जिन खेतों में हर साल इस वक्त ट्रैक्टरों की घर्र-घर्राहट गूंजती थी, आज वहां किसानों की सिसकियां सुनाई दे रहीं हैं। जो मंडियां किसानों, आढ़तियों और पल्लेदारों की आवाज से शोर में डूबी रहती थीं, आज वहां वीरानगी छाई हुई है।
जिन किसानों के चेहरे फसल की आमद से खिले रहते थे, वो आज मुर्झाए हुए हैं। सोना उगलने वाले खेतों में रेत भरी हुई है। इस रेत के नीचे उनकी छह महीने की मेहनत और अरमान दबे हुए हैं। कुदरत की मार से पंजाब का अन्नदाता हताश है। उनकी खुशियों को बाढ़ का ग्रहण लग गया है।
बाढ़ ने इस बार पंजाब में ऐसा कहर बरपाया कि 4.5 लाख एकड़ क्षेत्र में धान की फसल पानी में डूब कर बर्बाद हो गई। पंजाब में मंगलवार से धान की सरकारी खरीद शुरू होने जा रही है लेकिन मंडियों की हालत ऐसी है कि यहां दूर-दूर तक कोई किसान नहीं दिखाई दे रहा।
न पल्लेदार हैं, न आढ़ती और न मजदूर। सब जैसे गायब हो गए हैं। पंजाब इस वक्त बड़ी आपदा से गुजर रहा है। धान की फसल तबाह होने से किसान बड़े आर्थिक संकट में फंसते दिख रहे हैं। सरकार ने धान की खरीद का जो लक्ष्य निर्धारित किया था वह भी पूरा होता नहीं दिखाई दे रहा।