पंजाब की अकाली राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नए समीकरण बनने लगे हैं। शिरोमणि अकाली दल से अलग-अलग परिस्थितियों में उभरे अकाली दल (वारिस पंजाब दे) और एसएडी (पुनर सुरजीत) ने चुनावी गतिविधियां तेज कर दी हैं।
दोनों धड़े सदस्यता बढ़ाने और नेताओं को साथ जोड़ने के साथ विधानसभा सीटों पर दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। हालांकि दोनों की चुनावी पहचान अभी चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी है।
एक साल से पंजीकरण का इंतजार
अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का गठन जनवरी 2025 में श्री मुक्तसर साहिब के माघी मेले में अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह की अगुवाई में हुआ था। संगठन ने चुनाव आयोग के पास पंजीकरण के लिए आवेदन किया और मांगे गए अतिरिक्त दस्तावेज व जवाब भी जमा करवाए लेकिन एक साल से अधिक समय बाद भी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
पार्टी जमीनी स्तर पर अभियान तेज कर चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय जीतने वाले अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा के प्रभाव को विधानसभा चुनाव में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है। मजीठा से अमृतपाल के करीबी पापलप्रीत सिंह और बस्सी पठाना से सतवंत सिंह को उम्मीदवार घोषित किया जा चुका है। गुरदीप सिंह बत्थ और लेखक हरप्रीत सिंह उर्फ बाबा बेली के जुड़ने से गतिविधियां बढ़ी हैं। ढाका से शिअद विधायक मनप्रीत सिंह अयाली भी इस खेमे के साथ सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
तकड़ी पर पुनर सुरजीत का दावा
एसएडी (पुनर सुरजीत) खुद को शिरोमणि अकाली दल की राजनीतिक विरासत का दावेदार बता रहा है। पार्टी ने अकाली दल के पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘तकड़ी’ पर दावा किया है। नेता गुरजीत सिंह तलवंडी के मुताबिक इस संबंध में आवेदन जनवरी से चुनाव आयोग के पास लंबित है।
तकड़ी पर फैसला नहीं होने की स्थिति में धड़ा ‘शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत)’ नाम से अलग राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण की तैयारी में है। यानी वारिस पंजाब दे नई चुनावी पहचान का इंतजार कर रहा है जबकि पुनर सुरजीत पुराने नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा मजबूत करने में जुटा है।
दोनों धड़ों की सक्रियता का असर अकाली वोट बैंक पर पड़ सकता है। मूल शिरोमणि अकाली दल भी अपना आधार मजबूत करने में जुटा है। ऐसे में 2027 में मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं बल्कि पारंपरिक अकाली मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का भी होगा। अब दोनों धड़ों की नजर चुनाव आयोग के फैसले पर है। समय रहते पंजीकरण और चुनाव चिन्ह मिलते हैं तो दोनों बाकायदा राजनीतिक दल के रूप में मैदान में उतर सकेंगे। देरी हुई तो उम्मीदवारों की घोषणा के बावजूद कानूनी और संगठनात्मक अड़चनें सामने आ सकती हैं।























