उनकी गिनती राम, दुई, तीन, चार… ऐसे होती है. भोजन की थाली का पहला कौर राम के नाम से लिया जाता है और खाने में नमक कम होने पर रामरस (नमक) मांगा जाता है. पानी राम-राम कहकर पिया जाता है, और हर-हर गंगे के साथ राम सिया राम कहकर स्नान किया जाता है. 


राम की व्यापकता की सार्थकता कई भोजपुरी गीतों और भजनों से भी मिलती है. जहां कोई भी बात हो तो राम को आधार मानकर कह दी जाती है. एक प्रसिद्ध ठुमरी के बोल देखिए, जिसमें एक नायिका बिंदी (टेकुली) खो गई है, और वह यह बात राम से कह रही है.

एही ठैयां टेकुली हेराय गईल रामा…
अंगना में देखली ओसरवो में देखली
देखी अइली पिजया के सेजरिया हो रामा
एहि ठैयां टेकुली

इसी तरह खेतिहर-किसानों की महिलाएं जब खेतों में धान काटती हैं, तो अपनी ही बोली में राम नाम लेकर गाती हैं. यह गीत प्रश्नोत्तरी पर आधारित है. इसकी एक बानगी देखिए.

रामजी रामजी हंसुआ द
उ हंसुआ काहे के
धनवा कटावे के
उ धनवा काहे के
चउरा बनावे के
उ चउरा काहे के
भउजी के खियावे के
उ भउजी काहे के
लइका जनमावे के

लोकगीतों में रचा हुआ अपना समाज बड़ी आसानी से राम को अपने में समाहित कर लेता है. उनके लिए राम अयोध्या के राजा, दशरथ के पुत्र, रावण के शत्रु और ऋषियों के ईष्ट से अधिक उनके अपने ही बीच के कोई सगे ही हैं. वह उनके बीच के ही बेटे हैं, कहीं जेठ हैं, कहीं मालिक, कहीं मुखिया और कहीं-कहीं तो सखा भी हैं. इसी तरह एक खास समुदाय भी है, जो श्रीराम को सिर्फ अपना आराध्य ही नहीं मानता, बल्कि खुद को उनकी प्रेमिका मानकर उनसे प्रेम भी करता है. अब प्रेम में क्या स्त्री और क्या पुरुष. यह प्रेम की वह स्थिति है, जहां सारे बाहरी भेद मिट जाते हैं और सिर्फ रह जाती है आत्मा और परमात्मा की मौजूदगी. ऐसी मौजूदगी जहां दोनों तत्व मिलकर एक हो जाते हैं. कुछ ऐसे कि शिव और पार्वती मिलकर अर्धनारीश्वर बन जाते हैं और राधा से मिलकर कृष्ण राधेकृष्ण हो जाते हैं.


अयोध्या निवासी मशहूर लेखक यतींद्र मिश्रा राम रसिक संप्रदाय के बारे में बहुत ही खूबसूरती से बताते हैं. वह कहते हैं कि, राम रसिक खूबसूरत संप्रदायों में से एक है. उन्होंने भगवान से अपना विशेष रिश्ता भी जोड़ रखा है . भगवान की आराधना करने का उनका तरीका सबसे अलग है और वे भगवान राम को प्रेम और सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर देखते हैं. यतींद्र मिश्रा कहते है कि इस संप्रदाय के पुरुष स्त्री भाव से भगवान की उपासना करते हैं. श्रीराम को वे अपना जीजा और खुद को उनकी साली मानते है और उनसे प्रेमिका की तरह प्रेम करते हैं. जब भी राम रसिक भगवान राम की आरती कर रहे होते हैं हैं तो वे सिर पर पल्लू डाले रहते हैं.

राम रसिकों की परंपरा कई शाताब्दियों से है, लेकिन सबसे पहले संत कवि रामानंद ने इस संप्रदाय को एकजूट करने का प्रयास किया था. उनके शिष्य ब्राह्मण कृष्णदास 17वीं शाताब्दी के अंत में पहली बार जयपुर के निकट गलता में रामानंद संप्रदाय की गद्दी की स्थापना की. आगे चलकर उनके दूसरे शिष्य अग्रदास ने राजस्थान के विभिन्न भागों में रसिक सम्प्रदाय को स्थापित किया. फिर यहां से यह संप्रदाय अयोध्या, जनकपुर और चित्रकूट में फैला. ये संप्रदाय सखा भाव में ही श्रीराम की आराधना करता है.

कुल मिलाकर यह है कि राम ही इस जगत की चेतना हैं और हर चलते-फिरते पुर्जे में राम ही की शक्ति समायी है. कैलास पर देवी पार्वती को राम नाम की महिमा समझाते हुए महादेव शिव ने राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे, सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने.

वह कहते हैं कि, राम राम राम” (राम का नाम) का ध्यान करने से, मेरा मन राम की दिव्य चेतना में लीन हो जाता है, जो कि पारलौकिक है. लोकमानस में श्रीराम की यही मौजूदगी उन्हें अपने आप ही पुरुषोत्तम बनाती है और मर्यादित आचरण के लिए प्रेरित करती है ताकि हम पूरे राम न सही, रामजन तो बन ही सकें. 
रामनवमी की शुभकामनाएं



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