विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब में एक बार फिर किसान आंदोलन गर्मा गया है। एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता रद्द करने और ग्रामीण मजदूरों के लिए पेंशन समेत कई मांगों को लेकर किसान मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर धरना दे रहे हैं।
आंदोलन का सीधा असर भाजपा पर पड़ सकता है लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी भी इससे अछूती नहीं है। कांग्रेस और अकाली दल के लिए यह किसानों के बीच खोई जमीन वापस पाने का मौका बन सकता है।
भाजपा के लिए ग्रामीण पंजाब में स्वीकार्यता की परीक्षा
2020-21 के किसान आंदोलन की राजनीतिक छाया पंजाब में भाजपा पर लंबे समय तक रही। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में किसान संगठनों ने भाजपा के विरोध में अभियान चलाया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में संयुक्त किसान मोर्चा ने भी भाजपा के खिलाफ वोट की अपील की थी। अब भाजपा पंजाब में अपना आधार बढ़ाने में जुटी है। पार्टी 2027 में सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही है। ऐसे में ग्रामीण पंजाब में स्वीकार्यता बढ़ाना उसके लिए बड़ी चुनौती है।
अगर आंदोलन के कारण केंद्र और भाजपा के खिलाफ माहौल फिर मजबूत हुआ तो मालवा और दोआबा की ग्रामीण सीटों पर असर पड़ सकता है। किसान संगठनों की सक्रियता वाले इलाकों में भाजपा उम्मीदवारों को विरोध और सवालों का सामना करना पड़ सकता है। चुनौती सिर्फ किसान वोट की नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण माहौल की है।










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