कहानी – ज़ुल्फ़ी भाई की बिरयानी
राइटर – जमशेद क़मर सिद्दीक़ी
ज़ुल्फ़ी भाई जो हमारे पड़ोस में रहते हैं… बड़े आलसी आदमी हैं… आलस की इंतिहा ये है कि सड़क पर चलते चलते उनका किसी से झगड़ा हो जाए तो चुप चाप पिट कर आ जाते हैं… कि कौन झगड़ा करे… पीटो जल्दी जाएं… लेटे जा कर घर पर … ज़िंदगी में काम कोई ढंग से किया नहीं, नौकरियां की मगर आठ घंटे काम करना उनको समझ नहीं आता.. कहते हैं बेकार है भैय्या… कौन जाकर आठ घंटे काम करे, मुझसे नहीं होता… एक बार एक कॉलसेंटर में उनकी नौकरी लगा दी थी… कॉल आती थी तो कस्टमर से कह देते थे… सर, आपकी डीटेल्स कम्प्यूटर पर निकालने के लिए क्या मैं आपकी कॉल होल्ड पर डाल सकता हूं?… ज़ाहिर है कस्टमर कहेगा भई ठीक है, निकालो… ये कॉल डाल देते थे होल्ड पर…और फिर पीछे टेक लगाके आंख बंद कर लेते थे…15 मिनट तक कस्टमर टू टू वाली म्यूज़िक सुनकर चला जाता था… और अगर तब भी कस्टमर नहीं गया.. तो कहते थे… हैलो… आपको आवाज़ आ रही है… देखिए मैंने कोशिश बहुत की पर आपकी डीटेल्स आ नहीं पा रही हैं कम्प्यूटर पर…लगता है कुछ टेक्निकल दिक्कत है… क्या मैं टेक्निकल प्रॉब्लम रिज़ाल्व करने के लिए आपकी कॉल फिर से होल्ड पर डाल सकता हूं… कस्टमर गाली देता था और कॉल उनके मुंह पर काटके चला जाता था। ये बस इतना कहते – सर ये एक प्रोफेशनल कॉल है… आप इस तरह गाली नहीं दे सकते.. मैं कॉल डिस्कनेक्ट कर रहा हूं,… कॉल करने का धन्यवाद… (बाकी की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें। और अगर इसी कहानी को जमशेद कमर सिद्दीक़ी से सुनना हो तो ठीक नीचे SPOTIFY और APPLE PODCAST के लिंक दिये हैं। क्लिक करें और मज़े करें)
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अव्वल दर्जे के कामचोर… काहिल और काइंयां… यही थे ज़ुल्फी भाई। उम्र अब चालीस के आसपास ढल गयी थी। पेट थोड़ा सा निकल आया था। बालों में थोड़ी सफेदी उतर आई थी… कुछ दिन कोई काम करते थे, कुछ दिन कुछ और… अभी हाल ही की बात है… किसी कंपनी में डीलीवरी ब्वॉय बन गए थे। लेकिन आप उन्हें डिलीवरी देने जाते हुए देखेंगे तो हैरान हो जाएंगे… इतने इत्मिनान से जाते थे कि जैसे लगता था सैर पर निकले हैं… धीरे धीरे मोटरसाइकल चला रहे हैं… बीच में कहीं पान खाने के लिए रुक भी गए… कोई मिल गया तो हाल चाल भी लेने लगे… मूड हुआ तो जो खाना देने जा रहे हैं… वही खोल कर खुद खा लिया… ज़ाहिर है ज़यादा दिन वहां भी नहीं टिके… निकाल दिए गए। लेकिन जिन दिनों वो ये काम कर रहे थे… उन दिनों एक ऐसा वाक्या हुआ कि भुलाए नहीं भूलता… हुआ यूं कि एक दोपहर अपने पुशतैनी घर के आंगन में तखत पर नंगी पीठ लेटे थे… एक हाथ मोड़ कर तकिया बनाकर सिरहाने लगाया था और दूसरे को हवा में उठाए आसमान की तरफ देखते हुए बादलों पर चला रहे थे… और कह रहे थे कि यार… कही से एक करोड़ रुपए पड़े मिल जाए… तो क्या करेंगे… उसमें से पचास तो डाल देंगे बैंक में… नई नई पचास नहीं… पचास ज़्यादा हो जाएगा… चालीस डालेंगे… चालीस ठीक रहेगा… अच्छा चलो साढ़े उनतालीस डाल देंगे… दस लाख के खरीदेंगे दस बैटरी रिक्शे… पूरे शहर में दौड़ा देगे… शाम को बढ़िया कमाई… बाकी तीन लाख की उधारी चुका देंगे बनवारी पान वाले की… और जो बचेगा… गांव में खुलवा देंगे फोटो काफी और आधार पैन निकालने वाला आन लाइन सेंटर… फिर कितना बचेगा मगर… कुछ का कपड़ा लेंगे…
वो इतनी संजीदगी से सोच रहे थे कि जैसे एक करोड़ पड़े मिल ही गए हों… तभी उनका फोन बजा… पैर पर पैर रखे हुए आंख मिचमिचा कर देखा… एक डिलीवरी का ऑर्डर था। उबासी ली… लें न लें… अपने आपसे पूछा… फिर देखा ऑर्डर थोड़ा दूर का था.. कुछ ठीक ठाक पैसे बन रहे थे… अरे यार… कहते हुए उठे चैन लेटने न दो बस आदमी को… फोन पर एकसेप्ट का बटन दबाया और डीलीवरी ले ली…
वैसे ज़ुल्फी भाई दिन में बस दो ही डिलीवरी लेते थे। कहते थे इससे ज़्यादा अपने बस का है नहीं भैय्या… इतना काफी है। तो ख़ैर मन मसौस के उठे… जैसे जंग पर जा रहे हों… मुंह धोया… कपड़े पहने जूते पहने… इतना तैयार होकर निकलते थे जैसे खाना पहुंचाने नहीं.. किसी ने खाने पर बुलाया हो… बाकयदा सेंट वेंट लगा के… और अपने बड़े-बड़े बाल…संवार के… मोटर साइकल की तरफ चल दिए। अच्छा उनके बारे में ये बात तो रह ही गयी… कि बाल बड़े खूबसूरत थे… लंबे घने.. लंबे बालों की वजह से ही लोग ज़ुल्फीकार भाई को ज़ुल्फी ज़ुल्फी कहने लगे थे। हेलमेट हमेशा हाथ में फसाए रहते थे बाइक चलाते वक्त कि बाल खराब न हो जाएं…
तो ख़ैर, ज़ुल्फ़ी भाई चल दिए रेस्टोरेंट की तरफ खाना उठाने के लिए … पहुंचे… पैकेट उठाया और फिर जहां देना था वहां देने चल दिए। ज़ुल्फी भाई की आदत ये थी कि खाना पहुंचे टाइम पर कि न पहुंचे बाइक चालीस से ऊपर नहीं होती थी। रास्ते में कोई जान पहचान का दिख गया तो …
अह्हा… अमा… क्या हाल है… सब ख़ैरियत… कहते हुए बाइक नुक्कड़ पर रोक दी… खड़े हैं अब बातें हो रही हैं… इधर उधर की… बेवजह की बातें… और मामू के पैर का प्लास्टर खुला? पैखाने कैसे जाते हैं… पकड़ा के ले जाते होगे?
अरे खुदा के बंदे तुमसे क्या मतलब है कोई कैसे जाता होगा… सिर्फ टाइम पास करना है… और कोई काम नहीं। ख़ैर, थोड़ी देर बाद… मोबाइल पर चल दिए… और बाइक चलाते हुए पहुंच गए डेस्टिनेशन पर…
बिल्डिंग में घुसे.. फ्लैट के सामने पहुंचे… घंटी दबाई।
थोड़ी देर लग गयी… बोले… अमा लेना हो लो… नहीं यही पटक के चले जाएंगे… ऐं वहां… खड़े हैं… आ नहीं रहे…
दरवाज़ा खुला… और जो खुला है तो बस ये समझ लीजिए कि यादों का कोई पुराना बंद दरवाज़ा खुल गया।
“बिरयानी आ गयी” कहते जिस लड़की ने दरवाज़ा खोला वो ज़ुल्फी भाई की शक्ल देखती है पत्थर की बन गई जैसे। आबिदा नाम था उसका … और ये आबिदा वही थी… जिनसे ज़ुल्फ़ी भाई की शादी बस… होते होते रह गयी थी।
बिरयानी पकड़ा हुआ हाथ उठा कर खड़े ज़ुल्फ़ी भाई… के होंठ कांपने लगे। “ज़ुल्फ़ी?” वो हैरानी से बुदबुदाई। तो चलिए आपको बता देते हैं इनकी फ्लैशबैक की कहानी… मामला ये था भैय्या कि छ सात साल पहले कि बात है… आबिदा उन्हीं दिनों मोहल्ले में आई थी… ज़ुल्फी भाई के बाद दो मकान छोड़ कर उसका मकान था… उन दिनों ज़ुल्फ़ी मोहल्ले में कमेटी चलाते थे.. कमेटी समझते हैं आप लोग… जिसमें हर महीने सब लोग एक फिक्स अमाउंट देते हैं और वो पूरा अमाउंट किसी एक को दे दिया जाता है। हर महीने किसी एक का नंबर आता है.. जो आदमी कमेटी चलवाता है पहले महीने में रकम उसकी होती है। उन्हीं दिनों में आबिदा ने भी कमेटी डाली थी।
जिस दिन कमेटी का लकी ड्रा होता था उस दिन वो इनके घर आती थी। कत्थई शलवार कमीज़ में, बादामी दुपट्टा… गुंधे हुए बाल और बड़ी बड़ी आंखों से मुस्कुराती हुई
स्लाले कुम….
वालेकुम अस्सलाम … अच्छा हुआ आप आ गयी… भई पर्ची आप ही उठाइयेगा हैं… आप के हाथ मुबारक हैं… इतना कहकर वो शर्माने लगते थे।
आबिदा जब मुस्कुराती थी तो इनके गुदगुदी सी होने लगती थी। खूबसूरत तो वो थी ही। अच्छा तब तक सब लोग ऑनलाइन वॉनलाइन पेमेंट नहीं करते थे। तो वो हर महीने इनके घर आती थी पैसा देने के लिए। और तभी मुलाकातें होती थीं। इन्हीं मुलाकातों में कब धीरे-धीरे प्यार का इज़हार हो गया पूछिये मत… बस प्रेम की गाड़ी चल पड़ी थी।
पर एक कांटा था उनकी कहानी में और थीं आबिदा की दादी… दादी का ज़िक्र जब कहीं होता है तो आप क्या सोचते हैं… एक सीधी शरीफ सी सौम्य सूरत, जो बच्चों को प्यार करती है, उन्हें कहानी सुनाती है… पापड़ सुखाती है, खाना बनाती है, रोज़ा नमाज़ करती है.. यही न.. हैं… अरे बोलते क्यों नहीं आप लोग… यही सोचते हैं न… तो भाई साब… ऐसा बिल्कुल नहीं है। ये दादी कुछ अलगिच थी। 65 की उम्र में सिलेंडर खुद कंधे पर तान के दूसरी मंज़िल पर ले जाती थीं। सत्तू पीने वाली उम्र में रात को चने भिगोकर सुबह चने का निकला हुआ पानी काला नमक डाल कर पीती थीं। अंजीर खाती थीं… गली में एक लड़का था… खूब हट्टा कट्टा… जिम ट्रेनर था… एक दिन कहीं से आते हुए उसने चिप्स का खाली पैकेट दादी के घर के सामने फेंक दिया था… दादी ने उसको बुलाया… और जब वो चूं-चां करने लगा तो उसे लप्पड़ों में ले लिया… अरे मारा भैय्या.. .कोहनी-कोहनी मारा… दादी पानी खाए रहती थीं। बाल खिज़ाब से लाल… ऐसी हिम्मत वाली थीं कि पूछिए मत साहब…
बस उन्हीं के डर में ये कभी आबिदा को प्रोपोज़ नहीं कर पाए। पर अब उस बात को अरसा गुज़र गया था… इस बीच किसी से ज़ुल्फी भाई ने सुना था कि दादी अब नहीं रहीं। ज़ुल्फ़ी उस वक्त बहुत उदास हो गए थे… ये भी सोच रहे थे कि दादी से आबिदा का बहुत लगाव था… उनके बिना पता नहीं बेचारी कैसे ज़िंदगी गुज़ार रही होगी। ख़ैर… आज ज़िंदगी ने उन दोनों को फिर से मिला दिया था। हाथ में बिरयानी का पैकेट थामे ज़ुल्फी दरवाज़े पर खड़े थे और सामने थी वही आबिदा। कुछ देर दोनों खामोश रहे… फिर वो बोली…
– “कैसे हो तुम?” …
– आ… “मैं.. तो मैं अच्छा हूं। तुम कैसी हो.. घर चेंज किया तो बताया भी नहीं कि.. कहां…
– ‘हां वो सब इतनी जल्दी में हुआ कि…
दोनों की नज़र एक-दूसरे के चेहरों पर जमी थीं। गुज़रे हुए वक्त की अनगिनत यादें चेहरे पर दिख रही थी। थोड़ी इधर उधर की बातचीत के बाद, आबिदा फिर उससे वही तीन लफ़्ज़ सुनना चाहती थी, जो वो ज़ुल्फी पहले नहीं कह सके। ज़ुल्फ़ी के कांपती पलकें बता रही थीं कि आज वो.. वो कहने वाले थे। बोले…. मैं… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं आबिदा…
आगे बढ़े… होठों पर जुंबिश हुई… लेकिन तभी एक आवाज़ आई… दोनों चौंक गए।
“तांका-झांकी करेंगे… हैं… तांका-झांकी” पलटकर देखा तो आबिदा की दादी एक लड़के को बाल से पकड़कर घसीटते चली आ रही थीं।
ये दादी… दादी हैं अभी?
हैं अभी मतलब? अरे क्यों उनको क्या होगा…
नहीं मैने तो सुना था कि…
क्या
नहीं कुछ नहीं, लगता है किसी ने मुझे झूठ बोला… यानि ठीक ठाक हैं
अब वो तो तुम देख ही रहे हो
दादी एक लड़के को बाल से पकड़े हुए खींचती चली आ रही थीं।
– “अरे चच्ची सुनो तो, झांक नहीं रहे थे, अरे वो गेंद आ गयी थी। बाल छोड़ों कलम उखड़ जाएगी।” हरे रंग के बाल रंगे हुए एक लड़का, जो शायद रील वील बनाता था… दादी से छुड़ाना चाह रहा था…
– “नहीं, नहीं झांक लो… खिड़की से क्यों दरवाज़े से झांको… कमबखत मारे..” कहते हुए दादी ने चप्पल उतारी। एक हाथ से उसके बाल जकड़े और दूसरे से पीठ पर चप्पलें ऐसे नक्श कर दीं, जैसे पोस्ट ऑफिस में ख़तों पर ठप्पे लगते हैं।
-“लड़की वाला घर है तो चक्कर लगाएंगे, हैं… सीटी बजाएंगे, ये ले, छिछोरे कहीं के, रुक जा तेरी सारी आशिक़ी निकालती हूं” कहते हुए दादी ने अलग किस्म की मुट्टी बनाई, जिसमें दो उंगलियों के बीच से अंगूठा बाहर झांक रहा था। फिर पूरी ताकत से घूंसा लड़के की कमसिन पीठ पर जड़ दिया। ‘हाय’ वो बिलबिला उठा – “अरे बचाओ, अरे कोई हमें पुलिस को दे दो”
मंज़र देखकर ज़ुल्फ़ी के पैर कांप रहे थे। हालांकि आबिदा ये सब ऐसे देख रही थी जैसे उसके लिए रोज़ की बात हो।
“अरे छोड़ो उनको, इधर देखो… कुछ… कुछ कहने वाले थे तुम?” आबिदा शर्माकर ज़ुल्फ़ी से बोली। ज़ुल्फ़ी ने पलटकर उस लड़के को देखा, जिसके बाल दादी की मुट्ठी में कसे थे और गुद्दी पर चपेटें पड़ रही थीं। उसने वापस आबिदा को देखा, अपने लंबे बालों पर हाथ फेरा और कहा, “हां… बस यही कह रहा था.. कि.. कि वो… वो रेटिंग, फाइव स्टार दे देना… आबिदा अप्पी”
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