
अमेरिका के पूर्व सीआईए अफसर रिचर्ड बार्लो (बाएं) और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (दाएं) (फाइल फोटो)
वाशिंगटनः इजरायल और भारत मिलकर पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर संयुक्त हमले की योजना बना चुके थे। मगर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। यह खुलासा अमेरिका के एक पूर्व सीआईए अधिकारी रिचर्ड बार्लो ने किया है। यह घटना 1980 के दशक की है। उस दौरान वह सीआईए के काउंटर-प्रोलिफरेशन अधिकारी थे। रिचर्ड बार्लो पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर एएनआई के साथ वार्ता करने के दौरान यह दावा किया।
अमेरिकी सहायता का दुरुपयोग कर रहा था पाक
साल 1980 के दशक दौरान दुनिया शीत युद्ध के बीच फंसी हुई थी। अमेरिका, रूस, और एशिया के कई देश अपनी-अपनी शक्ति की सीमाएं परख रहे थे। इस दौर में एक नाम था-रिचर्ड बार्लो यानि अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA का अधिकारी। उसे पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर नज़र रखने का काम सौंपा गया था। रिचर्ड को शुरुआती रिपोर्टों से ही शक था कि पाकिस्तान, अमेरिकी सहायता का दुरुपयोग कर रहा है। “बिलियनों डॉलर की सैन्य और गुप्त मदद पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार बनाने में लगा रहा है,” उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा। मगर वॉशिंगटन में उनकी इस बात को कोई सुनने को तैयार नहीं था।
भारत-इजरायल ने बनाई थी गुप्त योजना
रिचर्ड बार्लो कहते हैं कि इसी बीच भारत और इज़रायल के बीच पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र पर प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक करने की एक गुप्त योजना बनी। मगर इंदिरा गांधी ने इसे नहीं होने दिया। रिचर्ड को जब इस प्रस्ताव का पता चला तो उन्होंने कहा, “यह अफ़सोस की बात है कि इंदिरा गांधी ने इसे मंज़ूरी नहीं दी। अगर उन्होंने यह होने दिया होता तो इससे कई समस्याएं खत्म हो जातीं।” रिचर्ड बार्लो इस बात को लेकर इंदिरा गांधी पर गुस्सा भी जाहिर करते हैं।
बाद में क्या हुआ
रिचर्ड बार्लो के अनुसार वक़्त बीतता गया और पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम तेज़ी से बढ़ता गया। रिचर्ड की रिपोर्टों में बार-बार चेतावनी दी गई। A.Q. खान और पाकिस्तान के जनरल्स के लिए यह इस्लामी बम था, मुस्लिम बम।” अमेरिका फिर भी चुप रहा, क्योंकि उसे अफ़ग़ान युद्ध में पाकिस्तान की ज़रूरत थी। साल 1990 में रिचर्ड ने एक और खतरनाक खोज की, जिसमें उन्होंने बताया कि “पाकिस्तान के F-16 विमानों पर परमाणु हथियार लगाए जा रहे हैं। अब कोई शक नहीं, वे परमाणु हमले के लिए तैयार हैं।” उसकी रिपोर्ट ने CIA में हलचल मचा दी, लेकिन राजनीति के गलियारों में सन्नाटा था।
अमेरिका ने रिचर्ड के साथ क्या किया
पाकिस्तान पर कार्रवाई करने की बजाय उलटे अमेरिका ने रिचर्ड पर ही कार्रवाई कर दी। क्योंकि रिचर्ड ने सच्चाई को उजागर करने की कोशिश की थी, लेकिन नतीजा उल्टा पड़ा। उनको नौकरी से निकाल दिया गया, शादी टूट गई, और ज़िंदगी अंधेरे में डूब गई। वह कहते हैं कि “मेरी ज़िंदगी तबाह हो गई। नौकरी, परिवार, सब कुछ खो दिया। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मैंने सच कहा। उन्होंने यह बातें एएनआई के साथ साक्षात्कार के दौरान कहीं। रिचर्ड बार्लो की कहानी याद दिलाती है कि परमाणु हथियारों से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है-राजनीति की चुप्पी।
अमेरिका नहीं चाहता था इजरायल और भारत करे हमला
बार्लो कहते हैं कि इजरायल और भारत का पाकिस्तान के काहुटा न्यूक्लियर ठिकाने पर प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक करने का प्लान 1980 का था। इंदिरा गांधी ने शुरुआत में हरी झंडी दी, लेकिन बाद में पीछे हट गईं। उन्होंने कहा कि “यह शर्म की बात है कि इंदिरा ने मंजूरी नहीं दी। बहुत सारी समस्याएं हल हो जातीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन प्रशासन ने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमले का विरोध किया था, क्योंकि उसे अफगानिस्तान में सोवियत के खिलाफ पाकिस्तान की मदद जरूरी थी। इसके बाद काहुटा, खान के नेतृत्व में पाकिस्तान का परमाणु हृदय बन गया।
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