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संघ के 100 साल: RSS के सबसे ज्यादा संगठन खड़े करने वाले ठेंगडी जिन्होंने ठुकरा दिया था पद्मभूषण – dattopant thengadi sangh 100 years Bhartiya majdoor sangh ntcppl

by India News Online Team
November 27, 2025
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संघ के 100 साल: RSS के सबसे ज्यादा संगठन खड़े करने वाले ठेंगडी जिन्होंने ठुकरा दिया था पद्मभूषण – dattopant thengadi sangh 100 years Bhartiya majdoor sangh ntcppl
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ये मार्च 1964 का वक्त था. भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी को जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय के जरिए गुरु गोलवलकर का संदेश मिला कि आप फौरन लखनऊ से राज्यसभा का नामांकन कर दीजिए. देश और संघ के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का प्रण लेने वाले ब्रह्मचारी प्रचारक दत्तोपंत हैरान थे. उनके संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) को ना तो कोई राजनीति से लेना देना था और ना ही उनकी कोई इच्छा थी.

लेकिन चूंकि संघ प्रमुख का संदेश था, सो उसे ना मानने का तो सवाल ही नहीं था. उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल कर दिया और वो राज्यसभा सांसद बन भी गए. उस वक्त गुरु गोलवलकर से पूछा भी था कि राज्यसभा क्यों भेज रहे हैं? तो उनका हंसते हुए जवाब था कि “जाओ, भाषण दो, विश्राम करो, बहुत परिश्रम कर लिया”. लेकिन वह गुरु गोलवलकर को जानते थे कि उनका कोई भी फैसला काफी दूरगामी और सोच विचार कर लिया होता है. फिर जब नागपुर में गुरु गोलवलकर से एक रोज फुरसत में मिले तो उनसे पूछ ही डाला.

गुरु गोलवलकर का जवाब लम्बा था. “मुझे लगता है कि सत्ताधारी इस देश पर तानाशाही थोपने के लिए ललचाएंगे. मेरे विचार से स्थिति इतनी गंभीर हो जाएगी कि देश की कोई भी पार्टी अपने बल पर प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं होगी. सभी को दमन का भय होगा. ऐसी स्थिति में, विपक्ष के लोग यह सोचने पर मजबूर होंगे कि तानाशाही के विरुद्ध सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना चाहिए. यह सही है कि विपक्षी दलों में ही गंभीर मतभेद हैं, लेकिन परिस्थितियां उन्हें यह सोचने पर मजबूर करेंगी कि पहले हम तानाशाही का दमन करने के लिए एकजुट हों, बाद में हम अपने आंतरिक मतभेदों पर विचार कर सकते हैं”. 

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इस जवाब से पता चलता है कि गुरु गोलवलकर कितनी दूर की सोच रहे थे. तब तक को इंदिरा गांधी का उदय भी ढंग से नहीं हुआ था, लेकिन उन्हें लगने लगा था कि आज नहीं तो कल ये लोग तानाशाही लागू करेंगे. इसीलिए उन्होंने आगे ठेंगड़ी से कहा कि तुम वहां निर्दलीय की तरह ही रहोगे और कांग्रेस के अलावा सभी विपक्षी दलों से रिश्ते बढ़ाओगे, ताकि भविष्य में एकजुट होना हो तो उसमें आसानी हो सके. और ऐसा हुआ भी, गुरु गोलवलकर तो नहीं रहे लेकिन इमरजेंसी में दत्तोपंत ठेंगडी ने प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद ब़ड़ी भूमिका संयुक्त संघर्ष समिति बनाने और बाकी विपक्षी नेताओं का साथ लेने में निभाई, खासतौर पर तब जबकि उनके वरिष्ठ गिरफ्तार हो गए थे. उनके हर दल में तब तक अच्छे दोस्ताना रिश्ते बन गए थे और ऐसे मौके पर काम आए भी. जनता पार्टी सरकार बनाने में भी उनकी भूमिका रही.
 
दुश्मनों के खेमे में लिया था प्रशिक्षण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस वक्त के दिग्गजों को जानने समझने वाले कइयों के मन में ये सवाल उठ सकता है कि इस काम के लिए दत्तोपंत ठेंगडी ही क्यों चुने गए?  इसके लिए आपको दत्तोपंत ठेंगड़ी का वो हैरतअंगेज कारनामा समझना होगा, जो उन्होंने मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ की स्थापना से पहले के कुछ सालों में किया था.

ठेंगड़ी का जन्म 1920 में वर्धा (महाराष्ट्र) के आर्वी गांव में 10 नवम्बर दीपावली के दिन हुआ था. पिताजी वकील थे और माता जानकी देवी आध्यात्मिक रुचि वाली महिला जो भगवान दत्रात्रेय की परम भक्त थीं. उनका एक छोटा भाई और एक छोटी बहन भी थी. शुरुआत से ही साथ के बच्चों की अगुवाई करते थे. 15 साल की उम्र में बच्चों के संगठन वानर सेना के अध्यक्ष बन गए. 1936 में मौरिस कॉलेज में पढ़ने नागपुर चले आए और वहीं एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए. बचपन से ही दत्तोपंत संघ की शाखा में भी जाया करते थे. मोरोपंत पिंगले उनके सहपाठी थे और शाखा के मुख्य शिक्षक भी, सो उनके सानिध्य में रहते-रहते संघ के तीनों शिक्षा वर्ग भी कर लिए. उनको डॉ हेडगेवार से भी मिलने, बात करने का अवसर मिला.

जब 1942 में गुरु गोलवलकर ने युवाओं से आव्हान किया कि संघ को कुछ साल दें, प्रचारक बनकर निकलें, तो असर दत्तोपंत ठेंगडी पर भी पड़ा. उनको 22 मार्च 1942 को केरल में कालीकट का प्रचारक बनाकर भेज दिया गया. तीन साल में उन्होंने संघ का काफी कार्य उस दुर्गम क्षेत्र में खड़ा कर दिया. 1945 में उन्हें वहां से कलकत्ता भेज दिया गया. उनका काम देखकर 1948 में उन्हें बंगाल के साथ-साथ असम प्रांत का प्रचारक भी बना दिया गया. ये वो दौर था, जब गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. ऐसे में दत्तोपंत को भी वापस आना पड़ा.

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

आगे का दौर छुपने-छुपाने, सत्याग्रह करने, गिरफ्तारियां देने आदि का था. ऐसे में उनको एक और संगठन से जुड़ने का मौका मिला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद. 9 जुलाई 1949 को इसकी स्थापना के बाद संघ के छुपते फिर रहे नेताओं ने बैठक का मंच बना लिया. सबने एबीवीपी या उससे जुड़े प्रकल्पों के पद ले लिए. दत्तोपंत ठेंगड़ी भी विदर्भ क्षेत्र के प्रदेश अध्यक्ष बना दिए गए. इससे ये लोग गिरफ्तारियों से बचे रहे. बीच में वो समाचार एजेंसी ‘हिंदुस्तान समाचार’ से भी जुड़े रहे.

विद्यार्थी परिषद ने संघ पर प्रतिबंध अवधि के दौरान कई तरह के जनजागरण कार्यक्रम शुरू कर दिए थे. उन्हीं कार्यक्रमों के दौरान उनकी भेंट इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्ग्रेस (इंटक) के प्रदेश अध्यक्ष पीवाई देशपांडे से हुई. ये भेंट धीरे धीरे मित्रता में बदल चुकी थी. हालांकि संघ के नेता पहले से ही कांग्रेस के आंदोलनों में रहते आए थे, सो उनके मजदूर संगठन में जाना हैरानी की बात नहीं थी, लेकिन गुरु गोलवलकर चाहते थे कि अपना संगठन शुरू करने से पहले दत्तोपंत ना केवल कांग्रेस बल्कि कम्युनिस्ट व समाजवादी मजदूर यूनियनों की भी कार्यशैली को समझें. दत्तोपंत इंटक से जुड़ गए और मन लगाकर काम किया तो धीरे-धीरे इंटक से जुड़ी 9 यूनियनों ने भी उन्हें अपना पदाधिकारी बना लिया. अक्तूबर 1950 में तो वो इंटक की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बन चुके थे. उन्हें मध्य प्रदेश की इंटक के प्रदेश संगठन मंत्री पद की जिम्मेदारी भी दे दी गई.
 
गुरु गोलवलकर के मंत्र भी जानने जरूरी हैं

सीपी भिषिकर ने अपनी किताब ‘Shri Guruji- Pioneer of A News Era’ में वो सुझाव लिखे हैं जो उन्होंने ठेंगड़ी को इंटक में जाने से पहले दिए थे, मन से संगठन के अनुशासन का पालन करो, ये आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. अगर उनके अनुशासन और आपके विवेक में टकराव हो, तो फौरन त्यागपत्र दे देना.

गांधीजी और मार्क्स के ट्रेड यूनियन पर विचारों का तुलनात्मक अध्ययन करो, काम और अध्ययन साथ-साथ चलना चाहिए, अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए अध्ययन जरूरी भी है. साथ में कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियंस का भी अध्ययन करो. यात्रा के दौरान हमेशा किसी मजदूर के साथ ही रुको, जानो कि वो कैसे रहते हैं. अगर हम किसी गरीब के साथ नहीं रह सकते, उनकी जिंदगी की वास्तविकताओं को नहीं समझ सकते को उनके मानसिक स्तर के बराबर नहीं पहुंच सकते. तुम 30000 मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर राष्ट्रीय परिषद के सदस्य बन गए हो, अब मुझे एक सीधा और सच्चा सा उत्तर दो क्या तुम इन सभी मजदूरों को वैसे ही प्यार करते हो, जैसे तुम्हारी मां तुम्हें करती थी? बुनकर कांग्रेस के लिए काम करते वक्त कभी भी राजनैतिक लाभ के लिए मत सोचना…इस समुदाय को एक आर्थिक समुदाय समझो और बिना ये सोचे कि कोई सवर्ण है, या हरिजन है या फिर मुस्लिम है, सबसे साथ समान व्यवहार करो. बस बुनकरों की समस्याओं के बारे में सोचो. आर्थिक क्षेत्र में अनुसूचित जाति महासंघ और अखिल भारतीय भूमिहीन श्रमिक संगठन जैसे संगठन भी हैं. यदि आर्थिक पहलू को ध्यान में रखें, तो ये संगठन अन्य भूमिहीन श्रमिकों के साथ भी एकीकरण का विकल्प चुनेंगे, और इससे आपसी द्वेष और कटुता को भी कम करने में मदद मिलेगी.”  

गुरु गोलवलकर की सलाह को ध्यान में रखकर इंटक के बाद दत्तोपंत ठेंगड़ी कम्युनिस्टों से प्रभावित ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉयीज एसोसिशन (AIBEA) से जुड़ गए और 1952 से लेकर 1955 तक उसके प्रांतीय संगठन मंत्री रहे. 1954-55 में वह आरएमएस एम्पलॉयीज यूनियन नामक पोस्टल मजदूर संगठन के सेंट्रल सर्कल के अध्यक्ष रहे. इन सात-आठ सालों में उन्होंने सभी तरह के मजदूर संगठनों की कार्य पदधति को समझा और अध्ययन भी किया. उनके अध्ययन का स्तर इस बात समझिए कि उन्होंने कुछ कम्युनिस्ट और कुछ समाजवादी विचारधारा की सरकार वाले देशों का भी दौरा किया था. उनकी समझ आया कि ज्यादातर कम्युनिस्ट संगठन बाहरी देशों से निर्देश लेते थे, भारतीय परम्पराओं और विषयों की कमी थी. वो कहते थे कि विश्व भर के मजदूरों एक हो और ठेंगड़ी कहते थे हम मजदूरों को विश्व भर को एक करना है.
 
भारत की बात करने वाला मजदूर संगठन

वह पश्चिम के अंधानुकरण के भी खिलाफ थे. पश्चिमी होना आधुनिक होना नहीं होता, वो यही मानते थे. उनका मानना था कि मैकाले के जाल में फंसकर हमारी जो पीढ़ियां तैयार हुई हैं, वो पश्चिमी खानपान और भाषा को ही नहीं पश्चिमी विचारों को भी बहुत बेहतर मानती हैं. उनमें अपनी संस्कृति को हीन मानने की प्रवृत्ति आ गई है. जरूरत है ऐसे मजदूर संगठन की जो भारत के रहन सहन, संस्कृति और परम्पराओं के दायरे में रहकर मजदूरों की समस्याओं के समाधान ढूंढे ना कि रूस और चीन के आधार पर. तब नारा लगा कि ‘लाल गुलामी छोड़कर बोलो वंदेमातरम’. उनकी अगुवाई में मजदूर ‘भारत माता की जय’ जैसा नारा भी लगाने लगे, जो अब तक किसी भी ट्रेड यूनियन में वर्जित जैसा था. उनका तीन बिंदुओं का उद्देश्य था, ‘श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण, राष्ट्र का उद्योगीकरण और उद्योगों का श्रमिकीकरण’.

दत्तोपंत ठेंगड़ी ने मजदूर आंदोलन पर लेफ्ट के प्रभाव को खत्म किया. (Photo: AI generated)

यही विचार लेकर उन्होंने लोकमान्य तिलक की जयंती के दिन यानी 23 जुलाई को 1955 में एक नए मजदूर संगठन की स्थापना की, जिसे नाम दिया गया ‘भारतीय मजदूर संघ’ यानी बीएमएस. इस तरह वो ऐसे व्यक्ति बन गए जिसने पहला ऐसा मजदूर संगठन स्थापित किया जो ना तो मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित है और ना ही किसी अन्य राजनीतिक पार्टी से जुड़ा है. 3 दशक के अंदर 1989 में भारतीय श्रम मंत्रालय ने सदस्यता के आधार पर बीएमएस को भारत का सबसे बड़ा संगठन घोषित किया, जो अब हर साल और भी बड़ा होता जा रहा है. 1889 में उसके 31 लाख सदस्यों की संख्या, इंटक, सीटू व अन्य मजदूर संगठनों की संयुक्त सदस्य संख्या से भी ज्यादा थी. 2002 में ये संख्या 81 लाख तक पहुंच गई थी.  

मास्को में हुई वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस की अंतरराष्ट्रीय बैठक में दत्तोपंत ठेंगड़ी ने एक गैर राजनीतिक मजदूर संगठन का प्रस्ताव रखा तो सबसे पहले कम्युनिस्टों ने उसे खारिज कर दिया. फिर ठेंगड़ी ने मजदूरों की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ही दखल देकर अपने जैसे देश दुनिया के कुछ और मजदूर नेताओं के साथ मिलकर एक नया अंतरराष्टीय संगठन ही खड़ा कर दिया था, ‘जनरल कन्फेडरेशन ऑफ वर्ल्ड ट्रेड यूनियंस’ और लाल झंडे के बजाय इसका झंडा सफेद रखा.

ये मजदूर संघ की सफलताओं का प्रभाव था कि पहली बार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने किसी राष्ट्रवादी संगठन का आमंत्रित किया. बुलावे पर ठेंगड़ी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल चीन गया. फिर हर साल बीएमएस का एक प्रतिनिधिमंडल चीन जाता रहा. दत्तोपंत ने चीन से लौटने के बाद बताया था कि चीन की ट्रेड यूनियंस ने व्यापक रूप से हमारे संगठन का अध्ययन करने के बाद ही हमें निमंत्रण दिया था.
 
मजदूरों के बाद सुध ली किसानों की

मजदूरों का संगठन करीब 20 साल तक विस्तार के बाद ही दत्तोपंत ठेंगड़ी को लगने लगा था कि अब किसानों का भी कोई ऐसा संगठन हो, जो भारतीय ज्ञान परम्परा और संस्कृति के आधार पर खड़ा हो. चार साल बाद ये सपना अस्तित्व में आया और 1979 में राजस्थान के कोटा में 3-4 मार्च को किसानों का एक अखिल भारतीय अधिवेशन बुलाकर एक नए किसान संगठन की स्थापना कर दी, जिसे नाम दिया गया ‘भारतीय किसान संघ’ यानी बीकेएस. ठेंगड़ी की जैसे जैसे उम्र होती जा रही थी, वो और आक्रामक होते जा रहे थे, विश्व व्यापार संगठन की नीतियां और तत्कालीन तौर पर डंकल प्रस्ताव वो वजह बने कि दत्तोपंत ठेंगड़ी एक और संगठन का प्रस्ताव लेकर आए, जो फलीभूत हुआ 22 नवम्बर 1991 को. उससे एक दशक पहले संघ परिवार के संगठनों, बीकेएस, बीएमएस और एबीवीपी ने स्वदेशी जनजागरण शुरू कर दिया था.
 
 कम्युनिस्ट चेहरे को सौंप दी स्वदेशी जागरण मंच की कमान

22 नवम्बर 1991 के दिन नागपुर में पांच संगठनों बीकेएस, बीएमएस, एबीवीपी, एबीजीपी (अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत) और सहकार भारती के प्रतिनिधि जुटे और साकार हुआ ‘स्वदेशी जागरण मंच’. जिसका संयोजक बनाया गया एक ऐसा चेहरा जो कभी कट्टर कम्युनिस्ट था, नागपुर यूनीवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति डॉ एमजी बोकारे. लेकिन बाद में उनके विचार बदले, फिर उन्होंने एक किताब भी लिखी ‘हिंदू अर्थशास्त्र’. संगठन के सह संयोजक के लिए संघ के बड़े चेहरे मदन दास देवी का नाम रखा गया. अगले साल स्वामी विवेकानंद जयंती के दिन यानी 12 जनवरी 1992 को मंच का पहला देशव्यापी अभियान स्वदेशी जनजागरण शुरू हुआ, बाकी सब तो इतिहास बन गया. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ के खिलाफ तब उनका नारा बड़ा प्रसिद्ध हुआ था, ‘डब्ल्यूटीओ छोड़ो या तोड़ो या मोड़ो’.
 
बाबा साहब के चुनावी एजेंट भी रहे थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

कम लोगों को पता है कि शुरुआत से बाबा साहब अम्बेडकर से दत्तोपंत ठेंगड़ी के अच्छे रिश्ते थे, इतने अच्छे कि बाबा साहब ने उनको अपने लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान भंडारा (महाराष्ट्र) सीट से अपना चुनाव एजेंट भी बनाया था. 14 अप्रैल 1983 को ठेंगड़ी ने बाबा साहब की जयंती के दिन एक और संगठन की स्थापना की, जिसका नाम था ‘सामाजिक समरसता मंच’. 1991 में ‘सर्वपंथ समादर मंच’ और 1995 में ‘पर्यावरण मंच’ भी ठेंगड़ी की प्रेरणा से ही शुरू हुए.  दत्तोपंत ठेंगड़ी 2004 में इस दुनिया से चले गए, एक शब्द में उनके सारे जीवन के कृतित्व को किसी ने समेटकर उनके लिए एक उपाधि दी थी, जो वाकई में सटीक बैठती है और वो है ‘राष्ट्रऋषि’.
 
जब ठेंगड़ी ने ठुकरा दिया था पद्म भूषण पुरस्कार

सालों तक लोग सत्ता के गलियारों में एड़ियां रगड़ते रहते हैं कि कोई उनको पदम पुरस्कार दिलवा दे. लेकिन जब 2003 में भारत सरकार ने दत्तोपंत ठेंगड़ी को पद्म भूषण पुरस्कार देने का ऐलान किया तो उन्होंने इसे स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया. कहा कि जब तक डॉ हेडगेवार और गुरु गोलवलकर को भारत रत्न नहीं मिल जाता. मेरे लिए ये पुरस्कार स्वीकार कर पाना सम्भव नहीं है. उनको वैसे भी अपने लिए कुछ नहीं चाहिए था, एक बार उनको राज्यसभा का उपसभापति बनने का भी प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया था.

पिछली कहानी: कुष्ठ रोगी स्वयंसेवक ने ‘गुरु मंत्र’ से खड़ा कर दिया 100 एकड़ का कुष्ठ आश्रम 

—- समाप्त —-



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