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मृत्यु क्या है?…जानने के लिए मौत के दरवाजे पर पहुंच गया सात साल का बालक

by India News Online Team
February 24, 2024
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मृत्यु क्या है?…जानने के लिए मौत के दरवाजे पर पहुंच गया सात साल का बालक
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मृत्यु क्या है?…जानने के लिए मौत के दरवाजे पर पहुंच गया सात साल का बालक

हिमालय की ऊंचाई से लेकर सागर की गहराई तक की दूरी मापते हुए जिस बड़े और फैले हुए जमीन के टुकड़े से होकर गुजरना होता है, इतिहास के एक पूरे दौर को देखें तो इसकी बात ही कुछ और रही है. पन्ना दर पन्ना पलटते हुए जब आप समय की ओर पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएंगे कि संस्कृति और सभ्यता का एक अलग ही ढांचा कितनी खूबसूरती से विकसित होता चला आया है. आदम से उन्नत होने की इस पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण जिन गाथाओं और कहानियों के जरिए होकर हमतक पहुंचता है, वे हैं वेद, पुराण, उपनिषद और शास्त्र ग्रंथ. प्राचीन से भी प्राचीन हो जाने के कारण आज के दौर में हम-आप भले ही इन दस्तावेजों को महज कल्पना कहकर नकार दें, तो भी इनके भीतर जो ज्ञान और समझ की बातें भरी पड़ी हैं, उन्हें नहीं नकारा जा सकता. तमसो मा ज्योतिर्गमय, सत्यं वद, धर्मं चर के साथ ही सत्यमेव जयते जैसे सूत्र वाक्य ही तो मानव जीवन की उपलब्धि हैं.

पंडित जवाहर लाल नेहरू भी जब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में वेद और वैदिक युग का जिक्र करते हैं तो लिखते हैं कि, वेद इंसानी दिमाग के अंदर फूटे सबसे पहले विचार हैं. वह शुद्ध हैं, प्राकृतिक हैं और तब के आदमी ने (वह चाहे जो भी रहे हैं, ऋषि-मुनि, ज्ञानी) अपनी प्रकृति को जैसा देखा, महसूस किया, वह दूसरों से कहा. वेद ने यह नहीं कहा कि ‘जो मैं कह रहा हूं वह अंतिम सत्य है’ बल्कि कही हुई हर बात में सुधार और बदलाव की गुंजाइश रखी. वेद में चिंतन की यह भावना, धीरे-धीरे इतनी विकसित हुई कि उसने धर्म को ही पुकार कर कहा- हे धर्म, हमें विश्वास प्रदान करो.

तब वेद ने ईश्वर की पूजा नहीं की बल्कि खुद ही यह सवाल उठाए कि वह किसकी और क्यों पूजा करें. कैसे करें, किसलिए करें और पूजा का सही और सरल मार्ग क्या है? जीवन क्या है? जीवन जीने का मार्ग क्या है? प्राण क्या है? कौन है? मैं कौन हूं? कहां हूं, क्यों हूं….सवालों का यह सिलसिला जितना लंबा चला उससे कहीं अधिक लंबा जवाबों का सिलसिला चला. बल्कि यह कहना अधिक सही रहेगा कि जवाब का सिलसिला तो अब तक चला ही आ रहा है. इन्हीं सवालों और उनके जवाबों को समझना जब और कठिन होता गया तो पुराण पुरुष का कॉन्सेप्ट सामने आया है.

पुराण बताते हैं कि वह एक शक्ति है, जिससे यह सबकुछ चल रहा है, गतिमान है. ऋग्वेद के दशम मंडल में 129वां सूक्त नासदीय सूक्त है, जो कि इन सवालों को सबसे बेहतर और स्प्ष्ट तरीके से सामने रखता है.

नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।

किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥1॥

इस सूक्ति का पहला श्लोक कहता है कि, सृष्टि के बनने से पहले सत (तत्व या सत्य) नहीं था. अंतरिक्ष और आकाश भी नहीं था. स्वर्गलोक-मृत्युलोक भी नहीं थे. तो फिर कौन था,  किसने छुपा रखा था, कहां गहराई में था, क्योंकि सागर भी नहीं थे.

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।

अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥2॥

दूसरा श्लोक कहता है कि, जब उस समय मृत्यु नहीं थी, दिन औऱ रात नहीं थे. प्रलय नहीं था. वह प्राण वायु कौन थी, माया कहां थी और इन सबसे भी बड़ा ब्रह्म कहां था. क्या इनसे भी परे कुछ था?अगर था तो वह भी कहां था?

नासदीय सूक्त की एक लंबी सीरीज इन्हीं सवालों का कलेक्शन है. यह सवाल बताते हैं कि वेद या वेदों के मंत्र लिखने वाला व्यक्ति और समाज अंधाधुंध भेड़ चाल में चलने वाला या किसी परमसत्ता के प्रभाव में डर जाने वाला समाज नहीं था. बल्कि पहले वह सोचता था, सवाल करता था, समझने की कोशिश करता था और उन पर अन्य लोगों से भी विमर्श करता था. वेदों ने विमर्श को बड़े पैमाने पर स्वीकृति दी है और यह पूरा डॉक्यूमेंट भारतीय इतिहास के सबसे बड़े विमर्श के तौर पर हमारी सबसे अहम विरासत है. जिसके कई निष्कर्ष में से एक प्रमुख निष्कर्ष है- एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति. यानि कि सत्य एक ही है और ज्ञानी लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं.

कहने का मतलब यह कि सत्य की खोज इंसानी दिमाग में कौंधा सबसे पहला विचार है. यह खोज अब भी जारी है. उपनिषदों और पुराण कथाओं के हवाले से यह पता चलता है कि खाने-कमाने और जीने-मरने जैसी सामान्य जिंदगी गुजारने वालों की इस भीड़ में कुछ ऐसे भी लोग हुए हैं, जो सत्य की खोज की इस पताका को लिए काफी दूर तक फिरे हैं, इतनी दूर कि जहां, जीवन-मृत्यु और स्वर्ग-नर्क के दरवाजे आपस में मिलते हैं. ऐसी ही एक कहानी, सात साल के बालक नचिकेता की है.


नचिकेता, जिसकी उम्र महज पांच या सात साल की रही होगी, लेकिन उसके इंसानी दिमाग में कौंध रहे विचार काफी उन्नति कर चुके थे. कठोपनिषद में नचिकेता को संसार का पहला जिज्ञासु बताया गया है.

वैदिक युग की बात है. कालखंड को भी मान लें तो यह सतयुग का समय रहा होगा. इसी समय एक महान ऋषि हुए वाजश्रवा. वाजश्रवा का एक बेटा हुआ वाजश्रवस. वाजश्रवस मेधावी था और उसने जल्द ही वेदों की ऋचाओं और यज्ञ की आहुतियों के मंत्र सुनकर याद कर लिए. समय के साथ वाजश्रवस जवान हुआ, उसका विवाह हुआ और फिर समय के साथ एक स्वस्थ पुत्र का पिता बन गया. एक दिन वाजश्रवस ने विश्वजित यज्ञ का अनुष्ठान किया और संकल्प लिया कि वह अपनी सारी संपत्ति और गाएं दान कर देगा.

इस समय उसका पुत्र, जिसका नाम नचिकेता था वह पांच वर्ष का बालक था. घर में कोई आयोजन हो तो बालकों के मन में उल्लास और खुशी तो होती ही है, नचिकेता भी यज्ञ और इस अनुष्ठान से काफी खुश था, लेकिन जब उसके पिता अपनी गाएं दान करने लगे तो वह दुखी हो गया. असल में ऋषि वाजश्रवस की सभी गायें बूढ़ी हो चुकी थीं और उनमें से कई तो बीमार भी थीं और दूध भी नहीं देती थीं. नचिकेता ऐसा सोचने लगा कि उसके पिता जो कर रहे हैं वह दान नहीं, चालाकी है. दान तो अपनी प्यारी वस्तुओं का करना चाहिए. ऐसा उसने आश्रम में एक आचार्य से सुन रखा था.

यही बात कहने वह अपने पिता के पास पहुंचा. उसने दान का संकल्प लेते अपने पिता के हाथ पकड़ते हुए कहा कि यह आप क्या कर रहे हैं. आप अपनी बूढ़ीं गाएं दान क्यों दे रहे हैं, वह किसी काम की नहीं हैं. पिता ने उसे एक ओर झटका और फिर दान का संकल्प लेने लगे. नचिकेता, फिर से उन्हें समझाने लगा. कहने लगा- पिताजी, दान तो उसका करते हैं न जो सबसे प्रिय हो? तो फिर आपके लिए सबसे प्रिय तो मैं हुआ. हां, मैं ही तो हूं आपको सबसे प्रिय. तो फिर आप मुझे किसे दान में देंगे?

नचिकेता बुरी तरह उलझते हुए अपने पिता से यह सवाल करने लगा. वह बार-बार पूछने लगा, आप मुझे किसे दान में देंगे? आप मुझे किसे दान में देंगे? आप मुझे किसे दान में देंगे? नचिकेता के बार-बार किए जा रहे इन सवालों से झल्लाए उसके पिता गुस्से में भर उठे और उन्होंने नचिकेता को डपटते हुए कहा- जा मैं तुझे यम को दान में देता हूं.


पिता की आज्ञा पालन के लिए भगवान श्रीराम प्रसिद्ध हैं कि वह उनके वचन का पालन करने के लिए वन को चले गए, लेकिन नचिकेता ने गुस्से में भी कहे गए पिता की बातों को गंभीरता से लिया और सहर्ष इसे स्वीकार करते हुए यम के पास जाने के लिए तैयारी करने लगा. यम, जो कि मृत्यु के देवता हैं और जिनके पास जाने का अर्थ मौत के अलावा कुछ नहीं है, फिर भी नचिकेता उस राह पर चल पड़ा. मां रोने लगी, पिता दुखी होकर पछताने लगे, लेकिन नचिकेता अडिग रहा. उसने कहा कि, अब मैं दान में दिया जा चुका हूं तो मैं वहीं जाऊंगा, जिसे मैं दान में मिला हूं.

 

लाख रोके जाने के बावजूद भी नचिकेता नहीं रुका, वह चल पड़ा. जो मानव समाज से सिर्फ जीवन के लिए आतुर रहता है उसी समाज का एक बालक मौत को खोजने निकल पड़ा. यहां ये सवाल जरूर हो सकता है कि नचिकेता मृत्यु के पास कैसे गया? क्या वह शरीर के साथ गया या मरकर? क्योंकि मृत्यु के पास जाना आसान नहीं और जाया भी जाए तो सिर्फ आत्मा ही वहां जा सकती है शरीर नहीं. खैर, नचिकेता नदी-पहाड़, जंगल पार करते हुए चल पड़ा. कहते हैं कि वह कई दिनों की यात्रा करके मृत्यु के द्वार पर पहुंच गया.

यहां यम के द्वारपाल ने उसे रोक लिया और लौट जाने के लिए कहा, लेकिन नचिकेता लौटने के लिए नहीं आया था. वह वहीं खड़ा रहा और यम से मिलने के लिए अड़ा रहा. उसका यह इंतजार तीन दिन तक जारी रहा. आखिर, यम उसकी इस अवस्था को देखकर पिघल गए और बाहर आए. नचिकेता ने जो तीन दिन का इंतजार किया, वह जीवन की तीन अवस्थाओं बाल्यकाल, यौवन और बुढ़ापे का प्रतीक हैं. तीन दिन बाद यम का आना यानी मृत्यु का आना है.

यम जब आए तो नचिकेता से उन्होंने भी लौट जाने को कहा, तब नचिकेता ने अपनी चतुराई बुद्धि का प्रदर्शन किया. उसने कहा कि क्या जिसे मृत्यु मिल जाए उसका लौटना संभव है? क्या ऐसा होना आपके संविधान और कालचक्र के विपरीत नहीं? उस छोटे से बालक की बात सुनकर यम वाकई अपनी बात में उलझ गए. तब यम, जो कि क्रूरता और गंभीरता के लिए जाने जाते हैं वह दयालु और कोमल हो गए और उन्होंने प्यार से नचिकेता को अपनी गोद में बिठाकर पूछा, अच्छा बताओ, क्यों आए हो? नचिकेता ने अपने पिता द्वारा दान की गई बात बताई. यम ने कहा, ठीक है मैं तुम्हारा अभिभावक हुआ, तुम्हें अभय दिया और क्या इच्छा है?

नचिकेता ने कहा कि, अब कोई इच्छा नहीं, बस आप अपने धर्म का पालन कीजिए. यमराज फिर उलझ गए, मेरा धर्म कौन सा है? नचिकेता ने कहा- अभिभावक होकर आप मुझे ज्ञान दीजिए और मार्गदर्शन भी, यही तो अभिभावक करते हैं. यमराज हंस दिए. एक सात साल के बालक ने उन्हें अपना गुरु बना लिया था. तब यमराज ने नचिकेता को वह सारा ज्ञान दिया जो कि वेदों का सार है, पुराणों की परिभाषा है और इंसानी तौर पर जो आज भी हमारी जिज्ञासा है.


नचिकेता की इसी कथा को उपनिषदों समेत अन्य ग्रंथों में भी अलग-अलग ढंगों से कहा गया है. हालांकि सभी का सार यही है. महाभारत के शांति पर्व में भी नचिकेता की कथा जन्म-मृत्यु और कर्मयोग की व्याख्या के दौरान आई है. इसमें कहा गया है कि, जब नचिकेता बिना खाए-पिए तीन दिन तक यम द्वार पर रहा तो यम को दुख हुआ कि ब्राह्मण अतिथि तीन दिनों तक उनके द्वार पर बिना अन्न-जल के रहा. अतिथि देवो भव: की परंपरा का उदाहरण भी यहां देखने को मिलता है. 

अपनी गलती की भरपाई के लिए, यम ने नचिकेता से कहा, “आपने मेरे द्वार पर तीन दिन बिना अन्न-जल बिताया है, इसलिए मुझसे तीन वरदान मांगो. नचिकेता ने सबसे पहले अपने पिता और खुद के लिए शांति मांगी. दूसरे वरदान में नचिकेता ने पवित्र अग्नि विद्या सीख ली. इस तरह यम ने अग्नि को एक और नाम नचिकेत अग्नि दिया. तीसरे वरदान में नचिकेता शरीर की मृत्यु और उसका रहस्य जानना चाहता था.

यम नचिकेता को ये अंतिम ज्ञान देना नहीं चाहते थे. उन्होंने कहा कि यह देवताओं के लिए भी एक रहस्य है. उन्होंने नचिकेता से कुछ और वरदान मांगने को कहा और कई ऐशो-आराम, राज्य-समाज ले लेने को कहा, लेकिन नचिकेता ऐसे किसी लालच में नहीं फंसा.  वह आत्मा का ज्ञान पाने के लिए अटल रहा. नचिकेता से खुश होकर यम ने उसे अपना शिष्य बना लिया और नचिकेता को आत्मरहस्य का ज्ञान दिया. उसे तत्व के बारे में बताया और इसके अलावा जो कुछ भी कहा वह कुछ इस तरह है कि,

ॐ ही ब्रह्म है.

आत्मा, जिसका प्रतीक ॐ है, सर्वव्यापी ब्रह्म ही है. छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा भी वही है.

बुद्धिमान का लक्ष्य इस आत्मा को जानना है.

आत्मा एक सवार की तरह है; घोड़े इंद्रियां हैं, जिन्हें वह इच्छाओं की भूलभुलैया के मध्य से मार्ग पर ले जाता है.

मृत्यु के बाद आत्मा ही रहती है; आत्मा अमर है.

केवल शास्त्रों को पढ़ने या बौद्धिक शिक्षा से आत्मा का एहसास नहीं हो सकता.

आत्मा को शरीर से अलग समझना चाहिए, जो कि इच्छा का स्थान है.

ब्रह्म को न समझ पाने से ही मनुष्य पुनर्जन्म के चक्र में फंस जाता है. समझ लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

यम से ज्ञान प्राप्त करके नचिकेता अपने पिता के पास वापस लौट आया. वाजश्रवस को भी अपनी भूल का अहसास हो चुका था. उन्होंने संन्यास धारण कर लिया. नचिकेता आत्मा की साधना में लग गया.

कठोपनिषद में शामिल नचिकेता की कथा, जिज्ञासा की कोई पहली कहानी नहीं है, न ही ये कोई आखिरी किस्त है. बल्कि यह कहानी जीवन को समझने में सबसे अहम है और इंसानी चेतना को जगाने का जरिया है. वैदिक परंपरा में क्या-क्या छिपा हुआ है, यह कहानी उसकी भी एक झलक ही है.



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