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शहीद के परिवार को अपने हक के लिए क्यों भटकना पड़े? – government announcements vs bureaucratic delays martyr families rights opns2

by India News Online Team
September 7, 2026
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शहीद के परिवार को अपने हक के लिए क्यों भटकना पड़े? – government announcements vs bureaucratic delays martyr families rights opns2
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देश के लिए जान देने वाले शौर्य चक्र विजेता विवेक सक्सेना की मां का 22 साल बाद यह कहना कि ‘सम्मान वापस ले लो’ किसी एक परिवार की निराशा नहीं है. यह उस व्यवस्था के लिए शर्मनाक आईना है जिसमें सरकारें घोषणा करने में देर नहीं करतीं, लेकिन घोषणा को जमीन पर उतारने वाली नौकरशाही वर्षों तक फाइलों को एक मेज से दूसरी मेज तक घुमाती रहती है. विवेक सक्सेना 2003 में मणिपुर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। उन्हें शौर्य चक्र मिला, लेकिन उनकी मां को बेटे की शहादत के बाद सरकार की ओर से घोषित मदद के लिए वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े. 2020 में भी वह 17 साल की प्रतीक्षा के बाद शौर्य चक्र और दूसरे पदक लौटाने की बात कह चुकी थीं.

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विवेक सक्सेना के परिवार को जमीन क्यों नहीं मिली. बड़ा सवाल यह है कि सरकार की घोषणा और नागरिक का अधिकार, दोनों के बीच नौकरशाही इतनी बड़ी दीवार क्यों बन जाती है? भारत में यह कोई अकेला मामला नहीं है. हादसा हो, प्राकृतिक आपदा हो, दंगा हो, आतंकवादी हमला हो या किसी सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मौत.हर त्रासदी के बाद सरकारें तत्काल राहत और मुआवजे की घोषणा करती हैं. मुख्यमंत्री घटनास्थल पर पहुंचते हैं, प्रधानमंत्री संवेदना व्यक्त करते हैं, मंत्रियों के बयान आते हैं और आर्थिक सहायता की रकम घोषित होती है. लेकिन कैमरों के हटते ही असली परीक्षा शुरू होती है. कागज मांगे जाते हैं, प्रमाण मांगे जाते हैं, जांच रिपोर्ट मांगी जाती है, पात्रता तय होती है और फिर फाइल आगे बढ़ाने के लिए एक और दस्तावेज चाहिए होता है.

मसलन, 2025 के महाकुंभ भगदड़ मामले में भी मुआवजे के भुगतान में देरी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा. अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि घोषित मुआवजे का समय पर और सम्मानजनक भुगतान सरकार की जिम्मेदारी है. बाद में एक मामले में अदालत ने संबंधित दावे को 30 दिन में तय करने का आदेश दिया.

यह सवाल किसी एक राज्य या एक पार्टी का नहीं है. कोविड के दौरान ड्यूटी करते हुए जान गंवाने वाली राजस्थान की सरकारी कर्मचारी गीता देवी के परिवार का मामला भी सामने आया था. परिवार का दावा था कि नियमों के तहत मिलने वाली 70 लाख रुपये की सहायता लंबे समय तक नहीं मिली, जबकि स्थानीय स्तर पर सिफारिश और संबंधित पत्राचार भी हो चुका था. मामला अंततः हाईकोर्ट तक पहुंचा. इसी तरह ओडिशा में 2009 में बिजली के करंट से मारे गए एक युवक के परिवार को मुआवजे के लिए 16 साल तक इंतजार करना पड़ा. 2025 में हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और बिजली वितरण कंपनी को मुआवजा देने का आदेश दिया. तब तक पीड़ित के पिता की भी मृत्यु हो चुकी थी और मुकदमा लड़ने के लिए मां अकेली रह गई थीं.

ये उदाहरण बताते हैं कि समस्या सिर्फ रकम की नहीं है. समस्या समय और सम्मान की भी है. जिस परिवार का कमाने वाला सदस्य चला गया, उसके लिए पांच लाख या दस लाख रुपये की सरकारी सहायता कोई एहसान नहीं है. वह उस समय परिवार के लिए तत्काल सहारा है. अगर वही पैसा पांच या दस साल बाद मिलता है तो उसकी उपयोगिता बहुत कम हो जाती है. और अगर परिवार को वह पैसा पाने के लिए अदालत जाना पड़े तो व्यवस्था का उद्देश्य ही विफल हो जाता है.

बलात्कार पीड़िताओं के मामले में भी यही सवाल उठता है. सरकारें ऐसी घटनाओं के बाद आर्थिक सहायता, नौकरी, पुनर्वास या दूसरी सुविधाओं की घोषणा करती हैं. लेकिन पीड़िता और उसका परिवार पहले ही अपराध, सामाजिक दबाव और न्यायिक प्रक्रिया की पीड़ा झेल रहा होता है. उसके बाद अगर उसे मुआवजे के लिए तहसील, जिला कार्यालय और दूसरे विभागों के चक्कर लगाने पड़ें तो राज्य उसके जख्म पर मरहम लगाने के बजाय उसे बार-बार वही दर्द महसूस करा रहा होता है.

सरकारी घोषणाओं की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि नेता घोषणा करते हैं, लेकिन उसका लाभ लेने के लिए नागरिक को नेता नहीं, बाबू के सामने जाना पड़ता है.और बाबू के पास नियम होते हैं.

यही वह जगह है जहां संवेदनशील शासन और सामान्य प्रशासन के बीच अंतर दिखाई देता है. नियम जरूरी हैं, सरकारी पैसा बिना जांच के बांटा नहीं जा सकता.फर्जी दावों को रोकना भी जरूरी है. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि असली पीड़ित को भी संदिग्ध मानकर वर्षों तक इंतजार कराया जाए?

क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती जिसमें शहीद, आपदा पीड़ित, हादसे में मृत व्यक्ति के परिवार या बलात्कार पीड़िता को सरकारी सहायता अधिकतम 30 या 60 दिनों के भीतर स्वतः मिल जाए? संबंधित विभाग खुद दस्तावेज जुटाए. परिवार से बार-बार प्रमाण न मांगे जाएं. एक नोडल अधिकारी हो, जो पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार हो. और अगर तय समय में भुगतान न हो तो जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही तय हो.

आज डिजिटल इंडिया की बात होती है. सरकारें कहती हैं कि सेवाएं ऑनलाइन हो गई हैं. फिर ऐसे मामलों में फाइलें वर्षों तक क्यों घूमती हैं? शायद इसलिए कि हमारी नौकरशाही में फाइल का आगे बढ़ना अभी भी अक्सर व्यक्तिगत उपलब्धि  बन  जाती है.जो परिवार प्रभावशाली है, मीडिया तक पहुंच सकता है, नेता से मिल सकता है या अदालत जा सकता है, उसके लिए रास्ता किसी तरह खुल जाता है. लेकिन सामान्य परिवार? वह धीरे-धीरे थक जाता है. यही सबसे खतरनाक स्थिति है.

किसी शहीद की मां जब कहती है कि बेटे का शौर्य चक्र वापस ले लो, तो यह सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है. यह उस व्यवस्था पर अभियोग है जो शहादत का सम्मान समारोह तो कर सकती है, लेकिन शहीद के परिवार का अधिकार सुनिश्चित नहीं कर सकती. विवेक सक्सेना के मामले में तो यह शिकायत वर्षों पुरानी है.

सरकारें अक्सर कहती हैं कि हमारे सैनिक सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी हैं. लेकिन सैनिक का सम्मान केवल परेड, पदक और भाषण से नहीं होता. उसके परिवार को उसका अधिकार समय पर देना भी उसी सम्मान का हिस्सा है. इसी तरह किसी बलात्कार पीड़िता को न्याय केवल अदालत का फैसला मिलने से नहीं मिलेगा. उसे सुरक्षित जीवन, पुनर्वास और घोषित सरकारी सहायता भी समय पर मिलनी चाहिए. हादसे में मरने वाले के परिवार को मुख्यमंत्री की घोषणा की तस्वीर नहीं, उसके खाते में सहायता चाहिए. किसान आपदा में मरा है तो घोषणा नहीं, उसके परिवार को समय पर राहत चाहिए. लोकतंत्र में सरकार का सबसे बड़ा काम घोषणा करना नहीं, घोषणा को अधिकार में बदलना है.

विवेक सक्सेना की मां की पीड़ा इसलिए पूरे देश के लिए चेतावनी है. आज वह शौर्य चक्र लौटाने की बात कर रही हैं, कल कोई दूसरा पीड़ित सरकारी सहायता का दावा छोड़ सकता है. जिस दिन नागरिक यह मान ले कि सरकार से अपना हक पाने से आसान है उसे छोड़ देना, उस दिन समस्या सिर्फ नौकरशाही की नहीं रहेगी.वह लोकतंत्र पर अविश्वास की शुरुआत होगी.

सरकारों को अब एक ऐसा नियम बनाना चाहिए जिसमें किसी शहीद या त्रासदी के पीड़ित परिवार को अपनी घोषणा का लाभ लेने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़े. जिस सरकार ने घोषणा की है, उसी सरकार की जिम्मेदारी हो कि लाभ परिवार के दरवाजे तक पहुंचे.

—- समाप्त —-



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Tags: Announcementsbureaucraticdelaysfamiliesgovernmentmartyropns2rightsअपनककयपड..परवरभटकनलएशहदहक
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