भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में अपने कोर एजेंडे पर काम कर उसे फिनिश कर चुकी है. राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करना ये मुद्दे बीजेपी के कोर एजेंडे में शामिल थे. राम मंदिर का मिशन पूरा हो चुका है, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया जा चुका है. UCC की दिशा में बीजेपी शासित राज्य सरकारें किस्तों में कदम बढ़ा रही हैं.
बीजेपी सरकार ने अपने पिछले दो कार्यकाल और तीसरे कार्यकाल के पहले 10 महीने में कई बड़े और विवादास्पद मुद्दों पर कदम उठाए हैं, जो इसके वैचारिक आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सोच से गहरे जुड़े हैं. संघ लंबे समय से एक ऐसे भारत की कल्पना करती रही है जो उनकी नजर में “सांस्कृतिक एकता” और “राष्ट्रीयता” पर आधारित हो.
राम मंदिर, 370 के साथ-साथ तीन तलाक को निरस्त करना और CAA को लागू करने का कानून संघ और सरकार की इसी सोच का परिणाम है.
राम मंदिर, अनुच्छेद 370, तीन तलाक, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) और ताजा ताजा वक्फ संशोधन जैसे कदमों ने न केवल बीजेपी के मूल समर्थकों को संतुष्ट किया, बल्कि देश की राजनीति को एक नए दर्शन की ओर मोड़ दिया. अब जब ये बड़े लक्ष्य हासिल हो चुके हैं या उनकी दिशा में मजबूत कदम उठाए जा चुके हैं, सवाल उठता है कि अगला कदम क्या होगा? क्या बीजेपी अब मथुरा-काशी, जनसंख्या नियंत्रण, जनसंख्या रजिस्टर (NRC) जैसे मुद्दों पर काम करने जा रही है.
बीजेपी और संघ की परिभाषा में भारत एक ऐसी सांस्कृतिक ईकाई है. जहां समान विधान, समान पहचान का बोलबाला होना चाहिए.
राम मंदिर: अयोध्या में राम मंदिर का मिशन पूरा करके बीजेपी ने हिन्दू गौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पक्ष को स्थापित किया है. यह एक ऐसा मुद्दा था जो दशकों के संघर्ष और सांप्रदायिक तनाव के बाद साकार हुआ.
अनुच्छेद 370: यह कश्मीर को भारत के साथ पूर्ण एकीकरण का प्रतीक था, जो बीजेपी के “एक राष्ट्र, एक संविधान” के विचार को मजबूत करता. जनसंघ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने काफी पहले इस थ्योरी का प्रतिपादन किया था.
तीन तलाक और वक्फ: ये कदम धर्मनिरपेक्षता के नए दायरे की ओर इशारा करते हैं, जहां राष्ट्रीय कानून निजी कानून और मान्यताओं से ज्यादा प्रभावी हैं.
बीजेपी ने मुस्लिम समाज के लिए लाए इन कानून को रिफॉर्म और महिलाओं-गरीबों को हक देने वाला कानून बताया है. वक्फ संशोधन बिल के लोकसभा और राज्यसभा से पास होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इसी पक्ष की ओर इशारा किया.
उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, “दशकों से वक्फ व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी नजर आ रही थी. इससे मुख्य रूप से हमारी मुस्लिम माताओं-बहनों, गरीब और पसमांदा मुसलमान भाई-बहनों के हितों को बहुत नुकसान हो रहा था. अब संसद द्वारा पारित विधेयक पारदर्शिता को बढ़ाने के साथ-साथ लोगों के अधिकारों की रक्षा में भी मददगार बनेगा.”
एक अन्य पोस्ट में पीएम मोदी ने कहा, “इसके साथ ही हम एक ऐसे युग में प्रवेश करेंगे, जो आज के समय के अनुरूप होने के साथ ही सामाजिक न्याय को लेकर प्रतिबद्ध होगा। देश के हर नागरिक की गरिमा को प्राथमिकता मिले, इसके लिए हम संकल्पबद्ध हैं। यह मार्ग ज्यादा सशक्त, समावेशी और संवेदनशील भारत के निर्माण में काफी महत्वपूर्ण होने वाला है.”
तीन तलाक को निरस्त करने वाला बिल पास होने पर पीएम मोदी ने कहा था कि भाजपा सरकार ने तीन तलाक की कुप्रथा को समाप्त कर दिया है. हमने करोड़ों मुस्लिम बहनों के हित में एक मजबूत कानून बनाया” और उनके परिवारों की रक्षा की.
CAA: नागरिकता संशोधन कानून के जरिये बीजेपी ने भारत के पड़ोसी देशों में प्रताड़ना का शिकार हो रहे गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए मदद की पेशकश की.
अगला एजेंडा: मथुरा-काशी विवाद
बीजेपी के पिटारे में ऐसे कई मुद्दे हैं. जिनका राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक असर है. मथुरा और वाराणसी का मुद्दा ऐसा ही है. संघ के बड़े नेता दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में अपने बयान से ऐसा संकेत भी दिया है.
मथुरा और वाराणसी को बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में शामिल करने से परहेज किया है. लेकिन बीजेपी न्यायालय के जरिये इसका समाधान चाहती है. वाराणसी और मथुरा में मंदिरों को पुनः प्राप्त करना भाजपा के एजेंडे में है या नहीं, इस सवाल का जवाब देते हुए भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने 2022 में कहा था कि विवादास्पद धार्मिक मामलों का फैसला “अदालतों और संविधान” द्वारा किया जाएगा और पार्टी निर्णयों को अक्षरशः लागू करेगी. बता दें कि ये दोनों ही मामले इस समय अदालत में हैं.
दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में कहा था कि मथुरा और वाराणसी को लेकर संघ का कोई प्लान नहीं है लेकिन अगर संघ कार्यकर्ता इस आंदोलन में शामिल होते हैं तो संघ उन्हें नहीं रोकेगा.
ये दोनों विवाद बीजेपी और संघ के लिए “अधूरे सपनों” का प्रतीक हैं. सितंबर 2024 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की बैठक और कानूनी विशेषज्ञों के साथ चर्चा से संकेत मिलता है कि यहां भी राम मंदिर की तरह ही कोर्ट के जरिए रास्ता बनाया जाए. हालांकि बीजेपी का अभी ताजा बयान नहीं आया है और बीजेपी ने इस पर कोई संकेत नहीं दिया है.
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का पूर्ण कार्यान्वयन
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) या एकसमान नागरिक संहिता का मतलब है कि भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू करना, चाहे उनका धर्म, जाति, लिंग या समुदाय कुछ भी हो. यह विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति जैसे निजी मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए मौजूद व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) को खत्म करके एक एकीकृत कानूनी ढांचा लाने की वकालत करता है.
UCC का विचार संविधान के अनुच्छेद 44 से लिया गया है, जो राज्य को “नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने” का निर्देश देता है.
उत्तराखंड में UCC लागू होने के बाद इसे दूसरे बीजेपी शासित राज्यों में लागू करने किया जा सकता है. यह निजी कानूनों (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार) को एकसमान बनाएगा. गुजरात ने इस दिशा में कदम उठा दिया है. हालांकि विपक्ष इसका कड़ा विरोध कर रहा है. और इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बता रहा है.
UCC का पूर्ण कार्यान्वयन बीजेपी के वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे का एक बड़ा हिस्सा है. यह भारत को एकसमान कानूनी ढांचे की ओर ले जा सकता है, लेकिन इसके लिए व्यापक सहमति, संवेदनशीलता और संतुलन की जरूरत होगी.
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर भारत में एक आधिकारिक रजिस्टर है, जिसमें देश के वैध नागरिकों के नाम और उनकी पहचान से संबंधित जानकारी दर्ज की जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना और उन्हें देश से बाहर करना है.
असम भारत का एकमात्र राज्य है, जहां NRC को अपडेट किया गया है. यानी कि यहां NRC लागू है. यह प्रक्रिया 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शुरू हुई थी और 31 अगस्त 2019 को अंतिम NRC सूची प्रकाशित की गई थी.
बीजेपी ने अपने 2019 के चुनावी घोषणापत्र में देशव्यापी NRC लागू करने का वादा किया था. गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर 2019 में संसद में कहा था कि पूरे देश में NRC लागू होगा. हालांकि इसके बाद सरकार ने इस पर स्पष्ट कदम नहीं उठाया.
फरवरी 2020 में लोकसभा में सरकार ने लिखित जवाब दिया था कि “राष्ट्रीय स्तर पर NRC लागू करने का अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है.”
2020 में जब देश में CAA का विरोध हो रहा था तो कई संगठनों ने आशंका जताई थी कि NRC भी लागू किया जा सकता है और इससे कई मुसलमानों को परेशान किया जा सकता है.
बीजेपी और उसके समर्थक इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध प्रवास को रोकने का जरिया मानते हैं, जबकि विपक्षी दल इसे धार्मिक भेदभाव और नागरिकों को परेशान करने वाला कदम बताते हैं.














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