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इंद्र कौन हैं? बारिश और पोषण के देवता या पौराणिक कथाओं के बदनाम किरदार?

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इंद्र कौन हैं? बारिश और पोषण के देवता या पौराणिक कथाओं के बदनाम किरदार?

by India News Online Team
March 9, 2024
in Hindi News
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इंद्र कौन हैं? बारिश और पोषण के देवता या पौराणिक कथाओं के बदनाम किरदार?
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इंद्र कौन हैं? बारिश और पोषण के देवता या पौराणिक कथाओं के बदनाम किरदार?

संत तुलसीदास ने रामचरित मानस के बालकांड में रामकथा से इतर एक और कहानी बहुत छोटे में लिख दी है. ऋषि विश्वामित्र के साथ जब राम-लक्ष्मण मिथिला की ओर बढ़ते हैं तो मार्ग में एक जंगल के बीच एक उजाड़ कुटिया मिलती है. इस कुटिया की वीरानी कुछ ऐसी थी कि आंगन के बीच लगी तुलसी की पौध भी सूख गई थी. चारों ओर सूखे पत्ते झरे हुए पड़े थे. जगह-जगह से छप्पर भी गिरा पड़ा था, इन सबके बीच सभी की नजर कुटिया के बीच पड़े एक पत्थर पर गई. साधारण सा दिखते हुए भी वह पत्थर अपनी ओर आकर्षित कर रहा था.  ये सब देखकर श्रीराम ने ऋषि विश्वामित्र से पूछा, गुरुदेव- वन के बीचो-बीच उजाड़ हो गई ये कुटिया किसकी है. क्या किसी जंगली पशु ने आक्रमण किया है, या फिर किसी राक्षस का कार्य है? क्या यहां के ऋषियों और वेदाभ्यास करने वाले स्नातकों को पलायन करना पड़ा है?

जब इंद्र ने अहिल्या से किया छल

श्रीराम के प्रश्न सुनकर ऋषि विश्वामित्र मुस्कराए और फिर गंभीर होते हुए बोले- रघुनंदन यह किसी पशु, राक्षस या दैत्य का आक्रमण नहीं है, लेकिन इस स्थान पर जो घटा है, वह किसी पशुता और राक्षसी कर्म से कम नहीं है. फिर ऋषि ने अहिल्या का जिक्र किया और बताया कि पत्थर की वह शिला ऋषि पत्नी अहिल्या है. बहुत ही अधिक रूपवती अहिल्या सुंदरता में मेनका जैसी थीं. उनका विवाह गौतम ऋषि के साथ हुआ था. देवराज इंद्र ने एक बार उन्हें देखा तो मोहित हो गया और उन्हें पाने की इच्छा रखने लगा.

उसे जब कोई सही मौका नहीं मिला तो उसने छल का सहारा लिया. एक दिन उसने चंद्रमा को आकाश से एक पहर पहले ही लुप्त करा दिया. इससे ऋषि गौतम को ब्रह्ममुहूर्त का आभास हुआ, उन्होंने स्नान-ध्यान का समय समझा और नदी की ओर निकल पड़े. इधर मौका देखकर इंद्र ने खुद को ऋषि गौतम के वेश में बदला और अहिल्या के साथ दुष्कर्म किया. इधर, नदी पर पहुंचकर गौतम ऋषि को आभास हुआ कि अभी तो ब्रह्म मुहूर्त में बहुत समय है. वह तो पहले ही आ गए. इसलिए वापस कुटिया की ओर लौट चले.

यहां उन्होंने इंद्र को भागते देखा तो योगबल से सबकुछ जान लिया. तब उन्होंने गुस्से में आकर अहिल्या को शिला हो जाने का श्राप दिया और इंद्र को श्राप दिया कि उसे हमेशा अपने राज्य और पद का भय सताता रहेगा.


इंद्रदेव की हजार आंखें, कैसे?

पुराण कथाओं में इंद्रदेव के शरीर पर हजार आंखें भी बताई गईं हैं, बल्कि कई पुराने चित्रों भी ऐसे ही मिलते हैं, जिसमें उनके शरीर पर आंखें ही आंखें दिखती हैं. दरअसल इसकी वजह भी गौतम ऋषि का दिया हुआ श्राप ही था. जब इंद्र ने ऋषि गौतम का वेश बनाकर अहिल्या के साथ छल किया था, तब गौतम ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था कि जो वासना तुम्हारे मस्तिष्क में हमेशा हावी रहती है, वह तुम्हारे शरीर पर प्रकट हो जाए. इसी श्राप के कारण इंद्र के शरीर के सारे रोम छिद्र स्त्री की यौनि में बदल गए थे.

जब इंद्र ने इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा तो गौतम ऋषि ने कहा कि, तुम्हारे इस श्राप को अगर कोई सती नारी क्षमा कर दे तो वे श्राप मुक्त हो जाएंगे. संसार में सबसे सती नारी देवी पार्वती हैं, लेकिन वह भी इंद्र के इस कांड बहुत क्रोधित थीं, बल्कि वह तो इंद्र वध के लिए तैयार थीं, लेकिन देवता अमर थे. इसलिए, देवी पार्वती ने श्राप से मुक्ति तो नहीं दी, लेकिन स्त्री यौनि की मर्यादा के कारण उन सभी को आंखों में बदल दिया. इसके साथ ही कहा, अब तुम हर समय पीड़ा का अनुभव करते रहोगे. मनुष्य की तो दो ही आंखें हैं और उनमें एक कतरा भी चला जाए तो वह बिलबिला जाता है, लेकिन इंद्र हमेशा इस बिलबिलाहट से परेशान रहेगा.

देवराज इंद्र की निगेटिव इमेज

रामायण और रामचरित मानस में यह कथा अहिल्या के उद्धार प्रसंग के तौर पर सामने आती है, लेकिन दूसरी ही ओर यह कहानी देवताओं के राजा इंद्र की एक नकारात्मक छवि सामने रखती है. यहीं से इंद्र की छवि निगेटिव, शंकालु, ईर्ष्यालु, घमंडी, स्त्री विरोधी और डरा हुए पौराणिक किरदार की बन गई है. पुराणों की व्याख्या के अनुसार भी देखा जाए तो ये सारे गुण किसी राक्षस, दैत्य, असुर और दानवों के होते हैं, लेकिन इन बुरे गुणों के बावजूद इंद्र देवताओं के राजा हैं और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) उसकी सहायता करते हैं. सनातन में भी उसका सबसे ऊंचा स्थान है, हालांकि सामान्य तौर पर और दैनिक पूजा में इंद्र की पूजा का अलग से वर्णन नहीं है, लेकिन यज्ञ-हवन आदि में बुलाए जाने वाले सभी देवताओं में इंद्र प्रमुख है और उसे आहुति भी प्रमुखता से दी जाती है.


कौन हैं देवराज इंद्र?

इंद्र कौन है? क्या है? और कितना पूज्य है, या पूज्य है भी या नहीं इसे लेकर बहुत कन्फ्यूजन है. ये कन्फ्यूजन पौराणिक कथाओं और वैदिक युग के बीच आए अंतर के कारण है. वेदों में इंद्र का स्थान सूर्य के बाद सबसे ऊंचा है और ऋग्वेद में लगभग एक चौथाई सूक्तियां इंद्र के लिए लिखी गई हैं. वैदिक युग में इंद्र को वर्षा का देवता, बादलों का कंट्रोलर (नियंत्रण करने वाला), समुद्र का मित्र (वरुण से संबंध), पृथ्वी का स्वामी (वर्षा कराने के कारण उपज में सहायक) और वनों का आधार (वर्षा के कारण) कहा गया है.

वेदों में क्या कहा गया है?

वेदों के अनुसार वह इंद्र ही है, जिसके कारण तूफान और आंधियां आ सकती हैं और इंद्र अपने वज्र से इस तबाही को रोकते हैं. वैदिक युग के ही कुछ बाद में ऐसा माना जाने लगा कि इंद्र ही जब नाराज होता है तो आंधी-तूफान और आपदा लाने वाली वर्षा और बाढ़ आती है. महाभारत में भी ऐसी ही एक कथा का उल्लेख मिलता है कि, जहां इंद्र नाराज हो जाता है और बादलों को अधिक से अधिक वर्षा का आदेश देता है.

भागवत और विष्णु पुराण की कथा

ये कहानी पुराणों में से एक श्रीमद भागवत पुराण और विष्णु पुराण में भी वर्णित है. कथा विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के बचपन की है. श्रीकृष्ण ने अपने बचपन में देखा कि उनके गांव के लोग इंद्र को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े अनुष्ठान करते हैं. इसके लिए वह सालभर अपना कमाया हुआ सारा धन खपा देते हैं. बहुत बड़ा यज्ञ आयोजित होता है, उसमें ब्रजवासी सभी लोग अपने घर के घी, दूध-दही, अनाज की आहुति देते हैं. इस अधिक खर्चीले अनुष्ठान के कारण ब्रज का सारा कोष हर साल खाली हो जाता था. कृष्ण ने यह देखा तो लोगों को समझाया कि इंद्र की पूजा क्यों करते हो? अगर वह देवता है तो इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि तुम्हारे साल भर की मेहनत का भूखा है. भगवान तो भावना से प्रसन्न होते हैं. इसलिए पूजा करनी है तो यमुना नदी की करो, जिसके जल से प्यास बुझती है, धरती मां की करो, जो अनाज देती हैं. हल-बैल की करो, गाय माता की करो, इस जंगल की करो और गोवर्धन पर्वत की करो.

गोवर्धन पर्वत की कथा

कृष्ण के कहने के अनुसार ब्रज के लोगों ने इंद्र की पूजा बंद कर दी. इसके बदले में वो गोपाष्टमी मनाकर गाय की पूजा करने लगे, हल-बैल की पूजा के लिए हलछठ मनाने लगे और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे. अपनी पूजा बंद होते देख इंद्र क्रोधित हो उठा और उसने बादलों को आदेश दिया कि वह तब तक वर्षा करें जब तक कि पूरा ब्रज, गोकुल और नंदगांव डूब न जाएं. कहते हैं कि सात दिन तक घोर वर्षा हुई. तब श्रीकृष्ण ने लोगों को बचाने के लिए ग्वाल-बालों को इकट्ठा किया और उनकी मदद से गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर छतरी की तरह रख लिया. सारे ब्रजवासी उसके नीचे आ गए. यह देखकर इंद्र का घमंड टूट गया और उसने नारायण अवतार श्रीकृष्ण से क्षमा मांग ली.


कैसे कम होता गया इंद्र का सम्मान

भागवत की कथा में इस कहानी का वर्णन कुछ ऐसे होता है कि इंद्र भी भगवान का भक्त है और भक्त में किसी भी कमी को जब भगवान देख लेते हैं तो उसे दूर करने के लिए लीला रचते हैं. इस तरह भक्त वत्सल भगवान अपने भक्तों को सही मार्ग पर ले आते हैं. भक्त और भगवान वाले ये कॉन्सेप्ट भले ही सनातन की सबसे सुंदर कहानियां हों, लेकिन गौर से देखें तो रामायण काल में अहिल्या उद्धार और महाभारत काल में गोवर्धन पूजा वाली ये कहानियां असल में लोकमानस में धीरे-धीरे इंद्र के महत्व को कम करती जाती हैं और त्रिदेवों के महत्व को बढ़ाती हैं. त्रिदेवों में भी भगवान विष्णु को सुप्रीम बताने के लिए लगभग हर जगह ही इंद्र का मान मर्दन (सम्मान कम किया गया) हुआ है.  

वैदिक युग का सबसे सम्मानित देव

अब अगर फिर से वैदिक युग की ओर बढ़ें तो इंद्र यहां सबसे अधिक सम्मान पाने वाला देवता है. वह ऊंचे आकाश में कहीं रहता है और स्वर्ग में बनी उसकी राजधानी का नाम अमरावती है. उसके पास ऐरावत हाथी है, जिसकी तीन सूंड़ हैं और वह अपने शक्तिशाली पंखों से उड़ान भी भर सकता है. एक उच्चैश्रवा नाम का पंखदार घोड़ा भी इंद्र की सवारी में शामिल है, जिसपर बैठकर वह कहीं की भी यात्रा कर सकता है. अमरावती में ही नंदनवन और सुंदरवन नाम के दो खूबसूरत बागीचे हैं, जिनमें एक में पारिजात वृक्ष और दूसरे में कल्पवृक्ष लगा हुआ है. मेनका, रंभा, तिलोत्तमा, उर्वशी इंद्र सभा की प्रमुख नर्तकियां-गायिकाएं हैं. ये प्रमुख रूप से अप्सराएं हैं और सुंदरता की दिव्य मूर्तियां हैं. इंद्र विद्याओं में निपुण गंधर्वों के भी राजा हैं. कई मायावी यक्ष और याक्षिणी भी उनके स्वर्ग मे हैं और कई कहानियों में इंद्र को ही परियों का राजा भी कहा गया है. स्वर्ग नाम की ये जगह आकाश में सात तलों में सबसे ऊपर है. पुराणों में कहा जाता है कि मृ्त्यु के बाद पुण्य कर्म करने वाले लोग इसी स्वर्गलोक में जाते हैं और जबतक पुण्य नष्ट न हो जाए, इसमें निवास करते हैं. इसके बाद उन्हें फिर से मृत्युलोक में जन्म लेना पड़ता है.

इंद्र का जन्म

पौराणिक कथाओं में इंद्र का जन्म ऋषि कश्यप और अदिति के घर हुआ. वह 12 आदित्यों में से एक हैं. सूर्य यानि विवस्वान उनके भाई हैं. कई जगहों पर त्वष्टा को भी उनका भाई बताया गया है और कुछ संदर्भों में सूर्य ही त्वष्टा हैं. इसके अलावा पूषा, पर्जन्य, धातु, मित्र और वरुण भी इनके भाई हैं. इनमें से वरुण को छोड़ दें तो पूषा, पर्जन्य, धातु और मित्र भी सूर्य के ही नाम हैं और यही इंद्र की शक्तियां भी हैं. इंद्र पूषा यानी पोषण का देवता है. पर्जन्य यानि बरसने वाले मेघों का जन्मदाता है. धातु यानि जीवन को धारण करने वाला है और मित्र यानी बिजली की शक्ति उत्पन्न करने वाला है. यही वजह है कि वेदों में इंद्र का स्थान सबसे ऊंचा है क्योंकि वह मानव का पोषण करने वाला देवता माना जाता है.

ऋग्वेद में इंद्र को शक्तिशाली क्यों बताया गया?

ऋग्वेद में इंद्र को शक्तिशाली देवता के रूप में बताया गया है. उसे शक्तिशाली भी इसीलिए कहा गया है, क्योंकि उसने मानवता के विकास और कल्याण के लिए कई कार्य किए. मसलन, नदियों को दिशा देना और पर्वत से निकलती उनकी धाराओं को नियंत्रित करना. वैदिक काल का आदमी, जिसने अभी-अभी ही खेती करना शुरू किया था, उसके लिए नदियों की व्यवस्था वाकई बहुत बड़ी बात थी. उस समय यह किसी परियोजना से कम नहीं रहा होगा, ठीक वैसा ही जैसा आज की सरकारें करती हैं. इंद्र ने बादलों, नदियों और समुद्रों को व्यवस्थित किया. उनका एक सिस्टम बनाया और इस तरह वह वैदिक युग का सबसे बड़ा देवता बन गया.


जब इंद्र ने लड़ा जीवन का सबसे बड़ा युद्ध

ऋग्वेद में ही इंद्र के जीवन के सबसे बड़े युद्ध का वर्णन मिलता है. यह युद्ध इंद्र और एक असुर वृत्र के बीच हुआ था. जिसे इंद्र द्वारा वृत्रासुर वध के नाम से जाना जाता है. वृत्रासुर बेहद शक्तिशाली और मायावी राक्षस था. इंद्र उसके सामने डटे रहे, उसका सामना किया, लेकिन इतना ही काफी नहीं था. वृत्रासुर ने नदियों का रास्ता रोक दिया और बादलों को भी गायब कर दिया. इसके साथ ही उसने जोती जाने वाली जमीनों को बंजर बना दिया. तब इंद्र ने समझ लिया कि वृत्र का वध करना जरूरी है. इसके बाद अपने वज्र से उन्होंने वृत्र का वध कर दिया.

ऋग्वेद में है इंद्र-वृत्र युद्ध का वर्णन

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 32वें सूक्त में इंद्र की वृत्र नाम के असुर की कथा श्लोकों और सूक्तियों के रूप में दर्ज है. यहां वृत्र का आशय ढंके हुए से लिया गया है. वृत्रासुर भी एक बहुत बड़े सांप के आकार का असुर है, जिसने मेघों को छुपा लिया था और नदियों के रास्ते भी ढंक दिए थे. त्वष्टा यानी सूर्य का प्रकाश भी धरती तक नहीं पहुंच पा रहा था, तब त्वष्टा ने इंद्र से कहा, तुम देवताओं के राजा हो तो अब तुम्हीं इस संकट का निवारण करो. इसके बाद की ऋचाओं में ऋषि इंद्र की वंदना करते हुए उसकी महानता बताते हैं.

इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री । अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥1॥
मैं वज्रधारी इंद्र के पराक्रमों का वर्णन करता हूं. उसने मेघ का वध किया और अपार जलराशि को धरती पर गिरने के लिए रास्ता बनाया. इसके बाद बहती हुई पहाड़ी नदियों का मार्ग भी बदल दिया.

अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः ॥2॥
इंद्र ने पर्वत पर आश्रय लेने वाले मेघ का वध किया. त्वष्टा ने इंद्र के लिए वज्र बनाया. इसके बाद जल की वेगवती धाराएं समुद्र की ओर बढ़ चलीं.

वृषायमाणोऽवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्य । आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम् ॥3॥
अतिबलशाली इन्द्रदेव ने सोम पान किया. इसके बाद बाण से वृत्र को वेधकर मेघों को मारा. इससे मेघ जल बरसाने लगे.

यदिन्द्राहन्प्रथमजामहीनामान्मायिनाममिनाः प्रोत मायाः । आत्सूर्यं जनयन्द्यामुषासं तादीत्ना शत्रुं न किला विवित्से ॥4॥
हे इन्द्रदेव! आपने मेघों में प्रथम उत्पन्न मेघ को वेध दिया. मेघरूप में छाये धुन्ध(मायावियो) को दूर किया, फिर आकाश में उषा और सूर्य को प्रकट किया. अब कोई भी अवरोधक शत्रु नहीं बचा.

अहन्वृत्रं वृत्रतरं व्यंसमिन्द्रो वज्रेण महता वधेन। स्कन्धांसीव कुलिशेना विवृक्णाहिः शयत उपपृक्पृथिव्याः ॥5॥
इन्द्रदेव ने घातक दिव्य वज्र से वृत्रासुर का वध किया. वृक्ष की शाखाओं को कुल्हाड़े से काटने की तरह ही उसकी भुजाओ को काटा और फिर भूमि पर गिरा दिया.

अधर्म पर धर्म की विजय की सबसे प्राचीन कहानी

वृत्रासुर पर इंद्र के विजय की ये कहानी अधर्म पर धर्म की विजय की सबसे प्राचीन कहानी है. हालांकि बाद के पौराणिक काल में इस कहानी में भी इंद्र के पराक्रम का महत्व कम हो गया और दूसरे अन्य किरदार अधिक महत्व पा गए. जैसे महर्षि दधीचि, जिन्होंने वृत्र असुर के वध के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं, क्योंकि उनकी अस्थियों में घातक हथियारों वाली शक्ति थी और वृत्रासुर का वध किसी जीवित मानव की अस्थियों से ही हो सकता था. इंद्र, महर्षि दक्षीचि से उनकी हड्डियों का दान मांगने गए थे. ब्राह्मण न होकर भी, दान मांगने जैसा कार्य करने के कारण पुराण कथाओं में इंद्र को एक बार फिर छली और अपने लाभ के लिए षड्यंत्रकारी कहा गया है.


क्यों हमेशा संदिग्ध रही है इंद्र की स्थिति

इंद्र के व्यक्तित्व को लेकर कई भ्रांतियां इसलिए भी हैं, क्योंकि उसकी स्थिति हमेशा संदिग्ध रही है. हालांकि वैदिक काल से लेकर अब तक ऐसी कई कथाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें ये स्पष्ट संकेत मिलता है कि इंद्र किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि वह सिर्फ एक पदवी है, जो किसी भी सामर्थ्यशाली व्यक्ति को मिल सकती है. सनातन परंपरा में ही ऐसा उल्लेख है कि, अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ और 100 वाजपेय यज्ञ कराने वाला इंद्र पद का अधिकारी हो जाता है. वह अपने जीवित रहते हुए भी स्वर्ग आ-जा सकता है और जीवन समाप्त होने के बाद सशरीर स्वर्ग पहुंचता है और उसे इंद्र पद दिया जाता है. इसलिए यह कहना मुश्किल है कि किस इंद्र ने अहिल्या को छला, किस इंद्र ने कृष्ण के सामने अभिमान किया. वृत्र का वध करने वाला इंद्र कौन सा था, तपस्वियों की तपस्या से डरने वाला इंद्र भी कौन था? हो सकता है कि ये सभी घटनाएं एक न होकर अलग-अलग काल के अलग -अलग इंद्र के साथ हुई हों और फलस्वरूप इन्हीं घटनाओं के कारण उनका इंद्र पद छिन गया हो और दूसरे को इंद्र बनाया गया हो.

पुराण कथाओं में 14 मन्वंतरों के 14 अलग-अलग इंद्र बताए गए हैं. हर एक मन्वंतर में एक इंद्र हुए हैं. यज्न, विपस्चित, शीबि, विधु, मनोजव, पुरंदर, बाली, अद्भुत, शांति, विश, रितुधाम, देवास्पति और शुचि.

जब एक बार धरती के राजा को मिल गया इंद्रासन

पद्म पुराण में एक मानव जो कि एक राजा भी था, उसे भी कुछ समय के लिए इंद्र की पदवी मिलने की कहानी दर्ज है. कहते हैं कि एक श्राप से मुक्त होने के लिए इंद्र हजार वर्षों के लिए तपस्या करने चले गए. इस दौरान धरती के प्रतापी राजा नहुष को स्वर्ग बुलाकर उसे इंद्र की पदवी दे दी गई. कुछ दिन तो नहुष ने सबकुछ ठीक से संभाला, लेकिन एक दिन उसने नंदन वन में पूर्व इंद्र की पत्नी शचि को गुमसुम बैठे देख लिया. उसकी खूबसूरती में नहुष खो गया और उसके मन में कुविचार कौंधने लगे. वह सोचने लगा कि जब स्वर्ग मेरा, इंद्रासन मेरा, इंद्रसेना मेरी तो इंद्राणी क्यों नहीं. यह सोचकर उसने शचि के पास विवाह प्रस्ताव भिजवाया. इंद्राणी शचि ने उसे ठुकरा दिया. तब वह जबरन उन्हें पाने की कोशिश में लग गया. इंद्राणी ने गुरु बृहस्पति से रक्षा करने के लिए कहा. देवगुरु ने सारी बात सुनी फिर कहा कि, आप उसका प्रस्ताव मानते हुए यह संदेश भिजवाएं कि, शचि इंद्राणी है, अगर देवराज नहुष उसे पाना चाहते हैं तो वह उस पालकी पर बैठकर आएं, जिसे सप्तऋषि उठाकर लाएं.

नहुष, जो इंद्र तो बना, लेकिन श्रापित हो गया

इंद्राणी के इस प्रस्ताव पर नहुष मान गया, उसे ध्यान ही नहीं रहा कि लालसा में वह क्या पाप करने जा रहा है. एक तो सप्तऋषि महान और ऊपर से बुजुर्ग, क्या उनसे पालकी उठवाना सही रहता? लेकिन नहुष को तो बस इंद्राणी के पास पहुंचने की जल्दी थी, लिहाजा उसने सप्तऋषियों से पालकी उठाने के लिए कह दिया. महान सप्तऋषियों ने उसका बिल्कुल भी बुरा नहीं माना और वे पालकी उठाकर चलने लगे, लेकिन उनकी चाल बहुत धीमी थी. ऐसे में नहुष पैर पटक-पटक कर उनसे तेज गति से चलने के लिए कहने लगा. फिर भी बुजुर्ग ऋषि अपनी ही चाल से चले जा रहे थे. गुस्से में आकर नहुष ने महर्षि अगस्त्य को यह कहते हुए लात मार दी कि क्या सर्प की तरह रेंग रहे हो, जल्दी नहीं चल सकते. महर्षि अगस्त्य के इस अपमान से गुस्साए अन्य सभी ऋषियों ने नहुष को अजगर हो जाने का श्राप दिया और वह अपना सारा पुण्य खोकर स्वर्ग से धरती पर गिर पड़ा. इस तरह एक और इंद्र श्रापित हो गया और स्वर्ग का पद फिर खाली हो गया.

महाभारत में भी है नहुष की कहानी

नहुष की यह कथा महाभारत के वनपर्व में भी मिलती है, जहां वन में भटकते पांडवों को एक अजगर जकड़ लेता है. जब भीम भी उस अजगर से नहीं जीत पाते हैं तो युधिष्ठिर पूछते हैं कि आप कोई साधारण सर्प नहीं हो सकते हैं, आप कौन हैं, तब वह अजगर कहता है कि, मैं अपना परिचय बाद में दूंगा पहले तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर दो. इसके बाद वहां युधिष्ठिर और अजगर में वैसे ही सवाल-जवाब होते हैं जैसे कि इसके पहले यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए थे. युधिष्ठिर द्वारा सही सवालों के जवाब मिलने पर और धर्म क्या है, इसका सही उत्तर जानने पर नहुष श्राप से मुक्त हो जाता है और असली रूप में आकर अपने स्वर्ग से गिरने की कहानी सुनाता है. असल में नहुष और पांडवों का जन्म एक ही कुल चंद्रवंश में हुआ था और अपने वंश में धर्मराज के जन्म को देखकर नहुष बहुत प्रसन्न था. धर्म के साथ मिलने से ही उसके पाप नष्ट हो गए और फिर वह श्राप से मु्क्त हो गया.


14 इंद्रों में से एक राजा शीबि की कहानी

यह तो थी नहुष की कहानी, लेकिन 14 इंद्रों में से एक इंद्र राजा शीबि को तो खुद इंद्र ने ही ब्रह्मलोक का अधिकारी होने और इंद्रलोक के सारे ऐश्वर्य पाने का वरदान दिया था. यह कथा भी महाभारत में के वनपर्व में मिलती है. वनवास के समय जब युधिष्ठिर ऋषियों-मुनियों के साथ सत्संग कर समय गुजार रहे थे तब एक दिन ऋषियों ने उन्हें देहदानी राजा शीबि की कथा सुनाई. राजा शीबि एक दिन अपनी राजसभा में बैठे थे कि तभी उनकी गोद में एक कबूतर आ गिरा. राजा ने उसे संभाला तबतक एक बाज पीछे से दौड़ा आया और कहने लगा कि यह मेरा आहार है, इसे मुझे सौंप दो. राजा ने कहा, अब यह मेरी शरण में है, इसलिए तुम कुछ और मांग लो. बाज ने कहा, मुझे इसके वजन के बराबर का मांस दे दीजिए. राजा शीबि ने कहा, किसी और का क्यों मैं ही तुम्हें अपना मांस काटकर देता हूं. इस तरह एक तराजू मंगाई गई, एक तरफ कबूतर रखा गया, दूसरी तरफ राजा ने अपनी जांघ से मांस काटकर रखा. जैसे-जैसे राजा मांस काटकर रखते जाते, कबूतर वाला पलड़ा भारी हो जाता. यह देखकर राजा ने तलवार फेंक दी और खुद ही तराजू में बैठ गए.

यह देखकर कबूतर अग्निदेव में बदल गए और बाज इंद्र में. दोनों राजा शीबि के देहदान से प्रसन्न होकर उन्हें ब्रह्मलोक पाने का वरदान दिया और इंद्र पद प्राप्त करने का अधिकारी भी बना दिया. यह कहानी इंद्र की अन्य छवियों से थोड़ी अलग है कि जो इंद्र किसी की तपस्या से डर जाते हैं कि कहीं राज्य न छिन जाए, वह खुद किसी को इंद्र पद पाने का वरदान कैसे दे देते हैं. हालांकि राजा शीबि का नाम 14 इंद्रों में से एक है.  

वैदिक युग में हैं इंद्र के कई नाम

वैदिक काल में इंद्र को कई नामों से पुकारा गया है. उन्हें सुरेश, देवेश, सुरपति, शचिपति, वासव, पुरंदर और शक्र भी कहा जाता है. इंद्रदेव का मंत्र, ऊँ इन्द्राय नमः है. इसके अलावा इंद्र गायत्री मंत्र भी है. ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्रः प्रचोदयात्.

इंद्र की पूजा के लिए मंत्र
ऋग्वेद में इंद्र के आह्वान के लिए इस मंत्र का वर्णन है.
ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिद्र गोंग हवे हवे सुहव गोंग शूरमिन्द्रम्,
हवयामि शक्रं पुरुहूतमिद्रग्वँ गोंग स्वस्ति नो मघवा धात्विद्रः.
इन्द्राय नमः.

घरों में भी जब पूजा अनुष्ठान होता है तो पूजा संपन्न हो जाने के बाद जब यजमान आसन छोड़कर उठने वाला होता है तो उससे ठीक पहले जमीन पर थोड़ा जल गिराकर उसे  मस्तक से लगाकर तीन बार इंद्र को नमस्कार करने का विधान है. इसके लिए सूक्ति कही जाती है, इंद्राय नमः, शक्राय नम:. यानि इंद्र को नमस्कार है, शक्र को नमस्कार है. इंद्र को इन दोनों नामों से पुकार कर उसे इन सभी ऐश्वर्य का स्वामी बताते हुए कहा जाता है कि वह अपना यज्ञ भाग लें, जिनका वह स्वामी है और हमें भी इसका प्रसाद दें. इसके बाद ही पूजा करने वाला प्रसाद लेकर उठ सकता है. पूजा चाहे सत्यनारायण की हो, देवी दुर्गा या गायत्री यज्ञ हो. बिना इंद्र को उसका यज्ञ भाग दिए पूजा पूरी नहीं होती है.

इंद्र यानी इंद्रियों पर विजय

वैदिका काल के पराक्रमी देवता इंद्र का महत्व पौराणिक कथाओं में भले ही कुछ फीका पड़ जाता हो, लेकिन इसके बावजूद वह भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है. बल्कि इंद्र का स्थान विश्व की हर उस सभ्यता में है, जिसमें मानवों से इतर देवताओं की कहानियों की मौजूदगी है. जैन पंरपरा में इंद्र का अर्थ इंद्रियों से है. इंद्रिय यानी इच्छाओं पर आपका नियंत्रण है तो आप देव हो जाते हैं और अगर इच्छाओं ने आप पर नियंत्रण कर लिया है, आपको दानव बनने से कोई नहीं रोक सकता. यह बारीक सा उपदेश ही इंद्र शब्द और इंद्र पद की सार्थकता है.



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